हेमा मालिनी जब-तब लखनऊ आती रहती हैं। जब राजनीति में नहीं थीं तब भी। कभी-कभी उन से मैं भी मिल लेता था। उन दिनों वह राजनीति में भले नहीं थीं पर राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई थीं। लालू प्रसाद यादव तब बिहार के मुख्यमंत्री थे। और एक सभा में बोल बैठे थे कि पटना की सडकों को हेमा मालिनी का गाल बना दूंगा। हेमा मालिनी से तब मैं ने इस की चर्चा की थी तो वह मद्रासी हिंदी में भड़क गई थीं। बोलीं, ‘यह इतना फुलिश आदमी कौन है?’ मैं ने बताया कि बिहार के मुख्यमंत्री हैं। तो वह और बिदक गईं। बोलीं, ‘बोलने की तमीज़ नहीं है क्या इस आदमी को?’ वह बोलीं,’ मैं इस का अपने तरीके से विरोध करुंगी। लीगल नोटिस दूंगी।’
बाद में उन्हों ने ऐसा किया भी। तो अपनी आदत के मुताबिक लालू पलटी मार गए। कहने लगे मैं ने तो ऐसा कहा ही नहीं था। अखबार वालों ने गलत कोट कर दिया है। और उन्हों ने हेमा मालिनी से क्षमा मांग ली। बाद में तो हेमा मालिनी राज्य सभा की सदस्य हो गईं। फिर लालू भी वहां पहुंच गए।
उन्हों ने आमने-सामने भी क्षमा मांग ली। बात खत्म हो गई। दरअसल लालू जान गए थे कि नृत्य की दीवानी हेमा कहीं उन्हें नचा देंगी तो वह कहीं के नहीं रह जाएंगे। चारा घोटाले में वह यों ही फंस कर बेरोजगार हो चुके थे। सो वह अब और नाचना नहीं चाहते थे। वैसे आप को बताऊं कि मैं तब की उन से जब मिला था तब सर्दियों के दिन थे। मैं ने उन से बहुत सारी बातें पूछी थीं। एक बात यह भी पूछी कि, ‘आप का फ़र्स्ट लव कौन है?’ वह बेधड़क बोलीं, ‘डांस इस माई फ़र्स्ट लव !’ मैं ने पूछा कि, ‘फिर धरम जी?’ वह शर्माती हुई बोलीं, ‘धरम जी तो मेरी लाइफ़ हैं। और लव भी।’
एक बात बताऊं कि हेमा मालिनी को लखनऊ के चिकन कपड़ों से भी बहुत प्यार है। वह जब आती हैं ढेर सारे चिकन कपडे़ खरीद कर ले जाती हैं। घर भर के लिए। किसिम-किसिम के कपडे़। एक बात और बताऊं कि हेमा मालिनी का बोलना परदे से बिलकुल अलग है। परदे पर तो वह अच्छी हिंदी बोलती हैं, लगभग कांखती हुई हिंदी। पर व्यक्तिगत बातचीत में बदकती हुई मद्रासी हिंदी पर आ जाती हैं। रही बात उन के सौंदर्य की तो उस पर तो मैं जब विद्यार्थी था तब भी मोहित था और आज भी। स्वप्न सुंदरी उन्हें वैसे ही नहीं कहा गया है। सच्चे अर्थों में वह हैं ही स्वप्न सुंदरी। विकल साकेती के एक गीत में जो कहूं तो, कोई विकल हुआ है किसी रुप की कृपा है, है मेरे भी ऊपर किसी की मेहरबानी! तो हेमा मालिनी के रुप से विकल बहुतेरे मिल जाएंगे, एक मैं ही नहीं, असंख्य हैं।
लेखक दयानंद पांडेय वरिष्ठ पत्रकार तथा उपन्यासकार हैं. दयानंद से संपर्क 09415130127, 09335233424 और [email protected] के जरिए किया जा सकता है.


