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इस गांव में 21 साल से नहीं आई कोई बहू

: सरहद के गांव का दर्द और कुंवारों की फौज : बाड़मेर। भारत-पाकिस्तान की सरहद पर बसा बाड़मेर जिला, जिसके रेगिस्तानी गांव ऐसे दुरूह स्थानों पर बसे हैं कि इन गांवों तक पहुंचना ही मुश्किल होता है। बाड़मेर जिले की जैसलमेर से लगती सीमा पर बसा सरहदी नोडियाला गांव। खबड़ाला ग्राम पंचायत का राजस्व गॉव है नोडियाला। यह गांव राजपूत बाहुल्य है जहां सोढ़ जाति के राजपूत रहते हैं। लगभग साठ परिवार इस जाति के हैं वहीं कुछ परिवार राणा राजपूत तथा मेगवाल जाति के हैं। इस गॉव में पहुंचना टेढ़ी खीर के समान है।

: सरहद के गांव का दर्द और कुंवारों की फौज : बाड़मेर। भारत-पाकिस्तान की सरहद पर बसा बाड़मेर जिला, जिसके रेगिस्तानी गांव ऐसे दुरूह स्थानों पर बसे हैं कि इन गांवों तक पहुंचना ही मुश्किल होता है। बाड़मेर जिले की जैसलमेर से लगती सीमा पर बसा सरहदी नोडियाला गांव। खबड़ाला ग्राम पंचायत का राजस्व गॉव है नोडियाला। यह गांव राजपूत बाहुल्य है जहां सोढ़ जाति के राजपूत रहते हैं। लगभग साठ परिवार इस जाति के हैं वहीं कुछ परिवार राणा राजपूत तथा मेगवाल जाति के हैं। इस गॉव में पहुंचना टेढ़ी खीर के समान है।

 

विकास से इस गॉव का कोई लेना-देना नहीं। गॉव के लोग गॉव से बाहर नहीं जाते, गॉव में ही मस्त रहते हैं। इस गांव में कुंवारों की फौज खड़ी हैं। हर परिवार में कुंआरे हैं। कहीं का भी कोई भी परिवार अपनी लाडली बेटियों को इस गांव के किसी परिवार में ब्याहना ही नहीं चाहता। इस संबंध में ग्रामीणों से बाततीच करने पर पता चला कि नोडियाला गांव में ऐसा कुछ भी नहीं है कि कोई अपनी बच्ची को इस गांव में ब्याह दे। गॉव में पानी की किल्लत सबसे बड़ी समस्या है। पानी के लिए ग्रामीणों को ग्राम पंचायत मुख्यालय खबडाला तक प्रतिदिन पानी भरने जाना पडता है। गांव में पानी की एक हौज बनी है, जिसमें अंतिम बार पानी कब आया किसी को याद नहीं है। इस गांव में कुछ अच्छा है तो वो है पशुधन की बाहुल्यता। इस गांव में आने
वाले मेहमान को दूध तो आसानी से मिल जाएगा मगर पानी की एक बूंद मिलना मुश्किल है।

गांव के खंगार सिह सोढ़ बताते हैं कि गॉव बाडमेर जिले में है, मगर जैसलमेर जिला नजदीक लगता है, जिसके कारण गॉव का सारा लेन-देन-व्यापार जैसलमेर से है। सबसे बड़ी बात है कि इस गांव में न तो सरकारी कारिन्दे आते हैं न ही नेता लोग आते हैं,जिसके कारण गांव में विकास नहीं हो रहा। गांव अभी तक सड़क मार्ग से नहीं जुड़ा। कहने को सरकारी प्राथमिक स्कूल हैं मगर अध्यापक नहीं हैं, इस कारण बन्द पड़ा है। गॉव के बच्चे अनपढ़ हैं। युवा वर्ग पहले से ही अनपढ़ है। गॉव में किसी प्रकार का रोजगार नहीं है।

इस गॉव में कोई परिवार अपनी बालिका को ब्याहना नहीं चाहते। जिसके कारण गॉव के अधिकतर लोग कुंआरे हैं। सतर फीसदी घरों में बहुएं नहीं हैं। कुंआरे लोग अपने घर का काम खुद ही करते हैं। इस गॉव में 21 साल से कोई बहू नहीं आई। सत्तर साल तक के लोग कुंवारे बैठे हैं। इस गांव के सोढ़ परिवार भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय तथा कुछ परिवार 1971 व 1965 के युद्ध के दौरान पाकिस्तान से पलायन कर यहां आकर बसे हैं। गांव के गुलाब सिह ने बताया कि बहुत पहले गॉव में भोखावटी के परिवारों के साथ रिश्ते हुए थे। चार-पांच परिवारों में बहुएं भी आई थीं, मगर जब गांव की स्थिति तथा वास्तविकता का पता चला गांव में रिश्तेदारियां होना बन्द हो गया। एक तरह सें शादियों पर ग्रहण सा लग गया। परिवार नहीं बस पा रहे हैं। मेरे पॉच भाई हैं जो आज भी कुंवारे हैं उनके रिश्ते के लिए हर सम्भव प्रयास किए कोई फायदा नहीं हुआ।

हालांकि दूसरी जाति के परिवारों में भी शादियां नहीं हो रही हैं। आसपास के गांवों में लोग अपनी बेटियां देते हैं, पर इस गांव पर कोई मेहरबान होने को तैयार नहीं। जिसके कारण कुंवारों की फौज खड़ी हो रही है। बाडमेर जिले का अंतिम गॉव होने के कारण इसके विकास पर कोई सरकार ध्यान नहीं देती। इस गॉव में पहुंचने के लिऐ जैसलमेर जिले के कई गॉवों से होकर गुजरना पड़ता है।

बाड़मेर से चंदन भाटी की रिपोर्ट.

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