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हिमाचल में चुनावी रणभेरी बजने वाली है

तेजी से बदलते प्रदेश के राजनीतिक घटनाक्रम से ऐसा आभास हो रहा है कि हिमाचल में चुनावी रणभेरी बज चुकी है और सेनाओं को कूच के आदेश की ही प्रतीक्षा है. प्रदेश विधानसभा के चुनाव सितम्बर या अक्टूबर माह में करवाए जाने की सम्भावना बन रही है. ऐसे में एक विशेष बात देखने में यह आ रही है कि जैसे-जैसे चुनाव समीप आ रहे हैं वैसे-वैसे अर्से से बिखरी हुई कांग्रेस एकजुट हो रही है और वहीँ दूसरी ओर सत्तारूढ़ भाजपा के लिए बाहर और भीतर की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं. लोकायुक्त का अधिनियम पारित कर जिस टीम अन्ना से चुनावों में लाभ की आशा सरकार कर रही थी, उसी ने इस अधिनियम को सिरे से ही ख़ारिज कर दिया है. यही नहीं अन्य कई मामलों पर भी टीम अन्ना के विरोध से निपटने में चिंतित सरकार को उसके लाडलों की हठ के कारण विगत दिनों एक नई मुश्किल में डाल दिया था. यह नया मामला था देश की सुरक्षा व सामरिक महत्व के शिमला के अन्नादेल मैदान को खेलों के नाम पर सेना से वापिस लेने का.

तेजी से बदलते प्रदेश के राजनीतिक घटनाक्रम से ऐसा आभास हो रहा है कि हिमाचल में चुनावी रणभेरी बज चुकी है और सेनाओं को कूच के आदेश की ही प्रतीक्षा है. प्रदेश विधानसभा के चुनाव सितम्बर या अक्टूबर माह में करवाए जाने की सम्भावना बन रही है. ऐसे में एक विशेष बात देखने में यह आ रही है कि जैसे-जैसे चुनाव समीप आ रहे हैं वैसे-वैसे अर्से से बिखरी हुई कांग्रेस एकजुट हो रही है और वहीँ दूसरी ओर सत्तारूढ़ भाजपा के लिए बाहर और भीतर की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं. लोकायुक्त का अधिनियम पारित कर जिस टीम अन्ना से चुनावों में लाभ की आशा सरकार कर रही थी, उसी ने इस अधिनियम को सिरे से ही ख़ारिज कर दिया है. यही नहीं अन्य कई मामलों पर भी टीम अन्ना के विरोध से निपटने में चिंतित सरकार को उसके लाडलों की हठ के कारण विगत दिनों एक नई मुश्किल में डाल दिया था. यह नया मामला था देश की सुरक्षा व सामरिक महत्व के शिमला के अन्नादेल मैदान को खेलों के नाम पर सेना से वापिस लेने का.

सेना और सरकार में बयानबाजी से आयी तल्खी को तो मुख्यमंत्री धूमल ने समय रहते संभाल लिया, परन्तु अब प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा सोलन के बघेड़ी में जेपी सीमेंट उद्योग द्वारा अनियमितताएं बरतने पर दिए एक निर्णय के बाद तो सत्ता और विपक्ष में आरोप-प्रत्यारोप की छिड़ी जबानी जंग थमने का नाम ही नहीं ले रही है. इस आग में घी डालने का काम कर रहे हैं उनके अपने ही दल के असंतुष्ट नेता. इतना ही नहीं चुनावी वर्ष में प्रदेश के सबसे बड़े जिले कांगड़ा के विभाजन की जो राजनीति चल रही है वह भी भाजपा के लिए भीतर-बाहर की मुसीबतों को बढ़ाने का कारण बननेवाली हैं. गुटबाजी और भीतरघात के चलते बड़ रही अनुशासनहीनता से दोनों ही दलों को दो-दो हाथ होना पड रहा है. एक ओर सत्तापक्ष पर जहाँ पुराने और कर्मठ नेताओं की अनदेखी और हाशिये पर धकेलने और भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं वहीँ प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस में कौन बनेगा मुख्यमंत्री की प्रतियोगिता में मशगूल नेता सत्तापक्ष पर हमलों की अपेक्षा अपनों को ही समेटने में अधिक दिखाई देते हैं. शीर्ष नेतृत्व द्वारा दुलार या फटकार से दिए गए एकता के मूल मंत्र पर कितना अमल होता है यह आने वाले दिनों में स्पष्ट हो जायेगा. अंतर्कलह और अनुशासनहीनता से निपटने के लिए सोनिया की चिरप्रतीक्षित फटकार कुछ तो रंग लायेगी. टिकट आबंटन पर हाई कमान का निर्णय ही सर्वबाध्य निर्णय होगा इसीलिये पूर्व की भांति टिकट चाहने वालो ने अभी से ऊपर का जुगाड़ लगाना शुरू कर दिया है. जब खानसामे और व्यक्तिगत सुरक्षा कर्मी या अधिकारी, हाई कमान के मेहरबान होने पर सभी वरीयताएं अनदेखी अनसुनी करते हुए पार्टी का चुनाव टिकट प्राप्त कर सकते हैं तो पार्टी से जुड़े अन्य लोग क्यूँ नहीं सीधे हाई कमान से ही कनक्शन मिलाने की ही जुगत करेंगे?

उधर सत्ताधारी दल में भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है. अंतर्कलह के चलते दल के भीतर चल रहे आरोप-प्रत्यारोप, अनुशासनहीनता का आरोप और बचाव में संगठन व सत्ता में अनदेखी का पलटवार. सत्ता के नशे में चूर शासक पक्ष द्वारा उद्दंडता से “दीवार में घेरने की नाकाम कोशिश” तो दूसरी ओर “वीर-पुरुषों की कश्तियों में इस प्रकार के तूफानों को गर्क करने” का दावा करने के साथ ही सूचना के अधिकार द्वारा एकत्रित की गई जानकारी से हिमाचल के मधु कोड़ा, ए. राजा व कनिमोझी को जनता के सामने खड़ा करने के दावे. बेबसी, लाचारी, कुंठाओं से दम घुटने की छटपटाहट पर अंकुश लगाने के लिए प्रदेश भाजपा कार्यकारणी से बाहर करने व संसदीय दल से निलंबन जैसे भयदोहन के हथियार भी विफल साबित हो रहे हैं. हिमाचल लोकहित पार्टी की नाव में सवार होकर दल छोड़नेवालों के बाद शेष रहे असंतुष्ट नेता आर या पार की निर्णायक लड़ाई के लिए तीरों से भरा तरकश लिए मौके की प्रतीक्षा में हैं. दूसरी ओर पार्टी के भीष्म पितामह की ज्वालाजी बैठक में हुई जायज-नाजायज पराजय के समय से चली आ रही नाराजगी वर्तमान सरकार और संगठन के मामलों में हो रही उपेक्षा से बढ़ती ही जा रही है. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा भी अनसुनी और अनदेखी के चलते ये कद्दावर असंतुष्ट नेता यदाकदा शब्दों की मिसाइल छोड़ने के अतिरिक्त और कर भी क्या सकते हैं? अब नाहन में एक मंच पर आने से क्या दूरियां नजदीकियों में बदल जायेंगी? क्या कांग्रेस पर परिवारवाद और वंशवाद के आरोप या माँ-बेटे की पार्टी कहनेवाले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष गडकरी को हिमाचल भाजपा के कार्यकलाप दिखाई नहीं देते क्या? पार्टी के निष्पक्ष जनों को चिंतन करना होगा कि प्रदेश भाजपा के पुराने और कर्मठ नेताओं जिनके अथक परिश्रम से आज पार्टी इस मुकाम पर पहुँची है, को चुन-चुन कर हाशिये पर धकेलने या बाहर का रास्ता किस लिए दिखाया जा रहा है? क्या यह एक सोची समझी रणनीति दिखाई नहीं देती जिसके तहत भविष्य के लिए सिंहासन का मार्ग निष्कंटक किया जा रहा है? ऐसे में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को ध्रतराष्ट्र की संज्ञा दी जाये तो अतिश्योक्ति न होगी क्योंकि पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व को हिमाचल में कुछ दिखाई नहीं दे रहा है. आने वाला समय हिमाचल के सत्ताधारी दल के लिए बहुत ही कठिनाइयों भरा होगा इसका आभास अभी से हो रहा है.

वहीँ दूसरी ओर प्रमुख विपक्षी दल, जिस की केंद्रीय सरकार पर अरबों रुपयों के भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, जिसका स्वयं का दामन विदेशों के बैंकों में अरबों रुपयों के काले धन जमा करने वालों को बचाने के चक्कर में दागदार हो रहा है और जिसकी जनविरोधी नीतियों के कारण आज महंगाई सातवें असमान को छू रही है वह दल प्रदेश की सरकार के खिलाफ आवाज उठा उसे मतों में तब्दील करने में कितना सक्षम होगा यह तो समय ही बताएगा. वैसे विभिन्न खेमों में बंटा प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस जब भी सर उठाती है, सत्ता पक्ष सीडी का शोशा छेड़ देता है, ठीक वैसे जैसे भाजपा जब भी कोई संगीन मुद्दा केद्रीय सरकार के विरुद्ध उठाती है झट से गुजरात में मोदी के खिलाफ कोई नया आरोप चस्पां हो जाता है. आयोजित-प्रायोजित या पक्षीय समाचारों को छोड़ यदि प्रदेश की राजनिति का चिंतन व निष्पक्ष आंकलन करने वालों की मानें तो गाहे-बगाहे  ऐसी चर्चाएं सुनी जा सकती है जिससे यह प्रतीत होता है कि प्रदेश विधानसभा के आनेवाले चुनावों में कांटे की टक्कर रहेगी व परिणाम भी बहुत ही अप्रत्याशित होनेवाले हैं. शह और मात के इस खेल में कब अपने भी पराये हो जाते है और कब धुरविरोधी अपना बन जाये कोई नहीं जानता. समय रहते यदि प्रदेश के दोनों प्रमुख दलों ने अंतर्कलह और भीतर-घात से बचने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाये तो “हम तो डूबेंगे, तुम्हें भी ले डूबेंगे सनम” वाली कहावत चरितार्थ होने में तनिक भी देर नहीं लगेगी.

लेखक विनायक शर्मा मंडी से प्रकाशित साप्‍ताहिक अमर ज्‍वाला के संपादक हैं.

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