कौन कहता है कि- बुद्धिजीवी बनिया नहीं बन सकता? पिछले दिनों निर्मल बाबा के बारे में न्यूज़ चैनल्स पर खुलासे देख रहा था। अजीब मुश्किलों का सामना करना पड़ा – मेरे दिमाग को। सुबह यही चैनल्स उनका समागम (पैसे लेकर) दिखाते थे और अब शाम को उनकी धज्जियां उड़ाते। एहसानफ़रामोशी का इस से ताज़ा नमूना देखने को नहीं मिला-लिहाजा ताज्जुब हुआ। सुबह और शाम की सोच में इतना बड़ा फर्क? या फिर सुबह नींद की अंगडाई में अंतार्त्मा भूल गयी कुछ कहना- और शाम को भड़ासिए अंदाज़ में शुरू। बाज़ार में चीज़ें बिकती हैं – पर रंग भी इतनी तेज़ी से बदलती हैं, गुमान तक ना था। दिल्ली की वादियों में ही रहकर, दूर-दृष्टी रख, पूरे हिन्दुस्तान का हाल बयां करने वाले हमारे चमत्कारी पत्रकारों को निर्मल बाबा के चमत्कार में खोट नज़र आया- सुबह नहीं, शाम को। निर्मल बाबा को भी समझ आया कि – उनसे भी बड़े चमत्कारी बाबा न्यूज़ चैनल्स में बैठे हैं। ऐसे बाबा- जो सुबह किसी का मुंह चमचमाता हुआ दिखा दें और रात होते-होते मुंह पर कालिख पोत दें।
निर्मल बाबा ने कोई साधना नहीं कि- पर स्वयंभू बन बैठे। गुरु घंटाल पत्रकारों की शरण में जाते तो सिद्ध हो जाते कि किसको कैसे साधना है। गुरु के बिना उपासना का परिणाम बुरा होता है। चमत्कारी (गुरु) पत्रकारों के बिना साधना का परिणाम, आज निर्मल बाबा को भोगना पड़ रहा है। पर कई चैनल्स को निर्मल बाबा का एहसान मानना चाहिए कि निर्मल बाबा ने उनकी टी.आर.पी. बढ़वा दी। जब बद थे तो भी और जब बदनाम हुए तो भी। इस मामले में निर्मल बाबा ने संतों जैसा काम किया। बुरा करने वालों का भी भला ही किया। ख़ास-कर उन चैनल्स का, जो समाचारों के लिहाज़ से बेचारे हैं और निर्मल बाबा के नाम से लोगों के ज़ेहन में पधारे हैं। ये ऐसे चैनल हैं, जो आम आदमी की समस्या पर कभी सर्वे नहीं कराते, पर निर्मल बाबा पर कराते हैं। और निर्मल बाबा के नाम पर ही अपना हुनर दिखाते हैं। यानी -निर्मल बाबा, हिन्दुस्तान की बुनियादी समस्याओं से बड़ी समस्या। सिर्फ निर्मल बाबा ही क्यों, कई मनोरंजन चैनल्स के कॉमेडी शो – न्यूज़ चैनल्स पर धड़ल्ले से चल रहे हैं। Totally Rejected Performer भी टीआरपी इसी बिना पर बढ़ा रहे हैं। यू-ट्यूब तो मानो ऑक्सीजन बन चूका हो, जिसके बिना जिंदा रहना नामुकिन है। ऐसा ना हो कि यू-ट्यूब के वीडियो को दिखा कर, ये “छुटभैये” खुद को अंतर्राष्ट्रीय चैनल घोषित कर दें।
जब “स्वयंभू” शब्द का कॉपीराइट रख ही लिया है तो शर्म काहे की। “स्वयंभू राष्ट्रीय मीडिया संस्थानों” में भारत के उत्तर-पूर्व, दक्षिण, पश्चिम (महाराष्ट्र छोड़कर) की खबरें करीब-करीब न के बराबर, लेकिन टैग राष्ट्रीय मीडिया संस्थान का। “नेशनल न्यूज़ चैनल” एक तकिया-कलाम है या फिर किसी बुनियाद पर खड़ा एक संस्थान – इसका फैसला अब तक नहीं हो पाया है। तमाम एडिटर-इन-चीफ्स और “बड़े पत्रकारों” के बारे में भी यही जद्दोज़हद कि – ये बुद्धिजीवी हैं या बुद्धिजीवी की खाल में बनिया? “बड़े पत्रकारों” जब ऊँचे ओहदों पर आते हैं और अपने मातहत का सेलेक्शन करते हैं तो बड़े गंभीर होकर, गौर से बायोडाटा देखते हैं (मानो खालिस पत्रकारों का जमावड़ा तैयार करने पर आमादा हैं) पर पूछताछ में वही पुराना राग- कहाँ काम किये हैं? एक पत्रकार क्या कर सकता है इसका अंदाज़ एक अनुभवी पत्रकार, एक स्क्रिप्ट-मात्र से कर सकता है (आखिरकार सबके पास वीडियो और बाइट तो, तकरीबन, एक जैसे ही रहते हैं, फर्क सिर्फ शब्दों की बुनाई और लिखाई का होता है। यही बुनाई और लिखाई ही, एक चैनल को दूसरे से अलग करती है)। पर “कहाँ काम किये हैं” का मतलब भविष्य की कई कूटनीतिक चालों की तरफ इशारा करता है। “बुद्धिजीवी की खाल में बनिया बन सकते हो या नहीं”, उनमें से एक होता है।
बुद्धिजीवी की खाल में बनियागिरी का ये आलम है कि न्यूज़ के लिहाज़ से Totally Rejected Performer चैनल्स के पत्रकारों को अपनी इसी कूबत पर लाखों की पेशकश हो रही है। क्योंकि बाज़ार की टी.आर.पी. के लिहाज़ से ये (ला) जवाब हैं। राहत की बात ये है कि एन.डी.टी.वी., जी न्यूज़, और अंगरेजी चैनल्स इन “बनियानुमा” पत्रकारों से सावधान हैं और उन्हें प्रोत्साहित करने के मूड में फिलहाल नहीं दिखते। बनिया, न्यूज़ पर ज़िंदा रहने का हौसला नहीं रखता और जो हौसला रखते हैं, उन्हें बनिया, बुद्धिजीवी नहीं बनने देता। ज़ाहिर है-नाटक अपने शीर्षक के साथ जारी रहेगा- भागो। बुद्धिजीवी की खाल में बनिया आया।
अंत में चलते-चलते
बुजुर्गों का कहना है
हर बात बिकती है- हर नशा बिकता है।
वो “सच” है- जो दिखता है
सुबह कुछ -तो-शाम को कुछ कहने वाला चाहिए
तजुर्बा नहीं – सिर्फ “दूर-दृष्टी” चाहिए
ज़बान चाहिए और अंदाजेबयां का हुनर चाहिए
इस लफ्फाजी के लिए एक अदद न्यूज़ चैनल चाहिए
मुर्दे को भी जिंदा होने का मिल गया हथियार
चमत्कारी पत्रकारों ने दिखा दिया अपना चमत्कार
चुप क्यों हैं निर्मल बाबा- कुछ तो कहिये
भले ही बनिया और बाबा दोनों बने रहिये
अंत में निर्मल बाबा कह दिए–
हर खरीदार को बाज़ार में बिकता पाया
हम क्या पायेंगे- किसी ने यहाँ क्या पाया
लेखक नीरज टेलीविजन पत्रकार हैं.


