: उत्सव है तो जीवन है, जीवन है तो उत्सव : होली पास आ गयी है। मौसम गरमाने लगा है। मन अलसाने लगा है। बरसाने की याद या रही है। वहाँ होता तो लाठियाँ बरसतीं। कभी-कभी लठियाये जाने का भी अपना सुख है लेकिन तब, जब लाठियाँ नरम हाथों में हों, चोट ज्यादा न लगे। हुरियारिन की मुस्कान के आगे छोटी-मोटी चोट का क्या। वह तो तुरंत भर जायेगी। दिल चाहेगा, कुछ और लाठियाँ पड़ें ताकि लाठियों के साथ लचकती देह-भाषा का भी आनंद मिल सके। रंग-गुलाल से सराबोर हुरियारिनें समूची मुस्कान जैसी ही लगती हैं। वे मारती तो हैं पर मनाती हैं कि किसी को जोर की न लगे, किसी को दर्द न हो। उत्सव है खुशी के लिए, दर्द भुलाने के लिए, प्यार बढ़ाने के लिए। लाठियाँ भी प्यार बढ़ायें तो क्या कहने।
ब्रज की होली बड़ी मशहूर है। शानदार। बाहर तो रंग बरसते ही हैं, भीतर तक रंग जाता है। पोर-पोर, रोम-रोम राग से भर उठता है। राग जीवन के प्रति, राग उत्सव के प्रति, राग आनंद के प्रति, प्रीति के प्रति, सद्भाव के प्रति। होलिका जलती है और उसमें सारी दरिद्रता जल जाती है, सारी संकीर्णता लपटों में समा जाती है, सारा स्वार्थ धू-धू कर नष्ट हो जाता है। प्रह्लाद को जब उसके राक्षस पिता हिरण्यकशिपु ने जलाकर मार देने की योजना बनायी और उन्हें होलिका की गोद में बैठाकर धधकती आग में झोंक दिया तो प्रकृति ने न्याय के पक्ष में अपना नियम बदल दिया। होलिका को न जलने का वरदान था लेकिन वह जलकर राख हो गयी, प्रह्लाद अक्षत बाहर निकल आये। वह स्वार्थ था, विचार की संकीर्णता थी, दुर्भावना थी, जो जलकर नष्ट हो गयी।
वह जीवन की समूची दरिद्रता थी, जो स्वाहा हो गयी। अग्रि का धर्म ही है जलाना, पर वह केवल जलाती हो, ऐसा नहीं है। जीवन को भी ताप चाहिए। हर प्राणी को यह ताप इसी अग्रि से मिलता है। अग्रि बाहर ही नहीं, भीतर भी होती है। प्राण को पांच तत्व वहन करते हैं। छिति, जल, पावक, गगन, समीरा, पंचतत्व यह रचित सरीरा। शरीर में इन पांचों में से एक तत्व भी नहीं रहा तो वह प्राण को धारण नहीं कर सकता। अग्नि जब तक है, तभी तक प्राण है। यह अग्नि शरीर को तो चलाता ही है, मन की दरिद्रता को जलाता भी है। इसीलिए जो लोग भाव और विचार से जितने दरिद्र होते हैं, उनमें आग उतनी ही कम होती है। इसी तरह जिनमें आग जितनी ज्यादा होती है, उनके भीतर जीवन का दारिद्र्य उतना ही कम होता है। वे जूझते हैं, झुकते नहीं। वे लड़ते हैं, भागते नहीं। वे मिटाकर भी मिटाये नहीं जा सकते। वे जीवित रहते हैं, लपटों में रहते हुए भी। वे लपटों की ही तरह जला देने वाले होते हैं, दहकते हुए होते हैं, तने हुए होते हैं।
प्रह्लाद इसी अदम्य जीजिविषा का प्रतीक है। जो आग ही हो, उसे आग कैसे जला सकती है। होली जब भी आती है, प्रह्लाद की याद दिलाती है, होलिका की भी। इसे पौराणिक इतिहास की तरह नहीं, केवल एक मिथ की तरह देखने की जरूरत है। तब होली एक दिन का त्यौहार नहीं होगा। हम सभी जीवन के सातत्य के आकांक्षी हैं। कोई इस निरंतरता के भंग होने की कल्पना नहीं करता। पर जीवन के सहज तत्वों को इसी नैरंतर्य में साधे रहने की बात अक्सर लोग सोचते ही नहीं। इसी अचिंतनशीलता ने त्यौहार गढ़े हैं, इसी ने व्यक्तिपूजा का अवसर उपलब्ध कराया है। मनुष्य का पूरा जीवन ही उत्सव है पर कोई विरला ही इसे उत्सव की तरह जीता है। सदियों में कुछ ही लोग जीवन की दुर्लभता को, उसके सच को, उसके निर्माल्य को समझ पाते हैं। वही उत्सवधर्मिता को धारण कर पाते हैं। बाकी लोग उन्हें पूजते हैं, उनके चरणों में नत होकर ही अपने जीवन को धन्य समझते हैं। इसी व्यक्तिपूजा ने समाज को रसातल तक पहुंचा दिया है, इसी ने जीवन को उसके उत्सवी मूल्यों से काट दिया है, इसी ने मनुष्य-मनुष्य में फर्क करना सिखाया है, इसी ने सामाजिक विभाजन की गहरी रेखाएं खींच दी हैं। इसी से उपजा है यह भाव कि कोई बड़ा है, कोई छोटा है और इसी भाव ने दमन, शोषण और अत्याचार के तमाम रास्ते खोले हैं।
कितना अतिचार है। समाज ने बुद्ध को अपनाया, बुद्ध के जीवन मूल्यों को, उनके जीवन दर्शन को नहीं। समाज ने रामानंद और कबीर का सम्मान तो किया लेकिन उनसे कुछ नहीं सीखा, समाज ने महात्मा गाँधी को आदर दिया पर उनके रास्ते पर कौन चला, कितने लोग चले। जो बड़े हैं, जिनके आने से नयी सामाजिक धारा फूट निकली, जिन्होंने आवाज दी, सभी मनुष्य एक जैसे हैं, सबके साथ एक जैसा बर्ताव होना चाहिए, जिन्होंने भेदभाव, दमन के खिलाफ रणभेरी बजाई, उनका इस समाज ने क्या किया। उन्हें मिटाने के लिए उनकी मूर्तियाँ लगवा दी गयीं, उन पर फूल-मालाएं चढ़ायी जाने लगी, उनके सामने सिर झुकाने की प्रथा चला दी गयी। हमने उस मनुष्य को तो आदर दिया, उसकी क्रांतिधर्मिता को नहीं, उसके विचारों को नहीं, उसके जीवन-मूल्यों को नहीं। यह सब बहुत सोचा-समझा सा लगता है। चालाक और धूर्त लोग नहीं चाहते कि मनुष्य और मनुष्यता की स्थापना की विचार परंपरा समाज धारण करे, वे नहीं चाहते कि क्रांति या परिवर्तन का सातत्य कायम रहे, वह श्रृंखलाबद्ध जारी रहे। मिथकों को उत्सवों से जोड़कर उन्हें किसी खास दिन के लिए सुरक्षित और सीमित करने वाले भी वही चालाक लोग हैं। एक दिन होली मना लो, एक दिन दिवाली मना हो, एक दिन दशहरा मना लो।
यह सरासर चालाकी है। अगर त्यौहार नित्य के जीवन में आ गये तो कभी भी इनके वास्तविक अर्थ के खुल जाने का खतरा बना रहेगा, कभी भी आदमी के जाग उठने का डर रहेगा। एक दिन की उत्सवधर्मिता आदमी की जड़ता को भंग तो करती है, लेकिन उसे उसके गहरे अर्थ तक ले जाने से पहले ही वापस उसी जड़ता में धकेल देती है। सामाजिक संकट जिस गति से बढ़ रहा है, उसमें अब यह जरूरी हो गया है कि जीवन को अपनी संपूर्णता में एक विराट उत्सव की तरह जीने और समझने की कोशिशें शुरू हों। इससे संवेदनशीलता बढ़ेगी, एक दूसरे का दर्द समझने की सामर्थ्य विकसित होगी, मनुष्य
को मनुष्य बनाये रखने में मदद मिलेगी। और केवल तभी संक्रमण के इस समय से हम निकल सकेंगे।
लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला, डीएलए और जनसंदेश टाइम्स के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित डेली न्यूज एक्टिविस्ट के प्रधान संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को डेली न्यूज एक्टिविस्ट से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.


