कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र के मल्टी आर्ट कल्चर सेंटर के सहयोग व रविन्द्र नाथ टैगोर को श्रद्धांजलि स्वरूप हुए नाटक को देखने के लिए दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ी। मां, बहन, बेटी, बहू व अन्य कई रूपों में देश में नारी की जो स्थिति है उसे अपने अभिनय द्वारा मंच पर जीवंत कर बॉलीवुड अभिनेत्री सीमा विश्वास ने यह साबित कर दिया कि देश में महिलाएं आज भी ऐसे दर्दनाक हादसों से गुजर रही हैं, जो वर्षों पहले हुआ करते थे। ४५ मिनट के अपने इस अनोखे नाटक के माध्यम से अपने अभिनय कौशल का हुनर दिखाकर दर्शकों के दिलों पर ऐसी छाप छोड़ी कि नाटक के बाद भी दर्शक उनके अभिनय से प्रभावित नजर आए। जनसंचार एवं मीडिया प्रौद्योगिकी संस्थान के तत्वाधान में मीडिया अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फैस्टीवल के तहत आर के सदन में पिन ड्रोप साइलेंस में हुए इस नाटक में सीमा विश्वास ने भ्रूण हत्या के साथ-साथ महिलाओं के साथ देश में जो भेदभाव होता है उसे बड़े ही मार्मिक एवं वेदनापूर्वक तरीके से दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया।
अपने अभिनय के दौरान कभी जोर-जोर से हंसकर तो कभी आंखों से आंसूओं से स्त्री की मनोस्थिति का बड़े मार्मिक ढंग से दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया। स्त्री पात्र की प्रस्तुति के दौरान सीमा विश्वास ही मुख्य पात्र थी और सभी पात्रों की भूमिका भी उन्होंने खुद ही निभाई। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा हुआ हो कि एक पात्र ने एक घंटे तक दर्शकों को नाटक को छोडक़र कुछ और सोचने का मौका नहीं दिया। सीमा के प्रभावशाली अभिनय ने सभी दर्शकों को बांधे रखा और उनके असाधारण अभिनय कौशल ने सभी को उनका मुरीद बना दिया। नाटक का आरंभ पात्र मृणाल के बचपन से होता है और वहीं से स्त्रियों के साथ होने वाले भेदभाव की कहानी आरंभ होती है। उसके बाद बाल विवाह, स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार को दर्शाया गया। नाटक के दौरान सीमा द्वारा यदि मेरा बच्चा होता तो मैं मंझली बहु से मां बन जाती, स्त्री को स्त्री पर दया नहीं आती जैसे डायलॉग दर्शकों के दिल को छू गए और पूरा सभागार करतल ध्वनि से गूंज उठा। वहीं जब सीमा स्टेज से उतर कर दर्शकों के बीच जा पहुंची तो सभी विस्मित हो उठे और सभी ने उनके अभिनय को खूब सराहा। वहीं बिंदू द्वारा अपने साथ हो रहे अत्याचार से तंग आकर आत्महत्या करने वाले दृश्य ने सभी दर्शकों की आंखें नम कर दी। सीमा विश्वास के साथ उनके सहयोगी दौलत वैद्य व विपलव की टीम द्वारा प्रस्तुत इस नाटक का दर्शकों ने खूब आनंद उठाया।
स्वीडन से आए सिनेमा विशेषज्ञ एवं प्रो एच.डब्ल्यू वैस्लर ने कहा है कि भारतीय सिनेमा यूरोप में नई पीढ़ी के दिल को छू रहा है इसलिए यूरोप के साथ-साथ दुनिया के अन्य देशों में भी भारतीय फिल्मों की मांग निरंतर बढ़ रही है। वे बुधवार को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के जनसंचार एवं मीडिया प्रौद्योगिकी संस्थान के तत्वाधान में आयोजित मीडिया अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फैस्टीवल में पत्रकार वार्ता को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि एक दौर था जब यूरोप सहित पश्चिमी देशों में भारतीय फिल्में नहीं देखी जाती थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आए बदलाव ने यूरोपियन सिनेमा से जुड़े लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। यही कारण है कि आज भारत की फिल्में यूरोप में और यूरोप की फिल्में भारत में खूब देखी व दिखाई जा रही हैं। एक प्रश्र के उतर में वैस्लर ने कहा कि समाज में बिखराव के कारण पश्चिमी देशों में घर टूट रहे हैं और आज फिल्मों के लिए एक बड़ा विषय परिवार है इसलिए वहां पर पारिवारिक फिल्मों की बड़ी मांग है।
प्रो. वैस्लर ने एक प्रश्र का जवाब देते हुए बताया कि किसी भी व्यक्ित व देश को अपनी भाषा पर गर्व होना चाहिए। यूरोपिय देशों में लोग अपने देश की भाषा का सबसे अधिक प्रयोग करते हैं। भारत में हिन्दी की बजाए अंग्रेजी का प्रचलन अधिक है इसका देश के लिए अपना एक फायदा व नुक्सान भी है। अंग्रेजी ने ही देश के सभी राज्यों को जोड़ रखा है। पर इसके बाद भी देश में हिन्दी का प्रचार प्रसार बढ़ रहा है जो किसी भी देश के लिए खुशी का विषय है। इस मौके पर कुरुक्षेत्र के डीसी मंदीप बराड़ विशिष्ट अतिथि व विश्वविद्यालय के कुलपति ले. जनरल डॉ. डीडीएस संधु मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे। डीसी मंदीप बराड़ व विश्वविद्यालय के कुलपति ले. जनरल डीडीएस संधु ने सीमा विश्वास व उनके अन्य सहयोगियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया।
जयश्री राठौड़ की रिपोर्ट.


