निर्मल बाबा हों, या कोई और अन्य बाबा, बाबाओं के मायाजाल में पूरा भारत उलझा-फंसा हुआ है. गंडे, ताबीज, रुद्राक्ष जैसे चीजों की बिक्रियों से लेकर नापतौल जैसी ठग कंपनियों, लिंगवर्धक मशीन, पत्र-मित्रता या फिर संजीवनी बिल्डकोन, हिमालया हाउसिंग को-ओपरेटीव, या अब एक और यशराज बिल्डर (कुछ दिन में/माह में भागेगा), जेवीजी, हेलियस का मामला हो या इस प्रकार के मीडिया के साथ पार्टनर बनाकर बिजनेस करनेवाला शातिर, सबमें औद्योगिक घराने के अखबार, टीवी चैनल ने उनके अवैध धंधों को बढ़ावा दिया है, दे रहे हैं, क्योंकि उनकी कमाई भी उसके विज्ञापन से सुनिश्चित होती हैं, जब तक लोग-बाग, गरीब जनता पूरी तरह ठगी के शिकार न हो जाय, उन्हें इससे कोई लेना देना देना नहीं होता.
जब ठगी का समाचार (अब तो सोशल मीडिया का युग आ गया है), सोशल मीडिया पर रात-दिन अनवरत आता रहता है, उस स्थिति बनियों के चैनल-अखबार को समझ में आने लगता है कि अब ठगों का ही नहीं, उनका ही भांडाफोड होने वाला है, तब वो जागते हैं, अब उनकी मजबूरी होती है कि वे ठगी करने वालो के विरुद्ध नाटक ही सही, कुछ लिखकर-दिखाकर नाम कमाएँ,( उससे भी टीआरपी से विज्ञापन तो मिलते हैं), फिर उन्हें कलम और कैमरे से दबोचने का नाटक करता हुआ दिखने लगते हैं. जब सबकुछ सामने आ जाता है तब, पहले क्यों नहीं? यह सवाल है बड़े मीडिया से, सबने देखा कि प्रभात खबर ने सिर्फ बाबा का खाता नम्बर हासिल कर बहुत बड़ा महान कारनामा कर डाला, क्या बात है! वाह रे, खोजी पत्रकार और खोजी पत्रकारिता? यही बात है तो पहले क्या निर्मल बाबा के सम्बन्ध में इतना इल्म नहीं हुआ. विजय पाठक और हरिवंश एंड कम्पनी को, आप पुरस्कार बांटते हैं, लोगों को क्यों नहीं जागरूक करते ऐसे ठगों से बचने के लिए? सस्ती लोकप्रियता! सेठ जी के अखबारों के अलावा और क्या उम्मीद की जा सकती है?
सोशल मीडिया का एक पत्रकार और उनके वेबसाइट का तो लोग नाम भी नहीं लिया. क्यों? निर्मल बाबा के सम्बन्ध में सबसे पहले समाचार को प्रकाशित करने वाले पत्रकार धीरज भारद्वाज हैं. उनका नाम बनिया द्वारा चलाये जा रहे मीडिया ने एक बार नहीं लिया और हरिवंश को हीरो बना रहा है? मैं जब फेसबुक पर कुछ माह पहले निर्मल बाबा के सम्बन्ध में सावधान किया तो एक सज्जन राजीव शंकर मिश्र “बनारसवाले” के साथी और उनके जैसे लोगों ने मुझे गलियां दी, तब मैं उन मूर्खों से बहस करना उचित नहीं समझा, क्योंकि भारतीय समाज का ६९ प्रतिशत जनता कहीं न कहीं अन्धविश्वास में जाकड़ी हुई है. गांव-गिरांव ही नहीं, शहर, महानगरों का हाल तो और बुरा है कि लोग ऐसे चमत्कार,पर भरोसा करते हैं. इसी का लाभ उठाकर मनोवैज्ञानिक रूप से बाबाओं ने भोली-भाली जनता को अपना शिकार बनाता रहा है.
दूसरी और मीडिया (टीवी चैनल) ठग शातिर लोगों, बाबाओं का विज्ञापन करता है, तो क्या उन्हें यह नहीं मालूम होता कि उनके फ्रॉड विज्ञापन से जनता का नुकसान होगा? समय रहते ये लोग पैसे के मोह में इतने अंधे क्यों हो जाते है, उनका पत्रकारिता धर्म उस समय कहां चला जाता है? लाल किताब को मदारी की तरह बेच कर किनका भला किया जा रहा है? कई सवाल हैं बड़े मीडिया वालों से और एक महत्वपूर्ण सवाल (झारखण्ड के प्रथम विधानसभा अध्यक्ष, जिनके समय से ही विधानसभा में भ्रष्टाचार का बीजारोपण हुआ था, जिसकी फसल लोग कट रहे हैं) नामधारी जी से है कि वे यह जानते थे कि उनका साला लोगों को ठग रहा है, फिर भी वे अपनी नैतिक और नेता धर्मं के चूक गए? वे इस मामले को राज्यसभा में क्यों नहीं उठाया कि लोगों को बड़े पैमाने पर ठगा जा रहा है. उनके साले द्वारा? कोई दूसरा होता तो भी नामधारी जी सवाल नहीं उठाते? इस सवाल का जवाब नामधारी को देना होगा. यदि वो नहीं देते तो यह समझा जाना चाहिए कि नामधारी भी निर्मल बाबा के साथ अप्रत्यक्ष रूप से निर्मल बाबा के कार्य में शामिल हैं! सवाल यही नहीं समाप्त होता उन मीडिया को भी यह जवाब देना होगा, जो जानते बूझते हुए कि जिस प्रकार निर्मल बाबा करोड़ों रुपए कमा रहे हैं, वह अवैध है, फिर भी उनके साथ रहकर टीवी पर उनके फ्रॉड कार्यक्रम को प्रसारित कर रहा है? क्या उनके ऊपर चार सौ-बीसी में साथ देने के अपराध नहीं लागू होता? क्यों नहीं बाबा के साथ-साथ उनके ऊपर भी मुकदमा चले? यह सवाल जनता से है. आप अपनी प्रतिक्रिया दीजिए.
लेखक अरुण कुमार झा दृष्टिपात पत्रिका से जुड़े हुए हैं.


