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1857 में शुरू हुआ आजादी का संघर्ष आज भी जारी है

: बीएन गौड़ के प्रबन्ध काव्य का लोकार्पण : हिन्दी के वरिष्ठ कवि ब्रहमनारायण गौड़ ‘विप्लव बिड़हरी’ के नये प्रबन्ध काव्य ‘मै अट्ठारह सौ सत्‍तावन बोल रहा हूँ’ का 10 सितम्बर 2011 को लखनऊ में लोकार्पण हुआ तथा इस काव्य कृति पर व्यापक चर्चा भी हुई। जन संस्कृति मंच (जसम) के तत्वाधान में यह कार्यक्रम लोहिया मजदूर भवन में आयोजित हुआ। लोकार्पण हिन्दी उर्दू के जाने माने लेखक शकील सिद्दीकी द्वारा किया गया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि यह कृति बी एन गौड़ के अन्दर की आग से हमें परिचित कराती है। इनके अन्दर एक बेचैनी है। यह बेचैनी शोषक व्यवस्था को बदलने की है। वे इसे कविता के माध्यम से व्यक्त करते हैं। इसी प्रक्रिया में उनकी 1857 पर यह कृति सामने आई हैं। गौड़ जी के अनुसार 1857 का संग्राम जनता का मुक्ति युद्ध है जो आज भी जारी है तथा गौड़ जी इसे जारी रहने का आह्वान करते हैं।

: बीएन गौड़ के प्रबन्ध काव्य का लोकार्पण : हिन्दी के वरिष्ठ कवि ब्रहमनारायण गौड़ ‘विप्लव बिड़हरी’ के नये प्रबन्ध काव्य ‘मै अट्ठारह सौ सत्‍तावन बोल रहा हूँ’ का 10 सितम्बर 2011 को लखनऊ में लोकार्पण हुआ तथा इस काव्य कृति पर व्यापक चर्चा भी हुई। जन संस्कृति मंच (जसम) के तत्वाधान में यह कार्यक्रम लोहिया मजदूर भवन में आयोजित हुआ। लोकार्पण हिन्दी उर्दू के जाने माने लेखक शकील सिद्दीकी द्वारा किया गया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि यह कृति बी एन गौड़ के अन्दर की आग से हमें परिचित कराती है। इनके अन्दर एक बेचैनी है। यह बेचैनी शोषक व्यवस्था को बदलने की है। वे इसे कविता के माध्यम से व्यक्त करते हैं। इसी प्रक्रिया में उनकी 1857 पर यह कृति सामने आई हैं। गौड़ जी के अनुसार 1857 का संग्राम जनता का मुक्ति युद्ध है जो आज भी जारी है तथा गौड़ जी इसे जारी रहने का आह्वान करते हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कवि व जसम के प्रदेश उपाध्यक्ष भगवान स्वरूप कटियार ने कहा कि आमतौर से वृद्धावस्था में मनुष्य के अन्दर निराशा का भाव आ जाता है लेकिन बी एन गौड़ की उम्र अस्सी के पास पहुँच रही है, पर आज भी नौजवान है तथा इस उम्र में भी उनकी सामाजिक व सांस्कृतिक सक्रियता प्रेरणादायक है। 1857 जैसे विषय पर काव्य प्रबन्ध लिखना हमेशा से चुनौतीपूर्ण कार्य है। पर बी एन गौड़ ने ऐसी चुनौती को बार बार स्वीकार किया हैं। इसी तरह की रचना उन्होंने लेनिन, शहीद उधम सिंह, महाभारत की पात्र द्रोपदी के जीवन पर भी केन्द्रित करके लिखा है। गौड़ जी की यह कृति ऐसे समय में आई है जब भ्रष्ट राजसत्‍ता जनता के अहिंसात्मक आंदोलनों के दमन पर उतारू है। 1857 का संग्राम ऐसा ही संग्राम था जिसमें औपनिवेशिक सत्‍ता के खिलाफ देश की जनता ने आजादी के संघर्ष में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। बी एन गौड़ की यह कृति न सिर्फ इस आंदोलन से हमें रू-ब-रू कराती है बल्कि जन आंदोलनों के महत्व को भी रेखांकित करती है।

जाने माने कवि व आलोचक चन्द्रेश्वर ने इस कृति पर बोलते हुए कहा कि यह बी एन गौड़ की महत्वपूर्ण काव्यकृति है। इस काव्यकृति के जरिए 1857 के संघर्षों और मूल्यों को उभारा गया है ताकि वर्तमान को और ज्यादा प्रेरक बनाया जा सके। यह काव्यकृति पद्यमश्रित चम्पू काव्य की तरह है। यह रचना हिन्दी के बड़े राष्ट्रीय चेतना सम्पन्न कवियों जैसे मैथिली शरण गुप्त, सुभद्रा कुमारी चौहान, दिनकर आदि का स्मरण कराती है। आज जब कि हिन्दी की समकालीन कविता अत्यधिक बौद्धिक व गद्यपरक होने के चलते पाठक विमुख होती जा रही है, ऐसे में बी एन गौड़ का प्रयास सराहनीय है। इनकी कविता जन सरोकारों से जुड़ी हैं जो जन में जाकर लोकप्रियता हासिल करने का हुनर भी रखती है।

पुस्तक चर्चा की शुरुआत करते हुए कवि व जसम के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि बी एन गौड़ की यह कृति ‘‘मैं अट्ठारह सौ सत्‍तावन बोल रहा हूँ’ इतिहास के स्थापित दृष्टिकोण को खण्डित करती है तथा उस इतिहास निर्मात्री जनता और उसके नायकों को सामने लाती है। यह प्रबन्ध काव्य 1857 का मात्र आख्यान नहीं है। इसमें आजादी की उस भावना की अभिव्यक्ति है जो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से लड़ते हुए पैदा हुई, 1857 के महासंग्राम में पहली बार सबसे मजबूती से सामने आई तथा 1947 के साथ उसका भले एक चरण पूरा हुआ हो लेकिन वह जनता के नये हिन्दुस्तान के निर्माण के संघर्ष के रूप में आज भी जारी है, जिसे आज ‘दूसरी आजादी’ नाम दिया जा रहा है। बी एन गौड़ के इस प्रबन्ध काव्य में कविता और साहित्य के विविध रूपों का दर्शन होता है। यहाँ पद्य, गद्य, तुकान्त, अतुकान्त, नाटक, कहानी, दोहे, चौपाई, भाषण आदि है। इसे कविता की तरह पढ़ा जा सकता है तो ढोल-मजीरा पर आल्हा की तरह गाया भी जा सकता है।

फैजाबाद से आये लेखक व पत्रकार कृष्ण प्रताप ने कहा कि आज के हालात तो 1857 के दौर से भी ज्यादा भयानक है। उस वक्त हमारे सामने विदेशी सत्‍ता थी। कौन हमारा दुश्मन है, हमें किससे लड़ना है, यह साफ था। पर आज देशी शासक हैं जो साम्राज्यवादी हितों के पोषक हैं। विचार के क्षेत्र में भी बड़े-बड़े भ्रम पैदा किये जा रहे हैं। आज के हालात ज्यादा जटिल हैं। धर्म, जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र के आधार पर यह हमें अन्दर से विभाजित किया जा रहा है। ऐसे में हमें अपने हथियारों को ज्यादा ही धारदार बनाने होंगे। गौड़जी जैसे बुजुर्ग साथी आज भी अपने वैचारिक हथियारों को तेज किये हुए हैं, नई पीढ़ी को ऐसे लोगों की दृढ़ता व संकल्पबद्धता से सीखने की जरूरत है। इस मौके पर कथाकार नसीम साकेती, जानकी प्रसाद गौड़, अलग दुनिया के केके वत्स, बालमुकुन्द धूरिया आदि ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संयोजन जसम के कौशल किशोर ने किया।

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