मण्डी : चुनावों के नजदीक आते ही सियासी दलों को प्रदेश के मतदाताओं की याद आने लगती है। सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी तो विधानसभा में लोक-लुभावन बजट के सहारे प्रदेश संगठन के प्रमुख सतपाल सत्ती के नेतृत्व में संगठित हो चुनावी मैदान में उतरने के लिए तैयार हो रही है। वहीं कांग्रेस के कुछ नेता संगठन की अनदेखी करते हुए अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए अपने अलग एजेंडे पर चल रहे हैं। विगत 24 से 26 मार्च तक प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष ठाकुर कौल सिंह ने जहां ऊना जिले में संगठन को मजबूत करने दिशा में दौरा कर कार्यकर्ताओं में नई उर्जा का संचार किया वहीं दूसरी ओर मंडी जिले से सांसद और केन्द्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह द्वारा कांगड़ा जिले में किये गए दौरे से स्थानीय कार्यकर्ताओं को संगठित करने की अपेक्षा असमंजस की स्थिति में डाल गया है।
कुछ कार्यकर्ताओं और नेताओं को तो यहां तक कहते सुना गया कि दिल्ली की सरकार में मंत्री पद पर आसीन केंद्रीय मंत्री वीरभद्र सिंह को चुनावी साल में पहाड़ की याद कुछ ज्यादा ही आने लगी है। यह तो सभी जानते हैं कि छठी बार मुख्यमंत्री बनने की उनकी हसरत जोर पकडऩे लगी है और इस कड़ी में उनके समर्थक विधायक और पूर्व विधायक भी जुट गए हैं। कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं के इस प्रकार के आचरण से जहां एक और प्रदेश कांग्रेस में गुटबाजी की जड़ें और गहराने लगी हैं वहीं राष्ट्रीय अध्यक्षा सोनिया गांधी के निर्देशानुरूप बनाया गया प्रदेश संगठन असहाय सा महसूस कर रहा है। एक ओर ऊना में प्रदेशाध्यक्ष कौल सिंह जहां गुटबाजी को नकारते हुए वीरभद्र सिंह को दल का सम्मानीय नेता बता रहे थे वहीं बीते सप्ताह कांगड़ा के ज्वाली में हुई सत्ता-परिवर्तन रैली में हिमाचल प्रदेश कांग्रेस की गुटबाजी एक बार फिर सार्वजनिक हो रही थी। सत्ता-परिवर्तन के नाम पर आयोजित रैली में न केवल कांगड़ा जिला के वीरभद्र भक्त विधायकों ने अपनी ताकत झोंकी बल्कि कांगड़ा जिला के बाहर के विधायकों मुकेश अग्रिहोत्री, राकेश कालिया व राम लाल ठाकुर जैसे नेताओं ने भी रैली में भीड़ जुटाने के लिए जबरदस्त प्रयास किया।
ऊना में प्रदेशाध्यक्ष के दौरे में उपस्थित रहने की अपेक्षा कांगड़ा रैली को अधिक महत्व देने वालों ने रैली के मंच प्रयोग भाजपा व वर्तमान धूमल सरकार को निशाने पर रखने के बजाय कांग्रेस में अपनों से निपटने व प्रदेशाध्यक्ष ठाकुर कौल सिंह को चुनौती देने के लिए अधिक किया. बड़ी बात तो यह थी कि रैली में मुख्यातिथि के रूप में शिरकत कर रहे केंद्रीय मंत्री वीर सिंह ने अपने किसी भी समर्थक विधायक व पूर्व विधायक को ऐसा करने से नहीं रोका। वीरभद्र सिंह ने भी बातों ही बातों में यह कह दिया कि उन को किसी पद की लालसा नहीं है, हाईकमान जो कहेगी मैं वही करुंगा लेकिन कुछ कांग्रेसी ही मेरा रास्ता रोक रहे हैं। राजा के समर्थक विधायक उन को आने वाला मुख्यमंत्री कह कर पार्टी के अन्य नेताओं को चुनौती देते रहे लेकिन केंद्रीय मंत्री ने किसी को भी इस प्रकार के उद्घोष करने से नहीं रोका। रैली के मंच से संबोधनों पर अगर गौर किया जाए तो ऐसा प्रतीत होता था कि मानों यह रैली प्रदेश में सत्ता-परिवर्तन के बजाय प्रदेश कांग्रेस में ही अपनों को उखाड़ फेंकने के लिए की जा रही हो। बड़ी बात तो यह भी है कि वीरभद्र सिंह की ज्वाली रैली में ऐसे पूर्व विधायक भी मंच पर उपस्थित थे और गाडिय़ां भर कर समर्थकों को लेकर पहुंचे थे, जो अपने क्षेत्रों की कांग्रेस की बैठकों में न तो शिरकत कर रहे हैं और न ही कांग्रेस के कार्यक्रमों को जनता के बीच ले जाने में किसी भी प्रकार का सहयोग कर रहे है क्यों कि संगठन से अलग उनका अपना ही एजेंडा हैं।
बताया गया कि सुलह के पूर्व विधायक जगजीवन पाल भी उनमें से एक हैं। सुलह कांग्रेस की किसी भी बैठक में महीनों से नहीं जाने वाले जगजीवन पाल ज्वाली में दो दर्जन वाहनों में समर्थकों को लेकर जरूर गए। इसके अतिरिक्त अनेक ऐसे लोग रैली में मंच की शोभा बने थे जो अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों में ब्लॉक कांग्रेस के लिए मुसीबत बने हुए हैं। यही नहीं यह भी जा रहा है कि मंच से प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व को कोसने वालों को वीरभद्र सिंह सहित किसी ने भी रोकने का प्रयत्न तक नहीं किया। जिला कांगड़ा के जीएस बाली व बृज बिहारी बुटेल सहित अनेक बड़े व कद्दावर नेताओं के वीरभद्र सिंह की सत्ता-परिवर्तन की रैली में शिरकत न करने की वजह पूछने पर बताया कि प्रदेश में रैलियों के कार्यक्रम पूर्व में प्रदेश कांग्रेस तय किया करती थी लेकिन ज्वाली में आयोजित की गई रैली के बारे में प्रदेश कांग्रेस कमेटी की ओर से किसी प्रकार के निर्देश प्राप्त नहीं हुए थे। जिला कांग्रेस कमेटी और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कई सदस्यों ने इस बात से इनकार किया कि उन को रैली में शामिल होने के लिए किसी भी प्रकार की सूचना दी गई थी। इसके ठीक विपरीत वह यह जानना चाहते थे कि इस रैली का आयोजक कौन है? उन का कहना था कि अगर प्रदेश कांग्रेस और जिला कांग्रेस की ओर से न्यौता मिलता तो वे रैली में जरूर शिरकत करते। राजनीतिक हलकों में ऐसी चर्चा है कि ज्वाली में आयोजित सत्ता परिवर्तन रैली कांग्रेस को मजबूत करने के बजाय गुटबाजी की जड़ों को और मजबूत कर गई जिसका अन्ततोगत्वा लाभ भाजपा को ही मिलेगा।
सत्ता-परिवर्तन प्रदेश में या कांग्रेस में ऐसी नई चर्चा प्रदेश में शुरु हो गई है। कांग्रेस को मजबूत करने में जुटे निष्ठावान कार्यकर्ताओं के मन में ज्वाली रैली के संदेश ने गहरा धक्का दिया है। हिमाचल प्रदेश में वीरभद्र सिंह मतलब कांग्रेस और कांग्रेस मतलब वीरभद्र सिंह कहने से लोग यह सोचने को मजबूर हैं कि हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस बड़ी है या वीरभद्र सिंह। संगठन बड़ा है या व्यक्ति विशेष पूर्व में वीरभद्र सिंह की यही सोच पार्टी को सत्ता से बाहर करने का कारण बनी थी और पार्टी के कई बड़े नेता उन के व्यवहार के कारण पार्टी से बाहर गए लेकिन इस के बावजूद वीरभद्र सिंह ने अपनी न तो चाल बदली और न ही अपनी सोच। कांगड़ा की रैली में भी उन की यह पुरानी अदा फिर दिख रही है। बहरहाल रैली तो समाप्त हो गई है और राजनीति के विशलेषकों का यह मानना है कि अगर कांग्रेस में संगठन की अनदेखी कर नेता या कार्यकर्ता असवैधानिक तरीके से निरंकुश होकर अपनी-अपनी ढपली ले अपना-अपना राग गायेंगे तो निश्चित तौर से प्रदेश कांग्रेस कार्यकर्ताओं की सत्ता परिवर्तन के लक्ष्य को लेकर की जा रही सभी तैयारियां धरी की धरी रह जाएगी और जिसका लाभ भाजपा को ही मिलेगा।
लेखक विनायक शर्मा मंडी से प्रकाशित साप्ताहिक ज्वाला मंडी के संपादक हैं. इनका लिखा ज्वाला मंडी में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लिया गया है.


