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नईदुनिया को जागरण से नहीं पत्रकारिता को बाजारवाद से बचाइए

नईदुनिया में जागरण की आहट ने तो जैसे पत्रकारिता जगत में खलबली ही मचा दी है। सालों से कलम चलाने वाले सिपाहियों की नींद भी टूट गयी है। इन सब उहापोह के दौर में ये चिन्तक आखिर आज ही क्यों जागे हैं ये समझ से परे है। क्योंकि जब नईदुनिया समूह संघर्ष कर रहा था तब तो कोई शुभचिंतक सामने नहीं आया, लेकिन अब जब चिड़िया खेत चुग चुकी है तब ना जाने कहां कहां से प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। अरे जनाब! जब आप इतने ही दिल से नईदुनिया परिवार को खिलता-खिलखिलाता देखना चाहते थे तो तब क्यों नहीं कहा कि फिकर मत करो हम तुम्हारे साथ हैं। मगर अब जब जागरण का उदय हुआ है तो सबकी नींद टूट गयी है और हल्ला मच रहा है कि नईदुनिया बचाओ, नईदुनिया बचाओ….।

नईदुनिया में जागरण की आहट ने तो जैसे पत्रकारिता जगत में खलबली ही मचा दी है। सालों से कलम चलाने वाले सिपाहियों की नींद भी टूट गयी है। इन सब उहापोह के दौर में ये चिन्तक आखिर आज ही क्यों जागे हैं ये समझ से परे है। क्योंकि जब नईदुनिया समूह संघर्ष कर रहा था तब तो कोई शुभचिंतक सामने नहीं आया, लेकिन अब जब चिड़िया खेत चुग चुकी है तब ना जाने कहां कहां से प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। अरे जनाब! जब आप इतने ही दिल से नईदुनिया परिवार को खिलता-खिलखिलाता देखना चाहते थे तो तब क्यों नहीं कहा कि फिकर मत करो हम तुम्हारे साथ हैं। मगर अब जब जागरण का उदय हुआ है तो सबकी नींद टूट गयी है और हल्ला मच रहा है कि नईदुनिया बचाओ, नईदुनिया बचाओ….।

ऐ-बचाने वालो बचाना ही है तो पत्रकारिता को बाजारवाद से बचाओ। पत्रकारों को बिकने से बचाओ। लेखनी पर हावी होती लाइजिनिंग से बचाओ। बाबू लाभचंद के आदर्शो और राजेंद्र माथुर की समर्पण की भावना को बचाओ….। इस देश के युवा पत्रकारों को वरिष्‍ठों के कोप का भाजन बनने से बचाओ…??? नईदुनिया मात्र एक अखबार ही नहीं बल्कि पत्रकारिता की नर्सरी भी था, इसलिए पतझड़ तो होना ही था इसे प्रकृति का नियम मानकर अब पत्रकारिता की दुनिया को बचाने की आवाज उठाओ। न केवल पाठक बल्कि टीवी के नुमाइंदे भी कह रहे हैं कि ये अच्छा नहीं हुआ। हमें दुःख है। दुखी होना छोडिये और अब नईदुनिया जैसी साख बनाकर दिखाएं क्योंकि दुःख पर दुःख जताना तो आसन होता है, लेकिन दुःख की घड़ी में साथ निभाना बड़ा कठिन, इसलिए ये घडियाली आंसू मत बहाइये..। बचाना ही है तो अब युवा कलमकारों को तथाकथित वनिष्‍ठजनों से बचाइए जो महज़ नाम से चल रहे हैं…।

लेखक महेंद्र सिंह सोनगिरा इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े हुए हैं.

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