: ऐसी परीक्षा का मतलब क्या है? : प्रतापगढ़ जिले का कुंडा क्षेत्र। करेंटी इंटर कॉलेज परीक्षा केंद्र का कमरा नंबर तेरह। हाईस्कूल का एक परीक्षार्थी उत्तर पुस्तिका भर जाने के बाद बी कॉपी के लिए गिड़गिड़ा रहा था। उसे बी कॉपी नहीं दी गई। वजह, उसका नाम सुविधाशुल्क जमा करने वाली लिस्ट में दर्ज नहीं था। छात्र का कहना था कि उसे नकल की सुविधा नहीं चाहिए। जवाब मिला-दो हजार रुपए न जमा किए तो कल से परीक्षा देने मत आना। छात्र घर पहुंचा तो डिप्रशन में था। सालभर की तैयारी बेकार साबित हुई।
दृश्य नंबर दो : इलाहाबाद जिले के आनापुर स्थित एक परीक्षा केंद्र में 29 मार्च को कक्ष निरीक्षक और चपरासी आपस में भिड़ गए। चपरासी का गुस्सा इसलिए फूटा कि कक्ष निरीक्षक अपने खास लोगों को ही नकल करा रहा है, उसके लिस्टेड छात्र-छात्राओं को नहीं। यहां चपरासी और कक्ष निरीक्षक दोनों ने सुविधा शुल्क ले रखा है। स्थिति हाथापाई तक जा पहुंची। इसी दिन यमुनापार के कौंधियारा स्थित एक परीक्षा केंद्र में वर्दीधारी एक सिपाही प्रधानाचार्य कक्ष में पहुंचता है, बेटे को नकल न कराने पर देख लेने की धमकी दे डालता है।
दृश्य नंबर तीन : इलाहाबाद के कोरांव क्षेत्र स्थित राजकीय इंटर कॉलेज बेरी में 17 मार्च को नकल के लिए परीक्षा केंद्र में तोड़फोड़। पुलिस का लाठीचार्ज। उपजिलाधिकारी को मौके पर पहुंचकर बेकाबू हालात संभालना पड़ा। प्रदेश में चल रही हाईस्कूल, इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा के कुछ नमूने हैं। ऐसे सैकड़ों मामले मिलेंगे, ढूंढने की कोशिश तो करिए। आलम यह कि किसी भी सभ्य समाज का चेहरा शर्म से झुक जाए। पर, जिन बेशर्मों के लिए पैसा ही सब कुछ हो गया है, उनकी सेहत पर क्या असर पड़ेगा? शासन-प्रशासन और विभाग की पंगु स्थिति कोढ़ में खाज साबित हो रही है।
माध्यमिक शिक्षा परिषद पर परीक्षा कराने का जिम्मा है, पर परीक्षा मजाक बनकर रह गई है। मुट्ठीभर शिक्षा माफिया और घूंसखोर अफसरों की वजह से समूची शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था की ऐसी तैसी हो गई है। करेंटी में जिस परीक्षार्थी का जिक्र किया गया है, उस बच्चे के गरीब पिता ने कर्ज लेकर दो हजार रुपए कॉलेज जाकर जमा किया। प्रधानाचार्य सफाई देते हैं-क्या करें, विभाग के अलावा राजा भैया को भी तीन लाख रुपए का जुगाड़ करना है। दो लाख रुपए विभाग को दिया तो परीक्षा केंद्र बना। प्रधानाचार्य की बात में कितनी सच्चाई है, यह तो वही जानें पर मामला तो गंभीर बन ही जाता है। खासकर तब, जब सरकार के मंत्री तक का नाम सामने आ रहा हो। इसके पहले बसपा शासन में शिक्षामंत्री रंगनाथ मिश्रा के नाम पर खूब उगाही की गई।
बीते 16 मार्च को इलाहाबाद के यमुनापार में मेजा के एक परीक्षा केंद्र पर बेटे की जगह उसके पिता को परीक्षा देते रंगे हाथ पकड़ा गया। उपजिलाधिकारी तक मामला पहुंचा। उधर, परीक्षा के पहले ही दिन इलाहाबाद के करछना क्षेत्र के भीरपुर इंटर कॉलेज में नकल के लिए अभिभावकों के दो पक्ष भिड़े। जबरदस्त फायरिंग हुई। एक युवक की मौत, दो अन्य लोग गंभीररूप से घायल हुए। डीआईजी समेत कई अफसर मौके पर पहुंचे। यह है दुर्दशा का आलम। देश की तरूणायी के भविष्य से इस तरह का क्रूर मजाक चौंकाने वाला ही नहीं, बल्कि चिंतनीय भी है। ज्यादा से ज्यादा नकल कराने और धन उगाही करने की होड़ है। नकल के बल पर आसानी से पास करा देने की गारंटी पर सैकड़ों किमी दूर गैर जनपद महोबा, हमीरपुर, इटावा, मैनपुरी, गाजीपुर, आजमगढ़, बलिया तक के सैकड़ों लड़के-लड़कियां इलाहाबाद के सोरांव क्षेत्र के दर्जनों कॉलेजों में परीक्षा देने आए हैं। ऐसे सैकड़ों लड़के पिछले कई साल से यहां आ रहे हैं। वहां के सैकड़ों कॉलेज छोड़ यहां इतनी दूर आकर परीक्षा देने का आखिर राज क्या है?
समाज में सम्मान पाने वाले गुरुजनों का चाल-चरित्र-चेहरा किस तरह तेजी से बदल रहा है, बोर्ड परीक्षा में इसे बखूबी महसूस किया जा सकता है। गेट पर मौजूद पुलिसकर्मियों, पैसा देने वाले अभिभावकों से धकियाये जाते, कक्ष में चौदह पंद्रह साल के बच्चों को रंगदारी के लिए डराते-धमकाते ये गुरुजन…। शिक्षकों के सम्मान में दाग लगाने वाले ये मुट्ठीभर शिक्षक…। क्या इन्हीं के लिए कबीर ने ’गुरू गोविंद दोउ खड़े काके लागूं पांय‘ की बात कही थी। और, इन बच्चों को कोर्स में इसे पढ़ाया गया था? भगवान से भी बड़ा दर्जा पाये इन गुरुजनों को रंगदारी की तरह उगाही करने के लिए कौन मजबूर कर रहा है, कॉलेज प्रबंधन, विभाग, प्रशासन या व्यवस्था? जिक्र छिड़ने पर एक शिक्षक सफाई देने के अंदाज में कहते हैं-हम तो नाहक बदनाम होते हैं, धन नीचे से ऊपर तक जाता है, इसे कौन नहीं जानता। महोबा से यहां परीक्षा देने आया एक छात्र कहता है- ददुआ डकैत को मात देने वाले ऐसे शिक्षकों से नमस्ते करने तक की इच्छा नहीं होती।
अभी दो साल पहले बसपा शासनकाल में शिक्षा मंत्री पर डायरेक्ट अपने हाथ में धन लेकर परीक्षा केंद्र बनवाने के आरोप खुलेआम लगते रहे। इस बार भी ‘धन दो, परीक्षा केंद्र बनवाओ‘ की आवाज आमजन तक गूंजती रही। सरकार कान में तेल डाले बैठी हुई है। न कोई जांच न कोई कार्रवाई। कॉलेज और बोर्ड परीक्षा, दोनों ही अंधाधुंध सीजनल कमाई वाली दुधारू गाय। न हींग लगे न फिटकरी, रंग एकदम्मै चोखा। बस, थोड़ा धन खर्चकर विभाग को साधना पड़ता है। परीक्षा केंद्र की लिस्ट में कॉलेज का नाम पहुंच जाए, लाखों रुपए शुद्ध लाभ की गारंटी। तुर्रा यह कि हम तो शिक्षा का अलख जगाकर समाज को जागरूक कर रहे हैं, समाजसेवा कर रहे हैं…। असली रूप देखने के बाद उबकाई आने लगती है। एडमिशन के समय फीस के अलावा डोनेशन, प्रैक्टिल परीक्षा में एक्जामिनर के नाम पर सुविधा शुल्क, परिचय पत्र, प्रवेश पत्र, मार्कशीट, सर्टिफिकेट के नाम पर, परीक्षा के दौरान उड़नदस्ता से लेकर शिक्षा विभाग व इलाकाई अफसरों के नाम पर हर परीक्षार्थियों से हजारों रुपए की धनउगाही की जाती है। पूरे प्रदेश में यह बखूबी फल-फूल रहा है। पिछले डेढ़ दशक से तेज गति पकड़े इस धंधे पर अंकुश नहीं लग पा रहा। कई सरकारें आईं, तेज-तर्रार अफसर आए, पर नतीजा कुछ खास न निकला।
सालभर पहले काली सूची में डाले गए कॉलेजों को दूसरे ही साल आंख मूंदकर परीक्षा केंद्र बना दिया जाता है, पैसे के बल पर। इसे बोर्ड ऑफिस के पास बखूबी देखा जा सकता है। नेताओं के स्कूल-कॉलेज धड़ाधड़ खुल रहे हैं। ये सब अंधी कमाई का जरिया बने हैं। दागी अफसर, बेईमान नेता और षिक्षा माफियाओं का मजबूत गठबंधन देश की तरूणाई के भविष्य को खोखला करने में जुटा है। सारा खेल पैसे और जुगाड़ के बल पर चलता है। बाकायदे खुलेआम, ठेके पर। ज्यादातर नेताओं ने कॉलेज-व्यवसाय शुरू किया है। ‘नाम तुम्हारा, काम हमारा’ की तर्ज पर रैकेट सक्रिय हैं। मान्यता, परीक्षा केंद्र, सांसद विधायकों के निधि से धन दिलाने तक के कार्य ठेके पर चलते हैं। परीक्षा केंद्रों में ब्लैक बोर्ड पर लिखकर सामूहिक तौर पर कॉपियां लिखाई जा रही हैं, न लिख पाने वालों को लेखक उपलब्ध कराएं जा रहे हैं। यह हाल निन्यानबे फीसदी परीक्षा केंद्रों का है। ऐसे में अब इस समूची परीक्षा प्रणाली के औचित्य पर ही सवाल उठने लगे हैं। क्या मतलब है ऐसी परीक्षाओं का। हर साल लाखों नौजवान, जो विषय और किताब का नाम तक जानते नहीं, उन्हें डिग्री फर्स्ट क्लास की हासिल हो जाती है। हर साल ऐसे लाखों बेकार डिग्रीधारक नौजवानों की फौज तैयार की जा रही है। इन नौजवानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों की सजा क्या है, और इस पर रोक कैसे लगेगी?
इलाहाबाद से शिवाशंकर पाण्डेय की रिपोर्ट.


