हम सब एक असहिष्णु समाज का निर्माण कर रहे हैं, जहाँ कोई किसी की बात नहीं सुनना चाहता, जहाँ सबकी अपनी स्थापनाएं हैं, अपनी मान्यताएं हैं। कई तो बिल्कुल निरर्थक और औचित्यहीन, पर वे उसी पर डटे हुए हैं, टस से मस होने को तैयार नहीं। व्यक्ति, संस्थाएं, सत्ता प्रतिष्ठान सभी इस रोग से ग्रस्त हैं। दूसरे विचारों के प्रति एक कट्टर अनुदारता, अझेल अस्वीकार हमारी पूंजीवादी संस्कृति की एक अनिवार्य बुराई की तरह फैल रहा है। सभी सुनाना तो चाहते हैं लेकिन सुनने को कोई तैयार नहीं है, सुनने का धैर्य जैसे खो गया है। असहमति के प्रति आदर का भाव खत्म होता जा रहा है। इसे द्वेष समझा जाने लगा है। एक धारणा सी बनती जा रही है कि जो असहमत है, वह विरोधी है, वह दुश्मन है। जो सवाल करता है, वह नुक्ताचीं है, संदेहालु है इसलिए समाज का, सरकार का शत्रु है। कितनी विचित्र बात है। लगता है कि विचारों केविकास की गति रोकने की बड़ी साजिश रची जा रही है।
पूंजी केवल कमाने, खुद को विशाल से विशालतर और विशालतम बनाने की मंशा से काम करती है। इसे न किसी सभ्यता की फिक्र होती है, न किसी संस्कार की, न ही किसी विचार की। इसका माडस अपरेंडी यह है कि कुछ ऐसा करते रहो कि लोग तर्क करना भूल जायें, बहस करना छोड़ दें, विचार करना बंद कर दें। मस्त रहें, आनंद उठायें, खरीदें, बेंचे, अच्छे से अच्छा कपड़ा पहने, बढिय़ा से बढिय़ा साबुन, पेस्ट, क्रीम का इस्तेमाल करें, सज-धज कर बाहर निकलें। हाई-टेक रहें, महंगा से महंगा मोबाइल, कंप्यूटर इस्तेमाल करें। अपने जैसे लोगों से संपर्क में रहें। कमायें और कमाने दें। अगर सोचना ही चाहते हैं तो आलीशान गाडिय़ों के बारे में सोचें, दुनिया की सुंदर जगहों के बारे में, वहाँ जाकर सुख प्राप्त करने के बारे में सोचें। कुछ न भी खरीदें तो कोई बात नहीं बड़े-बड़े माल में जायें, उनकी स्वचालित सीढिय़ों पर चढ़ें-उतरें, वक्त मिले तो पागल कर देने वाली फिल्में देखें। पूंजी और बाजार ने इतना सारा कुछ पेश कर दिया है कि किसी और चीज के बारे में सोचने की जरूरत ही नहीं है, बस धन हासिल करने और उसके बदतर इस्तेमाल के बारे में सोचने की जरूरत है। अगर हर शहर में एकाध आलीशान कोठी हो तो कितना मजा रहेगा? इतना पैसा हो कि कहीं भी सुविधाजनक तरीके से कम वक्त में जाया जा सके, किसी समुद्री बीच के पास सुंदर होटल में ठहरा जा सके, वहाँ बिकने के लिए आसानी से उपलब्ध सौंदर्य का आनंद उठाया जा सके तो जाता क्या है।
सत्ता और पूंजी का अन्योन्याश्रित संबंध है। पैसा पागल कर देता है तो सत्ता भी कुछ ऐसा ही करती है। सत्ता चाहे जैसी हो, धन की, बल की, सौंदर्य की, व्यवस्था की, सरकार की, सबका एक ही स्वभाव होता है। सभी रचना और चिंतन के खिलाफ काम करती हैं। सभी सोचने की प्रक्रिया को कुंठित करती हैं, सभी असहमति का निषेध करती हैं, सभी उदारता के विरुद्ध सक्रिय होती हैं। सत्ता ही बाबाओं के साम्राज्य को बढ़ाने में भी योगदान करती है और सत्ता ही आतंक को भी जन्म देती है। आतंक स्वयं सत्ता का भी हो सकता है और सत्ता के विरुद्ध असहमत ताकतों का भी। सत्ता असहिष्णुता की भी जननी है। ऐसे असहिष्णु कई बार बड़े लोकतांत्रिक भी दिखते हैं। असहमति को अस्वीकार करने के उनके तर्क होते हैं, उन्हें आप मानें या न मानें। जो खुदा हो गये हैं, भले ही जनता की मदद से, वे भी अपनी सत्ता को चुनौती बर्दाश्त नहीं करते। कोई उनका कार्टून बना दे, उन्हें स्वीकार नहीं है, कोई उनकी आलोचना करे, उन्हें स्वीकार नहीं है। हम सबने देखा है कैसे एक असहमत लेखक का गला काट लेने के लिए इनाम घोषित किये जाते रहे हैं। हिंदुस्तान भी इन मामलों में पीछे नहीं रहा है। हमारी सरकारें आतंक के आगे घुटने टेकती रही हैं, दंडवत होती रही हैं। बातें चाहे जितनी की जायं लेकिन किसी सलमान रश्दी, किसी तसलीमा नसरीन या किसी मकबूल फिदा हुसैन को तसलीम करना हमारी सरकारों के लिए कितना मुश्किल होता है, यह हम सभी जानते हैं।
जो असहमत होने का साहस रखते हैं, वही कुछ नया करने की ताकत भी रखते हैं। बने-बनाये रास्ते दिखी-दिखायी मंजिलों तक ले जाते हैं। नयी मंजिलें, नयी ऊंचाइयां हमेशा नये रास्तों की मांग करती हैं। ज्यादातर लोगों को या तो बाजार ने जड़ बना दिया है या परंपराओं ने। जिन्हें बाजार ने जड़ बनाया है, वे बहुत डरपोक लोग होतें हैं। वे किसी भी विचार का न विरोध करते हैं, न समर्थन। उन्हें इससे ज्यादा कुछ लेना-देना नहीं होता। वे लाभ-हानि के गणित में ही सहमति-असहमति के सिद्धांत का पालन करते हैं। इरादों में वे बहुत खतरनाक होते हैं, किसी को भी खरीद लेने या गुलाम बना लेने में उन्हें तनिक परेशानी नहीं होती। वे रचनाधर्मियों और चिंतकों की भी बोली लगाने में पीछे नहीं हटते। वे चाहते हैं कि उनकी पूंजी बढ़ाने में बेहतर से बेहतर रचनात्मक दिमाग काम करें। वे ऐसा करने में कामयाब हो रहे हैं क्योंकि देश के ज्यादातर मध्यवर्गीय परिवार बाजार की चमक-दमक से आकर्षित हैं और इसलिए वे अपने प्रतिभाशाली बच्चों को पूंजीवादी साम्राज्यवाद की गोद में डालकर निश्चिंत होने में गौरव का अनुभव करते हैं। जिंदगी भर जिंदगी की दुश्वारियों की लात खाने वाले ऐसे लोगों को लाखों, करोड़ों के पैकेज की बात करते देखा जा सकता है, अपने बच्चों को बाहरी देशों की कंपनियों की सेवा में भेज कर मेलबर्न, कनाडा और यूके का गौरवगान करते देखा जा सकता है। परंपराओं की गत्यात्मकता से अनभिज्ञ अतीत में ठहरे हुए जड़तावादियों से तो और भी ज्यादा खतरे हैं। वे हर नयी कलात्मक, रचनात्मक गतिविधि, हर नये विचार के कट्टर दुश्मन होते हैं। वे सांप्रदायिक आतंकवादियों की तरह व्यवहार करते हैं। वे असहमति के सबसे बड़े शत्रु होते हैं। वे भयानक असहिष्णु और अनुदार लोग होते हैं।
ये दोनों ही आधुनिक भारतीय समाज के रास्ते के अवरोध हैं। उनसे लड़ाई चल रही है, चलती रहेगी। इन्हें खत्म करना मुश्किल है लेकिन इन्हें पराजित करना नामुमकिन नहीं है। एक सहिष्णु और उदार मन वाला समाज ही कलाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। कलाएं समाज को संस्कारित करती हैं, उसे चिंतनशील बनाती हैं, उसे विचार की प्रेरणा देती हैं। दुनिया भर की सभी बड़ी सभ्यताओं और संस्कृतियों केकेंद्र में विचार ही काम करता रहा है। विचार दर्शन और विज्ञान दोनों को रास्ता देता है। जिस समाज में कला, दर्शन और विज्ञान जितनी विकसित अवस्था में होगा, वह समाज उतना ही आधुनिक और श्रेष्ठ होगा। अगर हमें श्रेष्ठ होना है, दुनिया की बड़ी ताकत के रूप में उगना है तो केवल अमानवीय आर्थिक विकास हमारी मदद नहीं
करेगा। इसका चेहरा बदलना होगा, इसे मानवीय बनाना होगा। कलाकार, रचनाकार और वैचारिक अंतक्रिया को तेज करने वाली पक्षधर ताकतें समाज में इसी चेतना के विस्तार के लिए काम करती रहती हैं। ऐसा नहीं होता तो सांप्रदायिक जड़तावादी अपने नायकों के साथ अब तक अपराजेय हो चुके होते। हमें उन सकारात्मक शक्तियों के साथ खड़ा होना होगा, उनके जिहाद में शामिल होना होगा।
लेखक डा. सुभाष राय वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनसे संपर्क 09455081894 के जरिए किया जा सकता है.


