दिल्ली नगर निगम के चुनावों में कांग्रेस की पराजय के लिए जहाँ कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की नीतियों को उत्तरदायी ठहराया जा रहा है, वहीँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस पराजय में यूपीए की केंद्र सरकार और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भी बराबर का उत्तरदायी है. गांधीवादी समाजसेवी अन्ना हजारे और योगगुरु बाबा राम देव के पिछले वर्ष हुए आंदोलनों में दिल्ली की जनता ने जिस प्रकार से खुल कर दोनों का साथ दिया था उससे तो इनकी कुम्भकर्णी नींद खुलनी चाहिए थी. परन्तु सत्ता के मद में मस्त दिल्ली में बैठी दोनों सरकारों और इनके संगठन के शीर्ष नेतृत्व ने अपनी कमियों को दूर करने की अपेक्षा भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त आम जनता को ही ऑंखें तरेरना शुरू कर दिया. पांच राज्यों के चुनावों के नतीजों के बाद तो इनको समझ जाना चाहिए था कि बयार किस ओर बह रही है. भ्रष्टाचार और घोटालों के चलते आम जनता की नाराजगी के साथ ही सरकार और संगठन पर कमजोर पकड़ भी अब स्पष्ट दिखाई देने लगी है, जिसके कारण संगठन और सरकार में अनुशासनहीनता अपनी चरम सीमा पर है. लोकसभा के चुनावों से पूर्व ग्यारह राज्यों की विधानसभा के चुनावों का सामना भी अभी सभी दलों ने करना है. यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो ऐसे में आनेवाले चुनावों के नतीजे क्या होंगे यह समझाने की आवश्यकता नहीं है कांग्रेस को.
हिमाचल कांग्रेस की धड़ेबंदी की लड़ाई जिस प्रकार से अब गली-कूचों की लड़ाई में तब्दील हो रही है वह अवश्य ही कांग्रेस आलाकमान के लिए चिंता का विषय होना चाहिए. शिमला की बैठक में नारेबाजी और फिर कुछ सदस्यों का निलंबन, सरकाघाट में हाथ-पाई और सर-फुटव्वल और अभी हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा और प्रदेश संगठन के प्रधान का अलग-अलग दौरा और बेवजह की बयानबाजी के साथ ही अब युवा कांग्रेस में भी प्रदेश स्तर की गुटबाजी सतह पर आ गई है. लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ ही अनुशासन भी बहुत आवश्यक है. हिमाचल कांग्रेस में विधानसभा के चुनावों से पूर्व जो कुछ भी हो रहा है उसका एकमेव कारण नेताओं का स्वार्थ ही है. स्वार्थ की राजनीति के चलते नैतिक और लोकतान्त्रिक मूल्यों का भी ह्रास हो रहा है. कभी राजनीति त्याग और समाजसेवा का एक माध्यम माना जाता था. आज सभी दलों में ऊपर से नीचे तक वंशवाद और परिवारवाद को प्रश्रय देने का साधन बन चुकी है राजनीति. अब तो मात्र एक ही उद्देश्य रह गया है कि जब तक जिन्दा हूँ मैं ही मुख्यमंत्री बनूँ और मेरे बाद मेरा बेटा. शेष सभी नेता या कार्यकर्ता भाड़ में जाएँ. यही सब तो हो रहा है कांग्रेस, भाजपा और सभी क्षेत्रीय दलों में और यही दलों में झगडे़ का मुख्य कारण भी है. अन्य राज्यों के चुनावों में मिली पराजय और हिमाचल के चुनावों से पूर्व कांग्रेस के नेताओं की आपसी लड़ाई से साधारण कार्यकर्ताओं के मनोबल पर क्या असर पड़ रहा है यह मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल नेताओं को समझना चाहिए.
वैसे तो यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला है और किसी अन्य को इससे कोई सरोकार नहीं होना चाहिए, परन्तु स्वस्थ लोकतंत्र और राष्ट्रीय परिपेक्ष में कांग्रेस और भाजपा जैसे राष्ट्रीय दलों की मजबूती और बराबर की टक्कर रहना आवश्यक है अन्यथा क्षेत्रीय विचारधारा और जातीय आधारवाले प्रादेशिक दलों का वर्चस्व हो जायेगा जो देश और समाज का हित साधने में कितने सफल रहते हैं, यह किसी से छुपा नहीं है. अब यह निश्चित करना कांग्रेस के नेताओं का काम है कि अपने आचरण से वह कांग्रेस को सत्ता पर बैठाये रखते हैं या इसे डूबते जहाज की संज्ञा दिलवाने का काम करते हैं.
लेखक विनायक शर्मा मंडी से प्रकाशित साप्ताहिक अमर ज्वाला के संपादक हैं.


