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लोकपाल बिल : पूरा चांद न सही, एक टुकड़ा ही…!

अभी हाल में ही भारतीय संसद ने एकमत से टीम अन्ना की निंदा की। टीम अन्ना की कठोर टिप्पणी ने पक्ष-विपक्ष को बेहद नाराज कर दिया था। भई, यह कोई बात हुई कि आप हमारे सांसदों को चोर-उच्चका व दागी कहें! भारतीय समाज में गंगा का महत्व क्या कम है! जीवन के सारे पाप गंगा स्‍नान ध्यान मात्र से ही धुल जाते हैं! उसी तरह लोकतंत्र में जनता अगर किसी चोर-उचक्के को अपना मत देकर पवित्र बना दे तो आप उसे दागी नहीं ठहरा सकते! टीम अन्ना से मेरी गुजारिश है, जम्हूरियत के प्रतिनिधियों के लिए ये उपयुक्त शब्द नहीं हैं। हमारी परंपरा में ‘शब्द’को ‘ब्रा’माना गया है। ब्रा का समुचित प्रयोग होना चाहिए। टीम अन्ना के साथ अपराधियों की तरह सलूक करने की बात हमारी संसद ने कही है। उसे दंडित करने के सवाल पर संसद में खूब बहस हुई। भई, मैं तो डर ही गया! इतना भयानक आक्रोश हमने पहले कभी नहीं देखा! भारतीय संसद पर जब आतंकियों का हमला हुआ था, उस दौरान भी नहीं! आतंकी कसाब को लेकर भी संसद में लालू यादव व शरद यादव को शेर की तरह दहाड़ते हुए हमने कभी नहीं सुना। फिरकापरस्त ताकतों के प्रति उनके नरम रुख़ के हम कायल हैं। 

अभी हाल में ही भारतीय संसद ने एकमत से टीम अन्ना की निंदा की। टीम अन्ना की कठोर टिप्पणी ने पक्ष-विपक्ष को बेहद नाराज कर दिया था। भई, यह कोई बात हुई कि आप हमारे सांसदों को चोर-उच्चका व दागी कहें! भारतीय समाज में गंगा का महत्व क्या कम है! जीवन के सारे पाप गंगा स्‍नान ध्यान मात्र से ही धुल जाते हैं! उसी तरह लोकतंत्र में जनता अगर किसी चोर-उचक्के को अपना मत देकर पवित्र बना दे तो आप उसे दागी नहीं ठहरा सकते! टीम अन्ना से मेरी गुजारिश है, जम्हूरियत के प्रतिनिधियों के लिए ये उपयुक्त शब्द नहीं हैं। हमारी परंपरा में ‘शब्द’को ‘ब्रा’माना गया है। ब्रा का समुचित प्रयोग होना चाहिए। टीम अन्ना के साथ अपराधियों की तरह सलूक करने की बात हमारी संसद ने कही है। उसे दंडित करने के सवाल पर संसद में खूब बहस हुई। भई, मैं तो डर ही गया! इतना भयानक आक्रोश हमने पहले कभी नहीं देखा! भारतीय संसद पर जब आतंकियों का हमला हुआ था, उस दौरान भी नहीं! आतंकी कसाब को लेकर भी संसद में लालू यादव व शरद यादव को शेर की तरह दहाड़ते हुए हमने कभी नहीं सुना। फिरकापरस्त ताकतों के प्रति उनके नरम रुख़ के हम कायल हैं। 

आतंकियों व भ्रष्टाचार के मामले में मुलायम तो हमेशा ही मुलायम बने रहे। हमारे अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सचमुच इतने भद्र हैं कि आतंकी व भ्रष्टाचारियों के खिलाफ़ अधिक बोलना पसंद नहीं करते। प्रधानमंत्री पद की अपनी गरिमा है। बखूबी वह अपना फ़र्ज़ निभा रहे! भारतीय राजनीति में कृतज्ञता की वह एक जीवंत मिसाल हैं! दशरथ-पुत्र भरत की तरह…। वह तो राम के खड़ाऊं की महान परंपरा का पूरी निष्ठा के साथ निर्वाह कर रहे…! निर्विकार! स्थितप्रज्ञ! भले यह देश उन्हें कमजोर प्रधानमंत्री कहता रहे मगर भारतीय इतिहास में सोनिया जी के प्रति उनकी भक्ति-भावना व वफादारी की मिसाल चिराग़ लेकर ढूंढने पर भी नहीं मिलेगी! रामभक्त हनुमान की तरह निश्छल! मनमोहन की शराफत पर जो लोग आज सवाल उठा रहे, उन्हें मैं क्या कहूं…! ‘शब्द’यानी कि ‘ब्रा’का इस्तेमाल यह देश जिस तरह कर रहा, वैसा हम नहीं कर सकते। जाहिर है हम भी सिर्फ़ पत्रकारिता-धर्म का निर्वाह कर रहे! जो लोग मनमोहन सिंह को देश का कमजोर प्रधानमंत्री बता रहे, उनका जवाब तो खुद हमारे विद्वान प्रधानमंत्री दे ही चुके हैं- ‘आप हमें जितना कमजोर समझते हैं, उतना कमजोर हम नहीं हैं…।’ प्रधानमंत्री ने ठीक ही कहा है! अगर वह कमजोर होते तो क्या यह देश चलता! महान, शांत और शिष्ट प्रधानमंत्री का यह अंदाज मुझे बड़ा अच्छा लगा था! महान देश के सर्वोच्च पद पर आरूढ़ व्यक्ति को मज़बूत होना ही चाहिए।

अटल जी को संसद में सुनना भी मुझे अच्छा लगता था। अगर वह संसद में होते तो जरूर टीम अन्ना पर कुछ न कुछ बोलते! अनकी वाक्पटुता का सानी नहीं! संसद पर आतंकी हमले के बाद अटल जी को अटक-अटक कर नाटकीय अंदाज में बोलते हुए हमने सुना था। भई, उनके भाषण में क्या जोश था! वैसे वक्ता का इस देश में होना भी कम सौभाग्य की बात नहीं! वह बादल की तरह खूब गरजे, पर बरसे नहीं। बचपन में बादलों को आकाश में गरजते हुए देखकर ही हम अपने कपड़े उतारकर फेंक देते…। यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि उस रोज किसी ने अपने कपड़े नहीं उतारे! उस रोज अटल जी का भाषण सुना, मज़ा आ गया। उन्होंने तो पाकिस्तान को खुली चुनौती दे डाली…। जंग का एलान ही कर दिया। सीमा पर अपनी फ़ौजें उतार दीं। तोपें तैनात कर दीं। पाकिस्तान ने भी कड़े तेवर दिखाये। तभी अमेरिका ने इशारे-इशारों में हमारे प्रधानमंत्री को समझा दिया, इतना क्रोध ठीक नहीं! युद्ध होते-होते खत्म हो गया। अरबों रुपये सीमा पर हमने बहा दिये। युद्ध के टलने से हमारे साथ ही देश ने भी राहत महसूस की, यह सोच कर कि हमारी जान बची! दोनों मुल्क़ों के पास एटम बम हैं। भई, जिसके पास एटम बम हो, उससे डरना भी चाहिए! अगर युद्ध होता तो हम नाहक में मारे जाते।

अटल जी की समझदारी ने उस रोज देश को महाविनाश से बचा लिया! भई, इसके बाद तो देश में कई बड़े घोटाले हुए…। कारगिल जंग के दौरान भी ताबूत-कमीशन की बात उठी! अगर कोई कमीशन दे रहा तो लेने वाले की क्या गलती! इसका अर्थ तो यह नहीं कि आप हमारे महान नेताओं को चोर व कमीशनखोर कहें…। ‘लंपट’शब्द के प्रयोग का भी हम समर्थन नहीं कर सकते! असंवैधानिक शब्दों के प्रयोग की सहूलियत तो सिर्फ़ हमारे जनप्रतिनिधियों को ही होनी चाहिए! ब्रा का गलत प्रयोग नहीं, सदुपयोग होना चाहिए! मनमोहन सिंह के शासन में तो रोज ही नये-नये खुलासे हो रहे! चूंकि मीडिया के पास अब और कोई काम नहीं रह गया है, शायद इसलिए…! हाल में प्रतिरक्षा मामलों में घोटाले के नये खुलासे ने टीम अन्ना को बोलने का एक और अवसर दे दिया है! इसका मतलब यह नहीं कि वह देश से यह सवाल करें कि हमारे संसद व विधान सभाओं में दागी क्यों हैं? लोकतंत्र की यह महिमा टीम अन्ना को समझनी चाहिए। क्या पागल कुत्ते ने काटा है जो हमारी सरकार मजबूत लोकपाल बिल संसद में लायेगी! क्या, आप नहीं जानते कि करोड़ों रुपये खर्च कर जो लोग लोकसभा व विधान सभाओं में जा रहे हैं, वे कतई साधु नहीं हो सकते! असाधु तो आपके साथ भी खड़े नजर आ रहे…! संत-महात्माओं के लिए वह जगह भी नहीं है! अन्ना कह रहे हैं कि नेताओं ने देश को कंगाल बना दिया है। दलालों के पास बिल्डिंग है जबकि किसानों के पास झोपड़ी भी नहीं …। यह बात हमारे मगज को खराब कर रही है, दरअसल आप चाहते क्या हैं? मज़बूत लोकपाल या क्रांति…?

1997 में आजादी की स्वर्ण जयंती के प्रस्ताव में भ्रटाचार और राजनैतिक अपराधीकरण को समाप्‍त करने तथा चुनाव में मौलिक सुधार के वायदे किये गये थे! तभी कालाबाजारियों ने हमारे राजनेताओं को हिदायत दी, चुनाव के लिए क्या तुम्हें पैसे नहीं चाहिए! अपराधियों ने कहा मेरी मदद के बिना तुम चुनाव नहीं जीत सकते! आतंकियों ने भी अपने कड़े तेवर दिखाये! नेताओं के लंगोट ढीले पड़ गये! भई, सबको अपनी जान प्यारी है! अगर अच्छे लोग चुनाव जीत कर आ गये तो फिर सर्वनाश ही हो जायेगा! बुरे लोग बेरोजगार हो जायेंगे! इससे तो देश में अराजक स्थिति पैदा हो जायेगी! भई, अगर बुरे लोग चुनाव जीत रहे तो आप क्यों परेशान हो रहे…! हराम की मलाई चाट रहे अधिकारियों को जब लगा कि बात ठीक है, मिल-बांटकर खाने में कोई गुरेज नहीं तो बात बन गयी! लोकपाल पर सब चुप हो गये! और आप अब भी चिल्लाए जा रहे…? बाबा रामदेव को हम अपना आदर्श मानते हैं। विदेशी बैंकों से देश के धन को निकाल लाने में वह जरूर कामयाब होंगे! भई, उनके शरीर में गजब की फुर्ती है! पुलिस की लाठी लगी नहीं कि वह मंच से कूद गये। पलक झपकते न झपकते अपना गेरुआ वासन उतार कर कहीं फेंक दिया और एक युवती के कपड़े उतरवा लिए…! हमने उस रोज़ सलवार-समीज में उन्हें देखा। मन प्रसन्न हो गया! बाबा का वह अद्भुत रूप अब भी मेरी आंखों में समाया हुआ है!

टीम अन्ना को हम आश्वस्त करना चाहेंगे, सुषमा स्वराज हों या लालू, शरद यादव हों या मुलायम, आपका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता! संसद में तो प्राय: गाली-गलौज होती ही रहती है! हमारे महान देश के महान जनप्रतिनिधि एक-दूसरे पर कीचड़ उछालते ही रहते हैं! आज जो आप कह रहे, वे तो काफी पहले से उसे कहते आ रहे, चोर उचक्का, लंपट, गुंडा-बदमाश, हत्यारा, बलात्कारी…! और न जाने क्या-क्या! आप कोई नयी बात थोड़े कह रहे…! आप तो उनके ही जुमले दोहरा रहे। ब्रा का गलत प्रयोग न करें। व्यवस्था-परिवर्तन की बात करें! क्रांति की बात करें! खेत और खलिहानों की बात करें! नयी दुनिया की बात करें! नये-नये मुहावरे गढ़े फिलहाल हमें खुशी इस बात की है कि इतने दबाव के बावजूद आप अब भी मज़बूत लोकपाल की बात कर रहे…! यह एक अच्छी शुरुआत है।! आप अपनी जिद पर अड़े रहें…! पूरा चांद न सही, एक टुकड़ा ही…।

लेखक डा. राजेंद्र प्रसाद सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार और आपका तिस्‍ता हिमालय के संपादक हैं.

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