नेशनल आरटीआई फोरम की कन्वेनर डॉ नूतन ठाकुर द्वारा शस्त्र लाइसेंस के आवेदनों को काफी समय तक अकारण लंबित रखने सम्बंधित दायर जनहित याचिका संख्या 2425/2012 में इलाहाबाद हाई कोर्ट, लखनऊ बेंच ने कड़ा रुख अख्तियार किया है. जस्टिस उमा नाथ सिंह और जस्टिस वी के दीक्षित की बेंच ने कहा कि इस तरह से मामलों को लंबित रखने से भ्रष्टाचार पनपता है और लोगों को असुविधा होती है. उन्होंने इस सम्बन्ध में समस्त तथ्यों से अवगत कराने हेतु राज्य सरकार को निर्देशित किया है और गृह मंत्रालय, भारत सरकार को भी पार्टी बनाए जाने के निर्देश दिये हैं.
इस रिट याचिका में डॉ ठाकुर ने उत्तर प्रदेश सरकार के शस्त्र लाइसेंस सम्बंधित एक शासनादेश दिनांक 3 जून 1998 प्रस्तुत किया. इस शासनादेश में यह कहा गया है कि सम्बंधित थानाध्यक्ष अधिकतम 20 दिनों में शस्त्र जांच सम्बंधित अपनी आख्या डीएम को प्रेषित करेंगे जबकि उप जिलाधिकारी को अधिकतम 30 दिनों में अपनी आख्या देने के आदेश हैं. डीएम को यह निर्देश दिये गए हैं कि वे अधिकतम तीन माह में शस्त्र लाइसेंस आवेदन का निस्त्रारण करेंगे.
आरटीआई के जरिये प्राप्त सूचनाओं के माध्यम से डॉ ठाकुर ने यह प्रमाणित किया कि इस शासनादेश का खुला उल्लंघन हो रहा है. उन्नाव जिले की सूचना के अनुसार 2007 में 602 आवेदनपत्रों पर विभिन्न एसडीएम ने 30 दिनों में अपनी आख्या नहीं दी जबकि 2008 में यह संख्या 242, 2009 में 111, 2010 में 137 तथा 2011 में 219 थी. इसी प्रकार से इन पांच सालों में मात्र 11 मामलों में थानों से निर्धारित 20 दिनों में आख्या मिल सकी थी. 12 फरवरी 2012 की रिपोर्ट के अनुसार गाजियाबाद में कुल 9592 आर्म्स लाइसेंस आवेदन पत्र लंबित थे जिनमे 5475 आवेदन 6 माह से ऊपर तथा 4117 एक साल से ऊपर के थे. मुरादाबाद में 20 दिसंबर 2010 को 5416 आवेदन लंबित थे जिनमे 1877 वर्ष 2007 के, 1402 वर्ष 2008, 881 वर्ष 2009 तथा 1256 वर्ष 2010 से लंबित थे.
डॉ ठाकुर ने अनुरोध किया है कि प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी, यूपी को आदेशित किया जाए कि वे सभी डीएम और एसपी को इस शासनादेश का पूर्ण अनुपालन करने के निर्देश दें. साथ ही यह भी प्रार्थना की गयी कि जो भी अधिकारी इस शासनादेश का उल्लंघन करता है उसके विरुद्ध नियमानुसार दंडात्मक कार्यवाही की जाए. सुनवाई की अगली तिथि 05 अप्रैल 2012 लगी है.


