Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

ये दुनिया

गरीबों के साथ यह बेशर्मी क्यों?

योजना आयोग की कोशिश गरीबी कम करने में नहीं, गरीबों की संख्या कम करने में है। उसने गरीबी-रेखा के मानकों को कम करके गरीबी में कमी लाने के आंकड़े जारी कर दिए हैं। लेकिन सवाल यह है कि आंकड़ों की यह बाजीगरी देश के साथ धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है! क्या इस तरह की धोखाधड़ी करने वाले प्लानिंग कमीशन पर कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? इस मुद्दे पर चर्चा की मुकेश कुमार ने। प्रस्तुत है उसके प्रमुख अंश….

योजना आयोग की कोशिश गरीबी कम करने में नहीं, गरीबों की संख्या कम करने में है। उसने गरीबी-रेखा के मानकों को कम करके गरीबी में कमी लाने के आंकड़े जारी कर दिए हैं। लेकिन सवाल यह है कि आंकड़ों की यह बाजीगरी देश के साथ धोखाधड़ी नहीं तो और क्या है! क्या इस तरह की धोखाधड़ी करने वाले प्लानिंग कमीशन पर कानूनी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए? इस मुद्दे पर चर्चा की मुकेश कुमार ने। प्रस्तुत है उसके प्रमुख अंश….

सज्जन सिंह वर्मा (नेता, कांग्रेस) : मैं योजना आयोग के खिलाफ हूं। क्योंकि ये वे लोग हैं, जो जमीनी हकीकत की धरातल को पहचानते ही नहीं हैं। मैंने पहले ही कहा था, मोंटेक सिंह अहलूवालिया और उनकी जो पूरी योजना आयोग की टीम है, उनको इतनी राशि देकर एक महीने के लिए गांव में छोड़ दो। पता चल जाएगा कि गरीब का परिहास उड़ाना कितना आसान है। योजना बनानी है, तो धरातल पर आओ और देखो कि किस तरह गांव में लोग रहते हैं। मेरी आवाज यदि मेरे हाईकमान तक पहुंच जाए, तो हो सकता है कि कुछ ठीक-ठाक निर्णय लिया जाए। गरीब को और गरीब परिभाषित करने की साजिश कर रहे हैं ये लोग। सच तो यह है कि गरीब को और कमजोर करने की साजिश कर रहे हैं ये लोग।

हाईकमान तक आवाज पहुंचाना चाह रहे हैं, सज्जन सिंह जी। अब यह सवाल उठता है कि क्या हाईकमान टीवी देखता है? क्या हाईकमान अखबार पढ़ता है? क्या हाईकमान को कुछ पता होता है? सच तो यह है कि जब एक सांसद आवाज उठाएगा, तो उसकी आंखें खुलेंगी?

दीपांकर भट्टाचार्य (महासचिव,सीपीआई एमएल) : योजना आयोग सिर्फ मोंटेक सिंह अहलूवालिया नहीं हैं, क्योंकि मनमोहन सिंह योजना आयोग के अध्यक्ष हैं। दरअसल, योजना आयोग का जो आंकड़ा आया है, उसे देखकर मुझे यही लगता है कि इस आंकड़े ने न केवल गरीबों के साथ मजाक किया है, बल्कि इस देश के पूरे लोकतंत्र को अपमानित किया है। जब 26 रुपये और 32 रुपये का पैमाना तय किया गया था, उस समय देश में इतनी बहस हुई कि सुप्रीम कोर्ट तक बहस गई। योजना आयोग ने भी कहा था कि हम इस पर फिर से विचार करेंगे। उस विचार का यह नतीजा सामने आया कि अब वे कह रहे हैं कि 22 रुपये और 28 रुपये गरीबी का पैमाना है। आश्चर्य की बात तो यह है कि महंगाई लगातार बढ़ रही है और आप कह रहे हैं कि 22 रुपये और 28 रुपये में लोग आराम से जिंदगी बसर कर सकते हैं। सच तो यह है कि ऐसा करके न केवल अर्थशास्त्र का पूरा मजाक उड़ाया गया है, बल्कि यह देश के गरीबों के साथ भी मजाक है। पूरे देश के लोगों की जो मांग है, उसका मजाक है। यह सरकार पूरी तरह से गरीब विरोधी है। जिस सरह से इंडिया शाइनिंग का नारा देश के लिए मजाक था, उसके लिए एनडीए सरकार को जो सजा मिली। मैं समझता हूं कि गरीबी के इस भ्रामक आंकड़े देने के लिए, गरीबों के साथ यह मजाक करने के लिए, यूपीए को भी बिल्कुल उसी तरह से सजा मिलनी चाहिए। यह सरकार पूरी तरह से देश के यथार्थ से, गरीबों से, समाज के बड़े हिस्सों से कटी हुई है।

आलोक पुराणिक (वरिष्ठ अर्थशास्त्री) : आप देखेंगे कि 1,20 करोड़ की जनसंख्या, जो भारत की है, उसका पांच करोड़ की जनसंख्या जो है, वह अपने रहन-सहन में अमेरिका जैसा है। करीब 20 करोड़ की जनसंख्या वाला मिडिल क्लास अपने रहन-सहन में मलेशिया जैसा है। 80 से 90 करोड़ का भारत जो है, वह यूगांडा, बांग्लादेश है। तो ये 80 करोड़ लोग लोकतंत्र में तब आते हैं, जब चुनाव होते हैं। इस तरह के आंकड़ों का उद्देश्य यह है कि जो तमाम सारी लाभकारी योजनाएं हैं, उनको ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाभ पहुंचाने से वंचित करना है। 2014 में चुनाव होने हैं और मैं कांग्रेस से ज्यादा उम्मीद नहीं करता हूं। 2009 के चुनाव परिणाम को देखें, तो उसकी सफलता का सबसे बड़ा कारण मनरेगा को लेकर था, जिसको उन्होंने ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाया था। 2014 तक मुझे लगता है कि वे उन सारे मसलों पर विचार करेंगे और एक नया एजेंडा लेकर आएंगे।

शेष नारायण सिंह (वरिष्ठ पत्रकार) : जो लोग सरकार के कर्ता-धर्ता हैं, वे जिस तरह का अर्थशास्त्र पढ़ कर आए हैं, उस अर्थशास्त्र में माना जाता है कि आप ऊपर के लोगों को बहुत ज्यादा अरबपति कर दो। ऊपर वालों को संपन्न कर दो, तो संपन्नता नीचे छनेगी। और इस देश का जो सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि वर्ल्ड बैंक के एजेंडे को लागू करने वाले डॉ. मनमोहन सिंह और मोंटेक अहलूवालिया इस देश के अर्थशास्त्र के चौधरी बने हुए हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि किसी भी दूसरी राजनीतिक पार्टी में एक भी अर्थशास्त्री नहीं है, कांग्रेस पार्टी को छोड़ दीजिए। कहीं भी कोई अर्थशास्त्र का ज्ञाता नहीं है, जो उनको वहीं पर घेर ले। सज्जन सिंह जो बात कह रहे हैं, वह एक प्रतिनिधि के तौर पर, एक गरीब की बात है। जो दर्द को समझता है। लेकिन जब उस दर्द को आंकड़ों में करने की बात आती है, तो वे कहीं और चले जाते हैं।

विपक्षी दल सत्ता मोह में और अपने में ही उलझे हुए हैं ?

अर्जुन मेघवाल (नेता, भाजपा) : अभी संसद सत्र चल रहा है और हमारा काम ही यह कहना है कि ये आंकड़े गलत हैं। इसके लिए हम हंगामा भी करेंगे। इसमें जरूरत पड़ी, तो सड़क तक भी जाएंगे। देश की जनता देख नहीं रही है, ऐसा नहीं है। बावजूद इसके प्लानिंग कमीशन ने आंकड़े गढ़े हैं। मेरी समझ में नहीं आता है कि क्या प्लानिंग कमीशन संविधान से भी ऊपर है? उसको पता नहीं है कि 22 रुपये और 28 रुपये में कैसे काम चलेगा? इससे ज्यादा शर्मनाक बात यह है कि फूड सिक्योरिटी बिल आ रहा है। बीपीएल के आंकड़े को लेकर सरकार और प्लानिंग कमीशन में विवाद है। सरकार कहती है कि हमें फूड सिक्योरिटी बिल लाना ही लाना है, लेकिन प्लानिंग कमीशन कहता है कि मुझे कैप लगाना ही लगाना है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इस मकड़जाल में देश की जनता को भ्रमित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फटकार के बाद भी प्लानिंग कमीशन की इतनी हिम्मत हो गई कि उसने कह दिया कि न ही 22 रुपये खर्च करने वाला गांव का आदमी गरीब है और न ही शहर का 28 रुपये खर्च करने वाला गरीब है। यह प्लानिंग कमीशन का मजाक नहीं है तो क्या है? मेरा मानना है कि प्लानिंग कमीशन को फटकार लगनी चाहिए। इस तरह के आंकड़े देकर क्या जताना चाहता है आयोग?

प्रस्‍तुति – पवन जायसवाल

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...