Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

ये दुनिया

पुण्‍य प्रसून जी, क्‍या और लोग भाड़ झोंक रहे हैं?

 

पुण्य प्रसून वाजपेयी जी को सादर नमस्कार! आपका गुरु गंभीर प्रवचन पढ़कर ऐसा लगा कि पत्रकारिता में हम लोग दो दशक से ज्यादा समय से भाड़ झोंक रहे हैं। राजेंद्र माथुर ने जो लिख दिया और आपने अपने शब्दों में उनके लिखे का जो विवेचन कर दिया वो एक तरफ है और आज की जमीनी हकीकत दूसरी तरफ। शिखर पर बैठ कर एक साथ सारी चीजें नजर जरूर आती हैं लेकिन वे इतनी सूक्ष्म दिखाई है कि उनका विश्लेषण कर पाना संभव नहीं होता। समाचार संस्थानों में कॉन्ट्रेक्ट पर काम करने वाले श्रमजीवी पत्रकार से आप क्या अपेक्षा करते हैं? करोड़ों रुपये का पैकेज लेने वालों को पत्रकारिता की नैतिकता पर भाषण देना शोभा नहीं देता। चाहे संपादक हो या कोई अदना सा रिपोर्टर… हर एक को अपनी औकात मालूम है। रही बात पत्रकारिता के बाजारवाद की तो इसके लिए वही लोग सबसे पहले जिम्मेदार हैं जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए अपनी कलम, अपने जमीर, अपने विचार, अपनी आत्मा का सौदा किया, क्योंकि चाहे राजेंद्र माथुर हों, पुण्यप्रसून वाजपेयी हों या मैं… हम सब यह जानते हैं कि हमारी प्रखरता, हमारे तेवर का महत्व तब तक ही है जब तक हम मालिक की गुडबुक में है। मालिक बाजार का नुमाइंदा है… उसे कुछ भी फ्री में नहीं मिलता। कागज और स्याही से लेकर हर चीज की कीमत उसे चुकानी पड़ती है। कितने पत्रकार हैं जो बिना तनख्वाह लिए काम करने को तैयार हैं?

 

पुण्य प्रसून वाजपेयी जी को सादर नमस्कार! आपका गुरु गंभीर प्रवचन पढ़कर ऐसा लगा कि पत्रकारिता में हम लोग दो दशक से ज्यादा समय से भाड़ झोंक रहे हैं। राजेंद्र माथुर ने जो लिख दिया और आपने अपने शब्दों में उनके लिखे का जो विवेचन कर दिया वो एक तरफ है और आज की जमीनी हकीकत दूसरी तरफ। शिखर पर बैठ कर एक साथ सारी चीजें नजर जरूर आती हैं लेकिन वे इतनी सूक्ष्म दिखाई है कि उनका विश्लेषण कर पाना संभव नहीं होता। समाचार संस्थानों में कॉन्ट्रेक्ट पर काम करने वाले श्रमजीवी पत्रकार से आप क्या अपेक्षा करते हैं? करोड़ों रुपये का पैकेज लेने वालों को पत्रकारिता की नैतिकता पर भाषण देना शोभा नहीं देता। चाहे संपादक हो या कोई अदना सा रिपोर्टर… हर एक को अपनी औकात मालूम है। रही बात पत्रकारिता के बाजारवाद की तो इसके लिए वही लोग सबसे पहले जिम्मेदार हैं जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए अपनी कलम, अपने जमीर, अपने विचार, अपनी आत्मा का सौदा किया, क्योंकि चाहे राजेंद्र माथुर हों, पुण्यप्रसून वाजपेयी हों या मैं… हम सब यह जानते हैं कि हमारी प्रखरता, हमारे तेवर का महत्व तब तक ही है जब तक हम मालिक की गुडबुक में है। मालिक बाजार का नुमाइंदा है… उसे कुछ भी फ्री में नहीं मिलता। कागज और स्याही से लेकर हर चीज की कीमत उसे चुकानी पड़ती है। कितने पत्रकार हैं जो बिना तनख्वाह लिए काम करने को तैयार हैं?

 

अब बात सत्ता की… सत्ता क्या मुफ्त में मिलती है? सत्ता पाने से बड़ा निवेश आनादिकाल से न कोई है और न कोई हो सकता है। और हां यह सोचने का भ्रम कभी मत पालना कि यह सब 1991 के बाद से हो रहा है। सत्ता पहले राजाओं, नरेशों, नबाबों, जमींदारों, नगरसेठों के हरम में रहती थी अब कॉर्पोरेट की रखैल बनकर रह रही है। सत्ता में निवेश वहीं लोग करते हैं जिन्हें सत्ता को अपनी अंगुली पर नचाना आता है और इसी सत्ता की बदौलत अपनी हुकूमत की पूंजी में इजाफा करना आता है। मीडिया के बारे में भी ऐसा कोई मुगालता पालने की आवश्यकता नहीं है। जिस नवभारत टाइम्स में राजेंद्र माथुर नौकरी करते थे… मेरे शब्दों पर गौर कीजिए “नौकरी” करते थे और जिस जी न्यूज में आप नौकरी करते हैं दोनों ही संस्थान देश के दो बड़े कॉर्पोरेट घराने हैं। वे हैं तो इस देश में मेरे और आप जैसे पत्रकारों के घर में चूल्हा जलता है।

अब बात भारतावतार की…. तौ भैया कितने लोग है जो भारतावतार पढ़ना चाहते हैं? ताजा उदाहरण अण्णा हजारे हैं। सिर पर गांधी टोपी और हाथ में तिरंगा लेकर वंदेमातरम बोलने का भूत दो महीने में उतर गया। पत्रकार हों या मीडिया हाउस दोनों ने अण्णा के समर्थन में कौनसी कसर छोड़ी थी? अब जब देश का बहुसंख्यक युवा कॉर्पोरेट के साथ अपने उज्जवल भविष्य का सपना देख रहा है, रतन टाटा, अजीम प्रेमजी उसके आदर्श के रूप में स्थापित हो रहे हैं तो अपने गाल बजाकर क्या फायदा। आप कहते हैं कि 80 करोड़ लोगों से कोई सीधा वास्ता पूंजी, मुनाफा या बाजार से अभी तक है ही नहीं, लेकिन भाई मेरे दुख की बात तो यही है। जिस दिन ये 80 करोड़ लोग बाजार में अपनी कीमत पहचान लेंगे ये अनमोल हो जाएंगे। आप लिखते हैं कि 80 फीसदी किसानों को सरकार कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं दे पाती, लेकिन खाद और बीज के लिए कॉर्पोरेट पर निर्भर जरुर कर देती है।

अगर यह हकीकत है तो यह भी सचाई है कि हिंदुस्तान का किसान जितना धूर्त, लालची और मक्कार है उतना कहीं और का नहीं है। उसे कम ब्याज पर कर्ज चाहिए जिसे लौटाने का उसका कोई मानस नहीं है। उसे कम कीमत में थोड़ी सी और मुफ्त में बहुत सी बिजली चाहिए जिसे चुराने में उसे कोई गुरेज नहीं है। उसे सब्सिडी पर डीजल चाहिए जिसकी कालाबाजारी करने में उसे कतई शर्म नहीं आती। शहरों में रहने वाले नौकरी पेशा लोग, कॉर्पोरेट घराने, उद्योग और व्यापार जगत के हलक में हाथ डालकर सरकार विकास के नाम पर जो टैक्स खींच खींच लाती है उसे आपका यहीं 80 फीसदी किसान राहत पैकेज के नाम पर चट कर जाता है। हमारा कानून कहता है आत्महत्या करना जुर्म है, लेकिन जब कोई किसान साहूकार से यह जानते हुए भी कर्ज लेता है कि वो उसे चुका नहीं पाएगा और फिर तगादे के डर से आत्महत्या कर लेता है तो उसे डिफॉल्टर और गुनहगार मानने के बजाए मदद राहत के नाम पर हम इमानदार टैक्स पेयर की गाढ़ी कमाई उस पर लुटा देते हैं। माफ करना बात कड़वी है मगर सच्ची है, …. हम एक ऐसे समाज के रिहायशी है जहां अपराध पर पर्दा डालना शराफत समझा जाता है। हर कोई दूसरे को अपराधी साबित करके खुद शराफत का मुल्लमा ओढ़ना चाहता है। इससे न देश का भला होने वाला है न देश के भीतर विकसित हुए संस्थानों का… बेहतर होगा आदर्शवादी लफ्फाजी को दरकिनार कर हकीकत के धरातल पर बात की जाए।

लेखक अभय ‘अभिमन्यु’, मुंबई के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

 

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

You May Also Like

ये दुनिया

रामकृष्ण परमहंस को मरने के पहले गले का कैंसर हो गया। तो बड़ा कष्ट था। और बड़ा कष्ट था भोजन करने में, पानी भी...

सोशल मीडिया

यहां लड़की पैदा होने पर बजती है थाली. गर्भ में मारे जाते हैं लड़के. राजस्थान के पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में बाड़मेर के समदड़ी क्षेत्र...

दुख-सुख

: बस में अश्लीलता के लाइव टेलीकास्ट को एन्जॉय कर रहे यात्रियों को यूं नसीहत दी उस पीड़ित लड़की ने : Sanjna Gupta :...

ये दुनिया

बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने...