इलाहाबाद में राजकीय बालगृह में रखे गए बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। शहर के प्रमुख हिस्से शिवकुटी में स्थित बालगृह में बच्चों को जिंदगी जीने की दरकार है। मनमानी और लापरवाही किसी भी आम आदमी का दिल दहला देने को काफी है। छह महीने पहले शिवकुटी के बालगृह में मासूम बच्चियों के साथ दुराचार की घटनाओं के खुलासे ने खासा बवंडर मचाया था। यह शर्मनाक घटनाएं यहां के कर्मचारियों की मिलीभगत से लगातार हो रही थी। मीडिया ने मामला उछाला तो शासन-प्रशासन की कुंभकर्णी नींद खुली। कुछ कर्मचारियों के निलंबन के बाद शासन-प्रशासन ने फिर आंख मूंद ली। गड़बड़ियों के गढ़ बन चुके केंद्र में पटरी से उतर चुकी व्यवस्था को दुबारा पटरी पर लाने का कोई कारगर प्रयास नहीं किया गया। दिल दहला देने वाली करतूत का एक बार फिर खुलासा हुआ, जब यहां उचित देखभाल के अभाव में चार दिनों के भीतर एक-एक कर तीन मासूम बच्चों की मौत हो गई। इन बच्चों का उचित समय से इलाज नहीं किया गया। देखभाल के अभाव ने तीन बेजुबान मासूमों की जिंदगी छीन ली।
अदिति, बेबी और जगत की मौत ने व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े किए हैं। भगवान जाने यहां कभी मौका मुआयना होता भी है या नहीं? मौके पर जो दशा दिखती है पता नहीं क्यों वह लाल-नीली बत्ती की कार और हूटर लगे कार से चलने वाले नेता अफसरों को नहीं दिखती। यहां एक सीलनभरे कमरे में करीब चालीस बच्चे एक साथ रहते हैं। यह तब है जब दो बच्चों को एचआईवी पॉजिटिव बीमारी से ग्रस्त पाया गया है। गंदगीभरे इस कमरे में एक अदद खिड़की तक नहीं है। यहां रहने वाले बच्चों को उनकी निर्धारित खुराक तक नहीं दी जा रही है। ज्यादातर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। नाम का खुलासा न होने की शर्त पर कई लोग दबी जुबान दावा करते हैं कि यहां फिर से मासूम बच्चों को हवस का शिकार बनना पड़ रहा है। इस बात की सच्चाई तो किसी उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच के बाद ही सामने आ सकती है पर इतना तो सच है कि छह महीने पहले यहां कई मासूमों से लगातार दुराचार किए जाने की घटना उजागर हो चुकी है। यहां के कर्मचारी पर मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेजा जा चुका है।
इस केंद्र में 18 कर्मचारियों की नियुक्ति की गई है पर ज्यादातर घर बैठे तनख्वाह ले रहे हैं। अधीक्षक रात में परिसर में न रूककर यहां से दूर अपने बंगले में चली जाती हैं। जबकि दुराचार की घटनाओं के उजागर होने पर हाईकोर्ट ने अधीक्षक को रात में केंद्र परिसर में ही रूकने का निर्देश दे रखा है। शिशुओं के देखभाल के लिए यहां दो नर्सेज की नियुक्ति है पर अक्सर ड्यूटी से वे गायब रहती हैं। दूध की जगह बेसन का घोल बच्चों को पीने के लिए दिया जा रहा है। दूध का पैसा कर्मचारियों की जेब में जा रहा है। प्रतिबंध के बावजूद यहां पुरुषों की आवाजाही बेरोकटोक जारी है। कहते हैं कि मानव योनि सर्वश्रेष्ठ है और बच्चे भगवान का रूप होते हैं। अगर यह सच है तो महज कुछ महीने दुनियां में आकर आंख खोलने वाले मासूम बच्चे जो दाना-पानी, तन ढंकने को कपड़े, दवा देखभाल और प्यार-दुलार से महरूम हैं, जीते जी नर्क भोगने का कष्ट उठाने वाले इन मासूम बच्चों को किन कर्मों की सजा दी जा रही है। समाज और व्यवस्था के ठेकेदारों! सुनो-सुनो इन मासूमों की दिल दहला देने वाली चीत्कार।
बालगृह से लौटकर शिवाशंकर पांडेय की रिपोर्ट. लेखक इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार हैं.


