कुछ ऐसे हादसे होते हैं जिनके जख्मों के निशान इतने गहरे होते हैं कि वक्त्त भी उसे भरने से परहेज करता है और इंसानियत भी मरहम लगाने से। और ज़रा सा कुरेदने पर असहनीय दर्द की पीड़ा आंखों से छलक जाती है। ऐसे हादसे इंसानियत के मुंह पर ऐसा तमाचा है जिसका निशान जब तक इंसाफ नहीं हो जाए नहीं मिटने वाला। जब सरकार अवाम के दर्द को अनसुना कर दे और कानून से इंसाफ पाने कि मियाद इतनी लम्बी हो जाए के हकीक़त के पन्नों पर झुठ का धूल जमने लगे तो ऐसे में इंसाफ का दम घुटना लाजमी सा लगने लगता है। लेकिन इंसानी फितरत है के उम्मीद का दामन जब तक सांस रहती है नहीं छुटती या यूँ कहें उम्मीद के सिवा कोई मददगार भी तो नहीं। और शायद यही उम्मीद हाशिमपुरा के लोगों को आज भी यकीन दिलाता है की उनको इंसाफ जरुर मिलेगा।
संसद में जहां आम लोगों के बेहतरी के लिए चर्चा होता है और सांसद भी शपथ लेते वक्त्त जाति धर्म से उपर उठकर निष्पक्ष व न्याय की बात करता है। उसी संसद से महज 80 किमी कि दूर मेरठ के हाशिमपुरा गांव में 44 मुस्लिम नौजवानों को गोली मारकर गंग नहर और हिडेन में फेक दिया जाता है। मारने वाला कोई बलवाई नहीं था बल्कि वो लोग थे जिनके हाथों में सरकार द्वारा बन्दूक थमाई जाती है आम लोगों की हिफाजत के लिए। और जो लोग काम करते हैं हुकूमत के हुक्म से तो क्या यह कत्लेआम भी हुकूमत के हुक्म से हुआ था या महज चंद सरफिरे कानून के मुहाफिजों का कारनामा था ? चाहे जो भी हो लेकिन इस कत्लेआम के 25 साल होने को है और आज तक किसी को भी दोषी साबित नहीं किया जा सका। इंसाफ मिलने की उम्मीद पीड़ीत परिवारों को आज भी है। इस मामले में सबसे चौकाने वाली बात तो यह है की यह सब तब हुआ जब केन्द्र और उत्तर प्रदेश में सेकुलर होने का लबादा ओढे राजनैतिक पार्टियॉ की सरकार रही और उस वक्त्त आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री पी चिदंबरम थे जो आज इमानदार होने का डंका बजा रहे हैं तो क्या हाशिमपुरा की घटना के वक्त्त उनका इमान नहीं था.
22 मई 1987 को सेना ने रमजान के आखिरी जुमें यानी अलविदा के नमाज़ खत्म होने के बाद हाशिमपुरा और आस पास इलाके की तलाशी ली और गिरफ्तार कर सभी मर्दों और बच्चों को मुख्य सड़क पर इकट्ठा कर वहां मौजूद प्रोविंशियल आर्मड कांस्टेबलरी (पीएसी) के जिनमें 150 हाशिमपुरा के muमुस्लिम नौजवान थे। पीएसी के ट्रक यूआरयू 1493 पर 50 मुस्लिम नौजवान को लाद दिया गया जिस पर थ्री नाट थ्री राइफलों से लैस पीएसी के 19 जवान थे। यह सफर 5 मुस्लिम नौजवानों के अलावा बाकी सब के लिए रमजान के आखिरी जुमे कि नमाज़ यानी अलविदा कि नमाज(22मई) जिन्दगी की आखिरी नमाज़ साबित हुआ। क्योंकि पीएसी नें सभी को गोली मारकर मुरादनगर की गंग नहर और गाजियाबाद के हिडन नहर में फेंक दिया। रही सही कसर पुलिस नें अपना कहर बरपा कर पूरा कर दिया और पुलिस हिरासत में आठ लोगों ने दम तोड़ दिया। अफसोस तो इस बात का है कि इतना लम्बा वक्त्त गुजर जाने के कारण मामले के अहम किरदार प्लाटून कमांडर सुरेंद्र सिंह अब मर चुका है उसके मरने के साथ कई राज भी उसी के सीने में दफन हो गया और शायद ही अब यह खुलासा हो पाए के इतना बड़ा नरसंहार करने वाले लोग किस तरह के मानसिक रोग से ग्रसित थे क्योंकि स्वस्थ्य मानसिकता के लोग इस तरह के नरसंहार करे यह बात सोंच के परे है।
इस देश में आजादी के बाद दंगे नहीं हुए ऐसा नहीं है लेकिन उन दंगो के लिए दोषी पाए जाने वालों को सजा मिला है। हाशिमपुरा नरसंहार के मामले में आरोप तो यह भी लगाया जा रहा है कि तत्कालीन गृह राज्य मंत्री पी चिदंबरम ने 18 मई 1987 को मेरठ में आला अधिकारियों की बैठक की थी उसी बैठक में उन्होनें कहा था “उन्हें सबक सिखाओ आखिर 40-50 नौजवानों को उठाकर मार दो” सच क्या है यह तो जांच का विषय है लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि क्या हाशिमपूरा कत्लेआम का खुलासा इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि इस घटना के खुलासे से जहां कई सफेदपोश चेहरों के बेनकाब होने का डर है वहीं सेकुलर राजनीति के नाम पर राजनीति करने वाले का असल चेहरा सामने आने तो क्या यही बजह है कि 25 साल बाद भी कोई दोषी साबित न हो सका। यही सेकुलर सरकारें मोदी को तो दंगे के लिए हर वक्त्त कोसती रहती हैं लेकिन अपने शासन काल में हुए नरसंहार पर मौन रखे हुए है। दुसरे के दाग दिखाने का तो कोई मौका नहीं चुकते और अपने दाग के लिए कहते हैं दाग अच्छे हैं। तो क्या वाकई दाग अच्छे होते हैं प्रचार की बात अलग है लेकिन असल जिंदगी में मौत का नंगा नाच पर सेकुलर सरकारों कि खामोशी इस बात का सबूत है कि राजनीति में किसी आम इंसान कि मौत का कोई मोल सरोकार है तो बस राजनैतिक काली करतूतों पर पर्दा डालने तक या यूं कहें के राजनीति में समाजिक सरोकार नाम की चिज अब बची ही नहीं। ऐसे में हाशिमपुरा कत्लेआम के 25 साल बाद क्या उम्मीद किया जा सकता है के इंसाफ होगा।
अब्दुल रशीद
सिंगरौली
मध्य प्रदेश


