पड़ोसी के घर में आग लगने पर लोग कई तरह की नीतियां और सुझाव दे डालते हैं, परन्तु अपने हाथ जला कर भी आग बुझाने को सिर्फ तब ही तैयार होते हैं. जब आग अपने ही घर में लगी हो. यदि सरकारी स्कूलों में प्राथमिक शिक्षा की बात करें तो यहाँ तो लोग इस आग को बुझाने हेतु हाथ जलना तो दूर अपने घर का पानी भी इस्तेमाल नहीं करना चाहते. आज भारतीय समाज जिस तरह से दो भागों में विभाजित है ठीक वही आलम शिक्षा के क्षेत्र में भी देखा जा सकता है. जिस प्रकार समाज में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई दिन प्रति दिन और गहराती जा रही है, उसी प्रकार सरकारी और निजी प्राथमिक शिक्षा भी दो बिलकुल अलग तस्वीरें बयां कर रही है. एक तरफ निजी स्कूलों में दाखिले के लिए अभिभावक भी लाइन लगाकर इंटरव्यू देने को लाखों रुपए फीस के तौर पर लेकर खड़े हैं और दूसरी तरफ वो सरकारी स्कूल हैं, जहाँ कहने को शिक्षा से लेकर भोजन तक सब कुछ मुफ्त है. परन्तु इन सरकारी स्कूलों में पढाई कितनी हो रही है यह बात जग ज़ाहिर है.
आज प्रत्येक 3 में से 1 बच्चा अपनी 5 वर्षों की प्राथमिक शिक्षा बिना मूलभूत चीज़ें सीखे ही पूरी कर लेता है. ऐसे बच्चों का प्रतिशत तो बहुत ही कम है जो अपनी कक्षा के अनुसार पढ़ लिख सकते हों. उत्तराखण्ड की यदि बात करें तो यहाँ कक्षा 5 के लगभग 70% बच्चे मामूली भाग का सवाल भी हल नहीं कर पाते जो कि उन्हें कक्षा 3 में ही सिखा दिया जाता है. शिक्षा के अधिकार के मानकों की यदि बात की जाये तो उत्तराखण्ड के 80% से ज्यादा स्कूल छात्र-शिक्षक अनुपात के मानकों पर खरे नहीं उतरते. उस पर यहाँ का शिक्षा विभाग यह दावा तो करता है कि उत्तराखण्ड में यह अनुपात बाकी राज्यों की तुलना में काफी बेहतर है, परन्तु यह नहीं बताता कि शहरों के नजदीक वाले स्कूलों में तो शिक्षकों की भरमार है और दूरस्त क्षेत्रों के अधिकतर स्कूल ऐसे हैं जो एक या दो शिक्षकों के भरोसे ही चल रहे हैं.
इस संधर्भ में जब भी शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों से बात करें तो सबके पास बच निकलने के लाखों तर्क मौजूद हैं. नेता और सचिवालय में बैठे बड़े अधिकारी कहते है कि शिक्षक पढ़ाना नहीं चाहते और अपने ट्रान्सफर की जुगत में लगे रहते हैं. शिक्षकों से यदि बात की जाये तो उनका तर्क है कि हमें जनगणना से लेकर माध्यान भोजन हेतु रजिस्टर बनाना, दाल-सब्जी खरीदने जैसे भी कई काम हैं तो पढ़ाई पर कैसे ध्यान केंद्रित करें. जबकि हकीकत यह है कि आज भले ही शिक्षा व्यवस्था में सुधार हेतु अनगिनत नीतियां मौजूद हों परन्तु नीयत की भारी कमी है. कितने सरकारी कर्मचारी, नेता, सरकारी शिक्षक और अन्य सरकारी लोग ऐसे हैं जिनके अपने बच्चे इन सरकारी स्कूलों में जाते हैं? यह अपने आप में चौंकाने वाली बात ही है कि जो लोग इस सरकारी मशीनरी और इस देश को चलाने का बीड़ा उठाये हुए हैं वही लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजकर इस सरकारी तंत्र को खोखला सिद्ध करने के साथ ही अपना दोगलापन भी दर्शा रहे हैं. आज सरकारी स्कूलों में सिर्फ वही बच्चे पढ़ रहे हैं जिनके पास कोई और विकल्प मौजूद ही नहीं है, और यही कारण है कि इस वर्ग की शिक्षा की क्या हालत है इससे किसी को फर्क ही नहीं पड़ता. यह वही वर्ग है जो जीवन के पर पड़ाव पर हाशिए में धकेला जा रहा है. इस वर्ग की भलाई की बातें कर राजनीतिक रोटियां तो सेकी जाती हैं परन्तु सच में इसकी भलाई की नीयत किसी भी सरकार की नहीं रही है.
इस व्यवस्था को सुधारने के लिए आज नीतियों से ज्यादा आवश्यकता नीयतों की है. और यह नीयत सिर्फ तभी पैदा की जा सकती है जब हर सरकारी नौकरी अथवा पद का लाभ लेने वाले व्यक्तियों के लिए यह अनिवार्य कर दिया जाए कि उनके बच्चे इन्ही सरकारी स्कूलों में पढेंगे. दरअसल सरकारी शिक्षा के क्षेत्र में लगी आग को बुझाने का जिम्मा जिन लोगों के पास है उन पर इस आग का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ता. और जब तक इन लोगों को यह एहसास नहीं होता कि इस आग की लपटें अब उनके घरों तक भी पहुँच रही है तब तक उनकी नीयत इससे लड़ने की हो भी नहीं सकती. ज़रा सोचिये कि यदि सभी बड़े सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के बच्चे भी नजदीकी प्राथमिक स्कूल में पढ़ने जाएँ तो भी क्या उन स्कूलों की हालत वैसी ही होगी जैसी कि आज हमें देखने को मिलती है.
हो सकता है आज मेरी बात आप लोगों को काल्पनिक लग रही हो मगर ऐसा बिलकुल भी नहीं है. जो भी व्यक्ति सरकारी पदों और नौकरियों का लाभ उम्र भर लेने तो तत्पर होता है उससे यह शर्त रखी जा सकती है कि इन सुविधाओं का लाभ तभी मिलेगा जब साथ में जिम्मेदारियां लेने को भी तैयार हो. नौकरी के समय ही यह शर्त होनी चाहिए कि उस व्यक्ति को अपने बच्चों की स्कूली शिक्षा सरकारी स्कूलों में ही पूरी करवानी होगी. ग्राम सभा से लेकर लोक सभा तक जो भी व्यक्ति जनता का प्रितिनिधित्व करने को चुना जाता है, उससे लेकर सभी सरकारी कर्मचारियों पर इसे लागू किया जा सकता है. ऐसे लोगों का चिन्हीकरण करना कोई बड़ी बात नहीं है. और वैसे भी उत्तराखण्ड सरकार जब राज्य आंदोलनकारियों को चिन्हित करने का करिश्मा कर सकती है तो सरकारी लोगों को चिन्हित करना तो उसके बाएं हाथ का खेल मात्र है.
यदि ऐसा होता है तो इससे ना सिर्फ प्रथमिक शिक्षा में ही सुधार आयेगा बल्कि समाज की कई और कुरीतियों से भी निजात मिलेगी. आज के युवा वर्ग की सोच बहुत ही ज्यादा व्यक्तिपरक होती जा रही है. और इसके लिए हम कत्तई भी उसे जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते. सुबह उठकर एसी गाड़ियों से फाइव स्टार स्कूलों में जाने वाले बच्चों को कभी मौका ही नहीं मिलता कि वो अपने समाज की दूसरी तस्वीर भी देखें. यह बच्चे बड़ा होने तक भी समाज के इस निचले तबके को कभी अपने समाज का हिस्सा नहीं समझते और इसीलिए उन्हें कभी भी इस वर्ग की चिंता नहीं होती. आज इन तथाकथित संपन्न परिवारों के अधिकतर अभिभावक ऐसे हैं जो अपने बच्चों को कभी भी गली/बस्ती के गरीब बच्चों के साथ खेलने नहीं देते, उनसे दोस्ती नहीं करने देते. कई बच्चों को तो गरीब बच्चों के साथ होने का मौका ही नहीं मिलता और जिन्हें मिलता भी है उन्हें अभिभावक डांट-फटकार कर दूर रहने की ही सलाह देते हैं. ऐसे में स्वाभाविक तौर से ही बच्चा खुद को इस वर्ग से अलग कर देखने लगता है और बचपन से ही मान लेता है कि उसका एक अलग समाज है जिसमे इन गरीब लोगों की कोई जगह नहीं है. बड़े अधिकारियों और अमीर नेताओं के बच्चे भी यदि इन गरीब बच्चों के साथ सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पढेंगे तो निश्चित ही उनकी सोच में भारी बदलाव आयेगा. इन बच्चों को समाज के दोनों वर्गों की हकीकत देखने को मिलेगी और वे कभी भी खुद को इस निचले तबके से अलग कर नहीं देखेंगे. जब तक नीतियां बनाने वाले स्वयं उन नीतियों से सीधे तौर पर प्रभावित नहीं होते तब तक उनकी नीयत संदेहजनक ही बनी रहेगी. और उनकी नीयत तभी साफ़ मानी जा सकती है जब वे खुद भी उस वर्ग का एक हिस्सा हों जिसके लिए वे नीतियां बना रहे हैं.
राहुल कोटियाल
देहरादून


