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हिंदी सेवा सम्‍मान समारोह एवं परिसंवाद में रवि रतलामी समेत कई होंगे सम्‍मानित

हर भाषा का अपना गौरव है, अपनी शान है, अपना सम्मान है. हर राष्ट्र अपनी राष्ट्र भाषा के साथ पहचाना जाता है. हिन्दुस्तान की आत्मा हिन्दी है, हिन्दी देश की सर्वाधिक प्रचलित भाषा के रूप में ग्राह्य है. दुनिया भर में यही मान्यता है लेकिन दुर्भाग्य कि देव भाषा संस्कृत जिसकी जननी हो और जो देश की संस्कृति, सभ्यता और परम्परा की विश्व मंच पर परिचायक हो, ऐसी समृद्घ और गरिमामयी भाषा हिन्दी आज तक हमारी राष्ट्र भाषा कहलाने का गौरव हासिल नहीं कर सकी. आज विश्व के कोने-कोने से हमारी लोकप्रिय भाषा हिन्दी को जानने के लिए भाषा प्रेमी हमारे देश का रुख कर रहे हैं.

हर भाषा का अपना गौरव है, अपनी शान है, अपना सम्मान है. हर राष्ट्र अपनी राष्ट्र भाषा के साथ पहचाना जाता है. हिन्दुस्तान की आत्मा हिन्दी है, हिन्दी देश की सर्वाधिक प्रचलित भाषा के रूप में ग्राह्य है. दुनिया भर में यही मान्यता है लेकिन दुर्भाग्य कि देव भाषा संस्कृत जिसकी जननी हो और जो देश की संस्कृति, सभ्यता और परम्परा की विश्व मंच पर परिचायक हो, ऐसी समृद्घ और गरिमामयी भाषा हिन्दी आज तक हमारी राष्ट्र भाषा कहलाने का गौरव हासिल नहीं कर सकी. आज विश्व के कोने-कोने से हमारी लोकप्रिय भाषा हिन्दी को जानने के लिए भाषा प्रेमी हमारे देश का रुख कर रहे हैं.
हम ये जानते हैं कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है, राष्ट्र के गौरव का ये तकाजा है कि उसकी अपनी एक राष्ट्रभाषा हो ही, क्योंकि अपनी राष्ट्रीय भावनाओं को एक राष्ट्र अपनी भाषा में ही अच्छी तरह व्यक्त कर सकता है. महात्मा गान्धी ने कहा था कि कोई देश सच्चे अर्थों में तब तक स्वतंत्र नहीं है जब तक कि वो अपनी भाषा में नहीं बोलता. 1950 में हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने की क़वायद शुरू हुई लेकिन 1965 तक के लिए इसे टाल दिया गया और बस तब से अब तक हिन्दी के राष्ट्र भाषा कहलाने का गौरव लम्बित है. ये सोचने का और गम्भीर मनन करने का विषय है कि यदि हिन्दी फिल्में ना होतीं तो हिन्दी कहाँ होती?

आप माने ना माने हिन्दी को सम्पर्क भाषा और आज की युवा पीढ़ी में भी स्वीकृत भाषा के रूप में स्थापित करने के पीछे हिन्दी फिल्मों का बड़ा योगदान है. इसी हिन्दी फिल्म जगत से सूत्र लेते हुए विश्व हिन्दी अकादमी, मुंबई ने हिन्दी को शिखर भाषा के रूप में क़ायम रखने के ध्येय से हिन्दी के आधुनिक पुजारियों को रेखांकित करने का संकल्प लिया है. आज हिन्दी फिल्मों में कहानीकार के रूप में, पटकथा लेखन के रूप में, संवाद लेखन के रूप में गीतकारी के रूप में और फिर फिल्मों से जुड़े क्षेत्रों फिल्म समीक्षा, फिल्म इतिहास संग्रहकर्ता और फिल्म लेखन में भी हिन्दी के सेवा भावी अपने ढंग से हिन्दी के प्रचार प्रसार में सक्रिय हैं, फिल्मों से इतर टीवी एंकरिंग (टीवी सूत्रधार), टीवी न्यूज़ वाचन, टीवी धारावाहिक लेखन, नाट्य कर्मी, विज्ञापनों की दुनिया उआ फिर हास्य मंच और कवि प्रस्तोता और इससे परे हिन्दी पत्रकारिता में हिन्दी को जीने वाले मनस्वी हमारे बीच हैं.

विश्व हिन्दी अकादमी. मुम्बई ने हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हिन्दी दिवस पर आगामी 14 सितम्बर को विगत दो वर्षों में हिन्दी में हुए समस्त क्रियाकलापों पर गहन शोध-चिंतन कर हिन्दी के चुनिन्दा हस्ताक्षरों का शिखर सम्मान करने का प्रयास किया है. जो हमारे बीच से इस हिन्दी सम्मान के लिए मंच की ओर अग्रसर होंगे वे तो हैं ही, हिन्दी के साधक, जो इस बार इस गौरव से वंचित हैं उनके लिए आने वाले हिन्दी वर्ष बाहें फैलाए खड़े हैं. इस्कॉन ऑडिटोरियम, जुहू, मुम्बई उस दिन शाम सात बाजे श्री कमलेश पाण्डे, श्री इरशाद कामिल, श्री जयदीप साहनी, श्री प्रसून जोशी, श्री निलेश मिश्रा, श्री संजय चौहान, श्री अमोल गुप्ते, श्री पीयूष मिश्रा, श्री स्वानन्द किरकिरे, श्री अनुराग पाण्डे, श्री निखिल सिन्हा, श्री रवि रतलामी को हिन्दी में इनके विशेष योगदान के लिए आयोजित हिन्दी सेवा सम्मान समारोह का गवाह रहेगा. सम्माननीय अतिथि के रूप में वरिष्ठ पत्रकार श्री विश्वनाथ सचदेव, श्री शरद पगारे, श्री सिध्दार्थ कश्यप, श्री आरडी जैन भी मौजूद रहेंगे. साथ ही समस्त उपस्थित मेहमान हिन्दी के सम्पूर्ण राष्ट्र भाषा बनने में अवरोध व निदान विषय पर आयोजित परिसंवाद में हिस्सा लेंगे.

विश्‍व हिंदी अकादमी के अध्‍यक्ष केशव राय की रिपोर्ट.

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