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हिसार इस बार करेगा कई आर पार

हिसार के उपचुनाव में दो बातें होंगी. या तो कांग्रेस चुनाव जीतेगी या हारेगी. अगर वो जीतेगी तो ये चमत्कार होगा. और अगर वो हारेगी तो तीसरे नंबर पर आएगी. अगर वो तीसरे नंबर पे आई तो फिर दो बातें होंगी. या तो इसका ठीकरा हुड्डा हरवाने वाले कांग्रेसियों पे मढ़ेंगे या फिर सब जने मिल के हुड्डा को जिम्मेवार ठहराएंगे. सारे कांग्रेसियों पे दोष मढ़ा गया तो वो सारे कांग्रेस में हुड्डा के दुश्मन हो जाएंगे और अगर हाईकमान की नज़र से गिरे हुड्डा तो इसके दो कारण माने जाएंगे. एक तो ये कि हुड्डा मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस को एक उपचुनाव तक जिता सकने की सकने की हालत में नहीं हैं और दूसरे ये कि आने वाले लोकसभा चुनाव में भरोसा उन पे नहीं किया जा सकता.

हिसार के उपचुनाव में दो बातें होंगी. या तो कांग्रेस चुनाव जीतेगी या हारेगी. अगर वो जीतेगी तो ये चमत्कार होगा. और अगर वो हारेगी तो तीसरे नंबर पर आएगी. अगर वो तीसरे नंबर पे आई तो फिर दो बातें होंगी. या तो इसका ठीकरा हुड्डा हरवाने वाले कांग्रेसियों पे मढ़ेंगे या फिर सब जने मिल के हुड्डा को जिम्मेवार ठहराएंगे. सारे कांग्रेसियों पे दोष मढ़ा गया तो वो सारे कांग्रेस में हुड्डा के दुश्मन हो जाएंगे और अगर हाईकमान की नज़र से गिरे हुड्डा तो इसके दो कारण माने जाएंगे. एक तो ये कि हुड्डा मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस को एक उपचुनाव तक जिता सकने की सकने की हालत में नहीं हैं और दूसरे ये कि आने वाले लोकसभा चुनाव में भरोसा उन पे नहीं किया जा सकता.

अगर हाईकमान का भरोसा उन पे से उठा तो तो फिर दो बातें होंगी. या तो उन्हें हालात सुधारने का एक मौका और दिया जाएगा. या उन्हें हटा दिया जाएगा. एक मौका उन्हें और दिया गया तो हरियाणा में कांग्रेस की लुटिया डूबी समझो और नहीं दिया गया तो इसका सिर्फ एक मतलब होगा. और वो ये कि हुड्डा के साथ न हरियाणा के दलित हैं, न जाट, न गैर जाट और न खुद कांग्रेसी. इसका ये मतलब भी होगा कि ये मुख्यमंत्री के रूप में हुड्डा की आखिरी पारी होगी. अब वे गए तो फिर कभी नहीं आएँगे. वैसे भी उत्तर भारत में जाट चेहरा तो कांग्रेस ने बीरेंद्र सिंह को प्रोजेक्ट कर रखा है. उत्तर प्रदेश के प्रभारी वे रह चुके हैं. उत्तर भारत के तीन और प्रमुख राज्यों के प्रभारी महासचिव वे हैं. इनमें से दो, दिल्ली और उत्तराखंड में चुनाव हैं और इन दो में से कम से कम एक में कांग्रेस भारी बहुमत से जीतनी चाहिए. ऐसा हुआ तो हुड्डा की अहमियत न तो एक कुशल प्रशासक की रह जाएगी, न जाट नेता की.

हुड्डा मुख्यमंत्री नहीं रहे तो फिर दो बातें होंगी. या तो वे चुपचाप सब सहन कर लेंगे या फिर अपने होने का एहसास दिलाएंगे. नोट कर के रख लो किसी कागज़ पे, हुड्डा को बेईज्ज़त कर के निकाला गया तो हरियाणा की सरकार चल नहीं पाएगी. इसकी फिर दो वजहें हैं. एक तो ये कि जो जुगाड़ तुगाड़ उन्होंने फिट कर रखा है सरकार चलाये रखने के लिए वो तिड़ी बिड़ी हो जाएगा. उन्हीं को मालूम है कि कौन सी फच्चर उन्होंने कहाँ फंसा के गाड़ी कैसे चला रखी है. एक बार बैलेंस खराब हुआ नहीं कि गाड़ी लगेगी हिचकोले खाने. अपने अपमान से आहत हो कर सरकार उन्होंने खुद न भी गिराई तो इतना तो वे कर ही सकते हैं कि कांग्रेस और उसकी सरकार को वो उन्हें खुद को किनारे वालों के हाल पे छोड़ दें. दूसरी और बड़ी वजह ये है कि हुड्डा को निकाला तो फिर इस लिए भी जाएगा कि हिसार में जाटों के वोट बंट के गैर जाटों की बात बन चुकने का सच कांग्रेस की भी समझ में आ गया होगा. अगला मुख्यमंत्री उसे भी कोई गैर जाट लाना ही होगा. होने को विकल्प शैलजा भी हो सकती हैं.

हिसार में एड़ी चोटी के जोर इसी लिए लग रहे हैं. देखिये दांव पे क्या क्या लगा है? …कुलदीप-भाजपा का गठबंधन अगर हारता है तो पहले ही पहले से टोटे में चली आ रही भाजपा का संघर्ष बहुत लम्बा हो जाएगा. अपने दम पर जीतने की हालात में वो न है, न होगी. कुलदीप अगर हारे तो अगली बार आदमपुर से विधानसभा का चुनाव तक जीतने की हालत में शायद न रहे. चौटाला कांग्रेस के अविवादित विकल्प के रूप में उभर आएँगे. और अगर कांग्रेस हारती है तो फिर पहले हुड्डा और फिर कांग्रेस का खेल ख़त्म. हिसार कोई भी जीते, कुलदीप या अजय चौटाला.

कांग्रेस हारी तो फिर उसमें गृहयुद्ध शुरू. विरोधियों की बल्ले ही बल्ले. इस पूरे संग्राम में सच पूछो तो हर हाल में विनर चौटाला हैं. उन का बेटा जीते तब भी, हारे तब भी. बताएं कैसे? अजय अगर जीत गए तो पक्का समझिये कि आइन्दा से हरियाणा में चुनावी लड़ाई सिर्फ इनेलो और कांग्रेस में. कुलदीप, भाजपा या कल को कोई भी मायावती सब बेमानी. और अगर अजय चुनाव हार भी जाते हैं तो भी अगले लोकसभा चुनाव के लिए हिसार में उनकी ज़मीन, कार्यकर्ता और संगठन तैयार मिलेंगे. इस से बड़ी बात ये है कि कुलदीप-भाजपा से बचे मतदाता अगली बार के लिए उनके हो चुके होंगे. हारे हुए कांग्रेसी उम्मीदवार के वोटरों समेत. और सब से बड़ी बात ये कि कांग्रेस की इस हार के बाद उन्होनें हुड्डा और हरियाणा में कांग्रेस के भीतर तूफ़ान मचा दिया होगा. अगर ऐसे में कहीं सरकार गिर गिरा गयी तो भी और चुनाव समय पर हों तो भी विधानसभाई राजनीति में तो कांग्रेस के विकल्प वे ही होंगे.

सो बंधुवर, हिसार में इस बार हार जीत के फ़ार्म पर इस बार जीतने हारने वालों का नाम ही नहीं, अब के बाद की हरियाणवी राजनीति का भविष्य लिखा जाना है. और आप देख लेना असल हार तो उनकी होगी जिनका नाम इस फ़ार्म पे न जीतने वाले कालम में होगा, न हारने वाले में. इस चुनाव और उस के परिणाम के बाद हरियाणा में राजनीति की परिभाषा ही बदल जाने वाली है. कैसे? फिर कभी बताएंगे!

 

लेखक जगमोहन फुटेला चंडीगढ़ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. कई अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहने के बाद इन दिनों न्यू मीडिया में जर्नलिस्टकम्युनिटी.कॉम समेत कई पोर्टलों के जरिए सक्रिय हैं. इनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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