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बाबाओं के पाखंड साम्राज्य को ढहाना होगा

आप के चारो ओर बाबाओं की रहस्यमय दुनिया है। कोई प्रवचन कर रहा है, कोई भविष्य बाँच रहा है, कोई योग सिखा रहा है, कोई गा-नाच रहा है, लोगों को नचा रहा है। बहुत बड़ी तादात में चेले हैं, अपने-अपने बाबा को भगवान बताते हुए, उनके महिमागान करते हुए, उनकी चमत्कार-कथाओं से नये लोगों को सम्मोहित करते हुए। बाबाओं ने कसम खा रखी है, वे पैसे को, धन को, द्रव्य को हाथ नहीं लगायेंगे। आप के मन में श्रद्धा है, आप को भरोसा है, आप अपने भीतर समर्पण भाव पैदा कर सकते हैं तो उनके खाते में पैसा डाल दीजिए। पैसा जमा करते ही आप की मनोवांछा पूरी हो जायेगी, आप का काम हो जायेगा, आप की सारी व्याधियाँ छू-मंतर हो जायेंगी। जब आप समर्पित हो गये तो आप की कामना वही होगी जो बाबा की होगी। पैसा आते ही बाबा की कामना पूरी हो गयी तो समझो आप की भी हो गयी। दो-चार की नहीं भी हुई, कुछ का भरोसा टूट भी गया तो क्या फर्क पड़ता है। कुछ तो ऐसे निकलेंगे, जिनका काम अनायास हो जाने वाला था, सो हो गया। वह तो बाबा के यहाँ नहीं भी जाते तो भी उनका काम हो जाता पर बाबा ने कहा था, बाबा से सुना था और काम हो गया तो यह तो बाबा का चमत्कार है। बस यही कुछ लोग बहुत सारे नये लोगों को बाबाओं के जाल में फँसाने का काम करते हैं।

आप के चारो ओर बाबाओं की रहस्यमय दुनिया है। कोई प्रवचन कर रहा है, कोई भविष्य बाँच रहा है, कोई योग सिखा रहा है, कोई गा-नाच रहा है, लोगों को नचा रहा है। बहुत बड़ी तादात में चेले हैं, अपने-अपने बाबा को भगवान बताते हुए, उनके महिमागान करते हुए, उनकी चमत्कार-कथाओं से नये लोगों को सम्मोहित करते हुए। बाबाओं ने कसम खा रखी है, वे पैसे को, धन को, द्रव्य को हाथ नहीं लगायेंगे। आप के मन में श्रद्धा है, आप को भरोसा है, आप अपने भीतर समर्पण भाव पैदा कर सकते हैं तो उनके खाते में पैसा डाल दीजिए। पैसा जमा करते ही आप की मनोवांछा पूरी हो जायेगी, आप का काम हो जायेगा, आप की सारी व्याधियाँ छू-मंतर हो जायेंगी। जब आप समर्पित हो गये तो आप की कामना वही होगी जो बाबा की होगी। पैसा आते ही बाबा की कामना पूरी हो गयी तो समझो आप की भी हो गयी। दो-चार की नहीं भी हुई, कुछ का भरोसा टूट भी गया तो क्या फर्क पड़ता है। कुछ तो ऐसे निकलेंगे, जिनका काम अनायास हो जाने वाला था, सो हो गया। वह तो बाबा के यहाँ नहीं भी जाते तो भी उनका काम हो जाता पर बाबा ने कहा था, बाबा से सुना था और काम हो गया तो यह तो बाबा का चमत्कार है। बस यही कुछ लोग बहुत सारे नये लोगों को बाबाओं के जाल में फँसाने का काम करते हैं।

बहुत सारी जटिलताएँ हैं हमारे समाज में, बहुत सारी अनिश्चितताएं भी हैं, भ्रष्टाचार है, रिश्वतखोरी है, आर्थिक दबाव है, शरीर में तमाम रोग हैं। कठिनाइयों से जूझने का माद्दा घटा है। जीवन एक लड़ाई है, यह समझ खत्म हो गयी है। भविष्‍य वास्तव में है ही नहीं, ऐसी दृष्टिसंपन्नता नहीं है। भविष्य तो एक सपना है। हो सकता है, नहीं भी हो सकता है। वह हाथ में नहीं है। वहाँ तक पहुंच नहीं है। प्रकृति ने ही ऐसी व्यवस्था बनायी है कि वहां कोई पहुंच न सके। अगर भविष्य सब जानते होते तो जीवन में कोई गति ही नहीं होती, कोई संघर्ष ही नहीं होता, कोई द्वंद्व ही नहीं होता। सब केसब मरे हुए होते, बैठे हुए निठल्ले की तरह या सोये हुए क्योंकि उन्हें पता होता कि कल उन्हें या तो दरिद्र हो जाना है या पूरा राजपाट मिल जाना है। फिर कुछ भी क्यों करना? लेकिन सच यह नहीं है। जो राम ने रचि राखा है, वही होगा, यह बिल्कुल सही नहीं है। जो आप रचेंगे, वह होगा। जो आप का संकल्प, आप की मेहनत, आप की प्रतिभा, आप का संघर्ष रचेगा, वह होगा। कुछ भी रचना वर्तमान में हो सकता है। जो समय सामने है, उसी में आप कुछ कर सकते हैं। केवल करना आप के अधिकार में है। करना छोड़कर अगर आप सपने देखते हैं, लड़ाई के मैदान में लडऩे की जगह आँखें बंद करके लड़ाई के परिणाम पर चिंतन करते हैं तो आप अपना वर्तमान नष्ट करते हैं। वर्तमान नष्ट हो गया तो भविष्‍य के गर्भ में आप को क्या मिलेगा। भविष्य और कुछ नहीं अनुभव और कर्म का आगत संश्लेष है, अतीत और वर्तमान की अंतक्रिया का परिणाम है। नहिं सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा। कोई हिरन स्वयं सोते हुए सिंह के मुंह में क्यों जायेगा? सिंह को उसका पीछा करना पड़ेगा, उसे मारना पड़ेगा, तभी वह अपनी भूख मिटा सकता है। इसी तरह भविष्य को अपनी मुट्ठी में कैद करने के लिए वर्तमान के हर पल से जूझना पड़ेगा।

बाबाओं ने इस लड़ाई के खिलाफ एक अभियान छेड़ा हुआ है। वे नियतिवाद और अर्जित, संचित कर्म सिद्धांत की अक्रिय और छलभरी जड़ उक्तियों के सहारे निरुपाय, हारे हुए, लालची और बीमार लोगों को अपने मोह-पाश में बहुत आसानी से फँसा लेते हैं। कुछ भी फलित होने के लिए तन, मन, धन केसमर्पण का जाल फेंकते हुए वे कमजोर लोगों को अपनी काली चमक के रहस्यमय लोक में कैद कर लेते हैं। प्रवचनों में, समागमों में लाखों-लाख की भीड़ आप देख सकते हैं। क्या यह माना जाना तर्क संगत है कि देश में धर्म और आध्यात्म के प्रति लोगों का अनुराग बहुत बढ़ गया है? अगर ऐसा है तो फिर इतना भ्रष्टाचार क्यों हैं, बेईमानी, गुंडई, लुच्चई और अपराध दिन-ब-दिन बेतहाशा क्यों बढ़ते जा रहे हैं? सच यह है कि ये धार्मिक समागम भी लोगों को मूडऩे, उन्हें बेवकूफ बनाने और जटिलताओं से जूझने की उनकी ताकत खत्म कर देने की बड़ी साजिशें हैं। देखिये न, शनि, राहू, केतु का प्रकोप कितना बढ़ गया है, टोने-टोटके किस तरह वापस आ गये हैं, कंठी-माला, ताबीज का दौर कैसे लौट आया है। बहुत पढ़े-लिखे, तर्कशील समझे जाने वाले लोगों की उंगलियां भी मूंगे, मोती और नीलम की अंगूठियों से भरी दिखायी पड़ती हैं। सैकड़ों दारूवाले, आलूवाले, सैकड़ों भविष्यवाची माँएं लोगों की तकदीर बाँचने के नाम पर न जाने किस-किस तरह से ठगने में जुटी हैं। मीडिया मजबूर है। वह व्यवसाय करता है। इसलिए इन ठगों से मिलकर वह भी इनके विराट अर्थसाम्राज्य का कुछ हिस्सा अपनी थैली में डाल लेने पर आमादा है। उसे इससे कोई मतलब नहीं कि इसका जनता पर क्या असर पड़ेगा, लोग कितने गुमराह होंगे, किस तरह ठगे जायेंगे, कितना नुकसान उठायेंगे।

केवल पैसे का खेल है यह। छद्म शालीनता के साथ लूटने का उपक्रम चल रहा है। लुटने वाला खुश है क्योंकि उसे सोचने की जरूरत ही नहीं या फिर बाबाओं, ज्योतिषियों के पास जाने के बाद उसके जीवन में सब ठीक है, इसलिए उसने सोचना बंद कर दिया है। जब उसका सारा ठेका बाबा ने ले लिया, उसका सारा पाप, दुख हर लिया तो उसे अब कुछ भी सोचने या करने की जरूरत कहाँ बची। बाबाओं की भीड़ इस देश कीपारंपरिक मानसिक बुनावट का फायदा उठा रही है। सब भगवान करता है, आदमी के हाथ में कुछ नहीं है। होइहिं वहि जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावहिं साखा। तर्क मत करो, विश्वास करो, श्रद्धा रखो। नहीं काम हुआ तो यह समझो तुम्हारे मन में संदेह था, भरोसा नहीं था। बड़ा आसान तरीका है। जो लोग इस धूर्तता को समझते हैं, वे भी इसे बड़ी बहस का मुद्दा नहीं मानते, जो इस पाखंड को भेद सकते हैं, उनके पास करने को इतना रचनात्मक काम है कि इससे उनका कोई मतलब नहीं। कौन बोलेगा इस बाबागीरी के खिलाफ? कौन बचायेगा, लाखों लोगों को लगातार ठगे जाने से? क्यों नहीं इन बाबाओं के चेहरों से नकाब उठाने के लिए उठ खड़े होने की जरूरत है? इस वक्त के कबीर की तरह पाखंडमोचन का बीड़ा उठायेगा कोई? पूंजीवादी पाखंड से कम खतरनाक आध्यात्मिक पाखंड नहीं है, यह लाखों तोगों को नियतिवादी बना रहा है, लाखों लोगों की आस्था का चीरहरण कर रहा है। इससे लडऩे की जरूरत है, इसे नेस्तनाबूद करने की आवश्यकता है। घंटी तो बज रही है पर बिल्ली का गला दूर है, घंटी गले में बाँधनी होगी ताकि सभी लोग पहचान सकें समाज के इन दुश्मनों को।

लेखक डा. सुभाष राय अमर उजाला, डीएलए और जनसंदेश टाइम्‍स के संपादक रह चुके हैं. इन दिनों लखनऊ से प्रकाशित डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट के प्रधान संपादक हैं. साहित्य, अध्यात्म, आंदोलन से गहरा जुड़ाव रखने वाले डा. सुभाष के लिखे इस लेख को डेली न्‍यूज एक्टिविस्‍ट से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

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