वह रे राजनीति, और वाह रे राजनीति करने वाले नेताजी लोग। हद कर दी। हे देश के भाग्य विधाताओं! तुम्हीं बताओ अब और कितना बंटाधार करोगे इस देश का। अपने राजनीतिक जीवन में किसका समर्थन करोगे और किस बात का विरोध? छीछालेदर होने से पहले इस पर विचार काहे नहीं कर लेते? आवाम के प्रति भी तो जवाबदेही है कि नहीं? इलाहाबाद स्थित एजी ऑफिस में कतिपय नेताओं का आंदोलन और उसे कुछ नेताओं के समर्थन के मुद्दे ने इस शहर में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। एजी ऑफिस में कतिपय कर्मचारी नेताओं ने अफसरों पर नाजायद दबाव बनाने के लिए आंदोलन शुरू किया। यह आंदोलन भी तब शुरू हुआ जब वहां के वरिष्ठ अधिकारियों ने अक्सर ड्यूटी पीरियड में घंटों गायब रहने के आदी हो चुके कुछ कर्मचारियों की महीनों पहले अटेंडेंस करानी शुरू कर दी।
कर्मचारी भी तुम डाल-डाल तो हम पात-पात की कहावत चरितार्थ करते हुए उसका भी रास्ता निकालने लगे। तीन दिन पहले अफसरों ने ऑफिस का गेट बंद कराने के बाद अटेंडेंस लेना शुरू करा दिया। इस पर रंगे हांथ पकड़े गए कुछ कर्मचारी नेताओं ने उल्टा चोर कोतवाल को डांटे का रवैया अख्तियार कर अफसरों को न सिर्फ बंधक बना लिया, बल्कि उनके साथ अभ्रदता भी की। अफसरों ने थाने में एफआईआर दर्ज करा के कई लापरवाह कर्मचारियों को निलंबित कर दिया। इसी के बाद एजी ऑफिस में शुरू हो गई घटिया दर्जे की नेतागीरी। हद तो तब हो गई जब वहां सपा और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पहुंचकर गलत तरीके से दबाव बनाने वाले कतिपय कर्मचारी नेताओं का साथ देने की सार्वजनिक घोषणा कर दी। इस नेतागीरी वाले खेल में शायद भाजपा भी़ कूद पड़ती पर तब तक आमजन के बीच यह आंदोलन एक्सपोज हो चुका था। यहां बताना जरूरी है कि एजी ऑफिस के बारे में यह बात आम है कि यहां के कई कर्मचारी कुर्सी पर कोट टांगकर दिनभर बाहर टहलते रहते थे। कई कर्मचारी तो पगार हर महीने उठाते पर सालों-साल अपनी सीट तक नहीं जानते थे। ऐसे लापरवाह कर्मचारियों पर शिकंजा कसने की शुरुआत हुई तो दबाव बनाने को आंदोलन शुरू हो गया।
कई दल के नेता आंख मूंदकर पहुंच गए उस आंदोलन को हवा देने। सपा के वरिष्ठ नेता व सांसद कुंवर रेवतीरमण सिंह मौके पर पहुंचे। उधर, कांग्रेस भी पीछे रहने वाली कहां? राजनीति की रोटी सेंकने कांग्रेस के नगर अध्यक्ष श्यामकृष्ण पांडेय, पूर्व सांसद धर्मराज पटेल भी आनन-फानन आ पहुंचे। इन नेताओं ने इस आंदोलन को खुलेआम समर्थन देकर अपनी पार्टी के हाई कमान तक मामला पहुंचाने का एलान कर डाला। शहरियों के बीच यह सवाल उठाया जाने लगा है कि क्या सपा और कांग्रेस के ये नेता इस बात का समर्थन करते हैं कि कुर्सी पर कोट टांग घंटों गायब रहकर चाय-पान की दुकान पर गपियाने वाले कुछ मुट्ठीभर कर्मचारी बिना काम किए ही मोटी पगार लेते रहें और बड़ी तादाद में कर्मचारी बैल की तरह काम में अकेले ही खटते रहें। लापरवाह कर्मचारियों के अटेंडेंस की बात आए तो वही लोग आंदोलन को बतौर हथियार इस्तेमाल करने लगें। यह तो गलत तरीका है। गंभीर मसला तो यह है कि फर्जी तरीके से जाली दस्तावेज लगाकर यहां नौकरी करने वाले कर्मचारियों की तादाद दो सौ से ज्यादा है। इनकी नियुक्तियां सन 1990 से लेकर सन 2000 के बीच हुई है। फर्जी नियुक्तियां कराने के लिए यहां कई रैकेट काम कर रहे हैं। भरोसेमंद सूत्रों का दावा है कि कारगर तरीके से जांच कराने पर कई चौंकाने वाले रहस्य उजागर होंगे।
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


