एक तरफ जहां पूरे देश के इलेक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया व वेब मीडिया में फ्राड निर्मल बाबा की खबरों को लेकर आपाधापी मची हुई है. वहीं बिहार के सबसे बड़े अखबार (प्रसार में) हिन्दुस्तान ने जाने किन कारणों से इस महत्वपूर्ण खबर के प्रति उदासीनता दिखाई है. ऐसे में फ्राड निर्मल बाबा की खबर नहीं प्रकाशित करने को लेकर कई तरह की चर्चा जारी है. उल्लेखनीय है कि अभी भी बिहार की 85 प्रतिशत आबादी रोजाना की खबरों के लिए अखबार पर ही आश्रित है. वैसे भी यहां शहरीकरण काफी कम है. शहरों या कस्बों के लोग तो दूसरे अखबारों, न्यूज चैनलों या खबर के अन्य स्त्रोत से काम चला लेते हैं. पर यहां की 60 फीसदी ग्रामीण जनता खबर जानने के लिए हिन्दुस्तान ही पढ़ती है.
हाल के कुछ सालों से हिन्दुस्तान में निर्ममतापूर्वक महत्वपूर्ण खबरों को दबाया जा रहा है. चाहे फारबिसगंज गोली कांड हो, नालंदा में महिलाओं की बर्बरतापूर्ण पिटाई हो, राज्य में तेजी से बढ़े फिरौती के लिए अपहरण या हत्या की घटना हो या सरकारी महकमे में चरम पर फैली घूसखोरी का मामला हो. कलमकार व पाठक भी आने वाले समय में हिन्दुस्तान के नम्बर एक का ताज उतरना तय मान रहे हैं. किसी भी खबर की विश्वसनीयता को लेकर आम पाठक खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं.
मुकेश विकास
मोतिहारी


