भारतीय संस्कृति, भाषा से ऐसा लगाव है कि मैं सपने में हर रोज एक बार भारत आती हूं। न्यूज़ीलैण्ड में औपचारिक तौर पर हिंदी की पढ़ाई नहीं होती है पर कई संस्थाएं हैं जहां हिंदी भाषा की पढ़ाई व्यक्तिगत प्रयासों से होती है। प्रवासी भारतीय अपनी मूल सभ्यता और संस्कृति से जुड़े रहना चाहते हैं। ऐसे में वे चाहते हैं कि उनके बच्चे हिंदी सीखें। छोटी-छोटी पाठशालाओं व धार्मिक तथा सामाजिक संस्थाओं में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएं सिखायी जाती हैं। ये पाठशालाएं सप्ताहांत में चलती हैं तथा सभी पाठशालाओं में अपने ढंग का पाठ्यक्रम है। पढ़ाने के लिए अवकाश प्राप्त शिक्षक दिलचस्पी लेते हैं। इनमें ज्यादातर अध्यापक किसी अन्य नौकरी पेशे में हैं। वे बड़ी मुश्किल से समय निकाल कर भारतीय संस्कृति को नई पीढ़ी में संचारित कर रहे हैं। उक्त बातें महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में विदेशी हिंदी शिक्षकों के लिए आयोजित अभिविन्यास कार्यक्रम में भाग लेने के लिए न्यूज़ीलैण्ड के वेलिंगटन शहर से आयीं सुनीता नारायण ने एक खास बातचीत में कही।
उन्होंने बताया कि हिंदी के पठन-पाठन के लिए औपचारिक रूप से सहयोग न मिलने के कारण वहां हिंदी का शिक्षण उच्च स्तर पर नहीं हो पा रहा है। अकादमिक गुणवत्ता को बढ़ावा देने के लिए हम विचार गोष्ठी, कार्यशालाएं आयोजित करते हैं। शिक्षण की सामग्री हमें खुद तैयार करनी पड़ती है। विशेषज्ञों के अभाव के कारण हम यह नहीं कह सकते हैं कि हमारा पाठ्यक्रम कितना गुणवत्तापूर्ण है। पास के देश आस्ट्रेलिया में सरकारी मदद से हिंदी की पढ़ायी जाती है। हाई स्कूल स्तर की पढ़ाई में हिंदी शामिल है। हिंदी के शिक्षण में पाठशालाओं के अलावा दोनों देशों में धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के साथ-साथ रेडियो, टीवी और बॉलीवुड की महती भूमिका है। धार्मिक व सामाजिक संस्थाएं त्योहारों के अवसर पर कई कार्यक्रम आयोजित करती है। वहां के लोग 24 घंटे के रेडियो चैनलों से हिंदी में मनोरंजन का आनंद लेते हैं। इसके अलावा छोटे-छोटे सामुदायिक रेडियो स्टेशन भी हैं जो साप्ताहिक कार्यक्रम हिंदी में चलाते हैं। टेलीविजन के कई चैनलों पर भारतीय धारावाहिक देखने को मिलता है, खासकर जी टीवी व भारतीय सिरीज अत्यन्त लोकप्रिय चैनल है। साथ ही स्थानीय चैनलों पर भी कभी-कभी हिंदी फिल्में दिखायी जाती हैं। हमारे मावरी (आदिवासी) चैनल पर हमेशा हिंदी फिल्में और डॉक्यूमेंट्री दिखायी जाती हैं।
हिंदी के प्रति वहां कैसी दिलचस्पी है, सवाल के जवाब में सुनीता कहती हैं कि वर्तमान में गैर-भारतीय भी हिंदी सीखने की इच्छा करते हैं और उनके लिए भी कक्षाएं होती हैं पर उचित संसाधनों के अभाव में कई सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। त्योहारों और मेलों के अवसर पर वहां के स्थानीय लोग भारतीय संस्कृति में बहुत दिलचस्पी दिखाते हैं। उनमें भारतीय संस्कृति व इतिहास को जानने की एक खास तरह की रूचि है। उन्होंने भारत व न्यूजीलैण्ड आस्ट्रेलिया से मैत्रिक संबंध की प्रगाढ़ता पर बल देते हुए कहा कि न्यूजीलैण्ड की जनता भारत को सदा प्यार करती रहेगी और मुझे आशा है कि हमारे और भारत के बीच के रिश्ते और भी मधुर होंगे।
गौरतलब है कि महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा विदेशों में हिंदी अध्यापन में आ रही दिक्कतों से रू-ब-रू होने तथा पाठ्यक्रम निर्माण में एक समन्वयक की भूमिका निभा रहा है। पिछले जनवरी माह में विदेशी हिंदी अध्यापकों के लिए आयोजित अभिविन्यास कार्यक्रम में करीब आधे दर्जन से अधिक देशों के अध्यापकों ने शिरकत की थी। इसी कड़ी में दस दिनों के अभिविन्यास कार्यक्रम में मॉरीशस, श्रीलंका, हंगरी, न्यूजीलैण्ड, रूस, बेल्जियम, चीन, जर्मनी, क्रोशिया से दस अध्यापक सहभागिता कर रहे हैं। कुलपति विभूति नारायण राय ने बताया कि हम विदेश में पढाने वाले हिदी अध्यापकों के लिए वर्ष में दो बार अभिविन्यास कार्यक्रम चलाएंगे जिससे हम यह जान पायेंगे कि उन्हें हिंदी के शिक्षण में क्या-क्या चुनौतियां आ रही हैं।
अमित कुमार विश्वास की रिपोर्ट.


