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अहमद बुखारी के ब्‍लैकमेलिंग से होशियार रहे मुलायम

समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव विचित्र दुविधा में फंस गये हैं। एक तरफ उनके पुराने मित्र आजम खां हैं तो दूसरी तरफ जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी। जिस तरह एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती ठीक उसी तरह आजम खां के रहते सपा में उनसे बड़ा कोई और मुस्लिम नेता नहीं रह सकता। इस तथ्य के बावजूद सच्चाई यह है कि आजम खां एक राजनीतिक व्यक्ति हैं और वे धर्मगुरु होने का दिखावा नहीं करते जबकि श्री बुखारी इमाम होने के बावजूद राजनीति में पूरी दखल की इच्छा रखते हैं। इसी के साथ यह भी एक जाहिर तथ्य है कि बुखारी अपनी इमामत और व्यवहार, दोनों में खासे तानाशाह हैं और ऐसे कई अवसर आये हैं जब उन्होंने अपने विरुद्ध सवाल पूछने पर सरे-आम पत्रकारों की भी पिटाई की है। श्री बुखारी का अतीत बताता है कि उनकी कोई भी राजनीतिक विचारधारा नहीं है बल्कि अपने हितों को देखते हुए वे किसी भी राजनीतिक दल के साथ खड़े हो सकते हैं। कांग्रेस व सपा का साथ देने के अलावा वे बीते दिनों में भाजपा के पक्ष में भी चुनाव प्रचार कर चुके हैं। भाजपा को लगा था कि वह गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार के खूनी दाग को बुखारी से अपील करवाकर धो सकती है।

समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव विचित्र दुविधा में फंस गये हैं। एक तरफ उनके पुराने मित्र आजम खां हैं तो दूसरी तरफ जामा मस्जिद के इमाम अहमद बुखारी। जिस तरह एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती ठीक उसी तरह आजम खां के रहते सपा में उनसे बड़ा कोई और मुस्लिम नेता नहीं रह सकता। इस तथ्य के बावजूद सच्चाई यह है कि आजम खां एक राजनीतिक व्यक्ति हैं और वे धर्मगुरु होने का दिखावा नहीं करते जबकि श्री बुखारी इमाम होने के बावजूद राजनीति में पूरी दखल की इच्छा रखते हैं। इसी के साथ यह भी एक जाहिर तथ्य है कि बुखारी अपनी इमामत और व्यवहार, दोनों में खासे तानाशाह हैं और ऐसे कई अवसर आये हैं जब उन्होंने अपने विरुद्ध सवाल पूछने पर सरे-आम पत्रकारों की भी पिटाई की है। श्री बुखारी का अतीत बताता है कि उनकी कोई भी राजनीतिक विचारधारा नहीं है बल्कि अपने हितों को देखते हुए वे किसी भी राजनीतिक दल के साथ खड़े हो सकते हैं। कांग्रेस व सपा का साथ देने के अलावा वे बीते दिनों में भाजपा के पक्ष में भी चुनाव प्रचार कर चुके हैं। भाजपा को लगा था कि वह गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार के खूनी दाग को बुखारी से अपील करवाकर धो सकती है।

बुखारी की सपा से मौजूदा तकरार भी किसी नीति-सिद्धान्त को लेकर नहीं बल्कि अपने दामाद और भाई के राजनीतिक लाभ को लेकर है। ये अक्सर चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के पक्ष में तथाकथित फतवा जारी करते हैं। इनके फतवों का क्या राजनीतिक असर होता है, इसे इसी से जाना जा सकता है कि इनके अपने इलाके जामा मस्जिद में भी इनका समर्थित प्रत्याशी हार जाता है और इस बार सपा के टिकट पर विधान सभा का चुनाव लड़े इनके दामाद इनकी पुरजोर कोशिशों के बावजूद अपनी जमानत भी गॅवा बैठे हैं। अपने इन्हीं दामाद को इन्होंने सपा कोटे से विधान परिषद भिजवा दिया है और अब उसे कैबिनेट मंत्री बनाने के लिए मुलायम सिंह पर जोर डाल रहे हैं।

श्री आजम खां निःसन्देह एक राजनीतिक व्यक्ति हैं और जब उनसे तुलना करके श्री बुखारी को देखा जाय तो बुखारी की दखलन्दाजी साफ समझ में आती है। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव तथा अयोध्या विवाद पर लखनऊ उच्च न्यायालय के फैसले के बाद सपा प्रमुख मुलायम सिंह पर अपने मुस्लिम मतों को सहेजने का भारी दबाव था। इसी दबाव के चलते उन्होंने जब फैसले पर मुसलमानों के पक्ष का बयान दिया तो उनसे स्वयं मुसलमान ही असहमत हो गये थे। सभी जानते हैं कि आजम खां भी मुलायम की भारी मशक्कत के बाद ही सपा मे वापस हुए थे और अभी तक सहज नहीं हो पाये हैं। एक दौर में आजम खां ने भी मुलायम सिंह का ठीक से भयादोहन किया था। सुधीजन जानते ही होंगे अपनी वापसी के ऐन बाद हुए सपा के आगरा अधिवेशन में उन्होंने मुलायम सिंह को परेशान करने वाला कोई भी कदम बाकी नहीं रखा था। आज भी उनका यह अभियान चल ही रहा है।

इमाम अहमद बुखारी एक ऐसे शख्स हैं जो इमामत के अलावा संभवतः और सारे कार्य करते हैं। इनसे पहले इनके अब्बा जामा मस्जिद के इमाम हुआ करते थे और उन्होंने पैतृक सम्पत्ति की तरह जामा मस्जिद को अपने पुत्र को हस्तांतरित कर दिया जिसे वे ‘दस्तारबंदी ’ कहते हैं और यह इस्लाम के खिलाफ है। इसी जामा मस्जिद क्षेत्र में रहने वाली और जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय की समाजशास्त्री व स्तंभ लेखिका सुश्री शीबा असलम फहमी और उनके आर.टी.आई. एक्टिविस्ट व पत्रकार पति श्री अरशद फहमी ने सूचना के अधिकार के तहत दर्जनों अर्जी लगाकर जो जानकारियाँ इकठ्ठी की हैं वो इस मुल्क के निजाम और तुष्टीकरण की नीति पर माथा पीट लेने को मजबूर करती हैं। सुश्री शीबा बताती हैं कि यह परिवार इस परिसर में कई तरह के अवैध शुल्क उगाही, राष्ट्रीय संपत्ति को किराये पर देने के साथ-साथ ड्रग व नशा तंत्र, सेक्स रैकेट, हवाला रैकेट, मटका, सत्ता व विदेशी मुद्रा के अवैध विनिमय जैसे राष्ट्रविरोधी कार्यों की सरपरस्ती करता बताया जाता है।

सुश्री शीबा कहती हैं कि राष्ट्रीय धरोहर जामा मस्जिद के गेट नम्बर तीन स्थित पार्क को इन लोगों ने कार व बस की निजी वीआईपी पार्किंग में बदल दिया है और संभवतः दिल्ली की सबसे महंगी पार्किंग है। इस पार्किंग में कार के लिए 50 रुपये प्रति घंटा और बस के लिए 800 रुपये प्रतिदिन का रेट है! यह स्थल पर्यटन के लिए भी है और यहां देश-विदेश के पर्यटक बड़ी संख्या में आते हैं। अनुमान है कि यहां 150 से अधिक गाड़ियां रोज आती होंगी। यहां विदेशी मुद्रा बदलने की लगभग 150 अवैध दुकाने हैं। और पुलिस की हिम्मत नहीं कि वो इनकी शाही सरपरस्ती के खिलाफ जा सके। शीबा कहती हैं कि एक बड़ी त्रासदी ये है कि दिल्ली की जामा मस्जिद जो भारत की सांस्कृतिक धरोहर और एक जिन्दा इमारत है जो अपने मकसद को आज भी अंजाम दे रही है, इसे हर हालत में भारतीय पुरातत्व विभाग के जेरे-एहतेमाम काम करना चाहिए था, जैसे सफदरजंग का मकबरा है जहाँ नमाज भी होती है।

एक प्राचीन निर्माण के तौर पर जामा मस्जिद इस देश के अवाम की धरोहर है, न कि सिर्फ मुसलमानों की। मुगल बादशाह शाहजहाँ ने इसे केवल मुसलमानों के चंदे से नहीं बनाया था बल्कि देश का राजकीय धन इसमें लगा था और इसके निर्माण में हिन्दू-मुस्लिम दोनों मजदूरों का पसीना बहा है और श्रम दान हुआ है, इसलिए इसका रख-रखाव, सुरक्षा और इससे होने वाली आमदनी पर सरकारी जिम्मेदारी होनी चाहिए, न कि एक व्यक्तिगत परिवार की? शीबा का आरोप है कि एक प्राचीन शानदार इमारत और उसके संपूर्ण परिसर को इस परिवार ने अपनी निजी मिलकियत बना रखा है और धृष्टता ये कि उस परिसर में अपने निजी आलिशान मकान भी बना डाले और उसके बाग और विशाल सहेन को भी अपने निजी मकान की चहार-दिवारी के अन्दर ले कर उसे निजी गार्डेन की शक्ल दे दी। यही नहीं परिसर के अन्दर मौजूद डीडीए व एमसीडी के पार्कों को भी हथिया लिया जिस पर इलाके के बच्चों का हक था!

अपने दामाद और भाई के लाभ के लिए बुखारी आज मुस्लिम समाज के हित की आड़ लेकर मुलायम को धमकाते हैं लेकिन उन्हें पता होगा कि आज सपा में कुल 46 विधायक मुसलमान हैं और 45 सदस्यीय मंत्रिमंडल में 09 मंत्री मुसलमान हैं और राज्य का मुख्य सचिव भी मुसलमान ही है जो तीन दशक बाद संभव हुआ है! आजम खां कहते हैं कि हम शर्मिदा हैं कि उन्होंने इमाम होते हुए गैर इस्लामी जुमले बोले। मुनव्वर सलीम को उन्होंने अंधा, बहरा, लंगड़ा, अपाहिज कहा। यह गुनाहे अजीम (सबसे बड़ा गुनाह) है, इसके लिए अल्लाह से माफी मांगें। उधर बुखारी, बरेलवी उलेमा के निशाने पर भी आ गए हैं। नबीरे आला हजरत मौलाना बदर खां ने कहा, वह इमामत के लिए अहल (पात्र) नहीं हैं, क्योंकि वह दाढ़ी कटवाते हैं, जो शरीयत के अनुसार सही नहीं है। शरीयत में ऐसे शख्स को इमामत का हक नहीं दिया गया है। ऐसे इमाम के पीछे नमाज नहीं पढ़ने का हुक्म है।’’ इस सिलसिले में एक महत्त्वपूर्ण बात मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य और प्रसिद्ध वकील जफरयाब जिलानी ने कही है कि आजम और बुखारी दोनों मुस्लिम चेहरे नहीं हैं बल्कि प्रदेश के मुसलमान ने मुलायम में अपने विश्वास के चलते उनका समर्थन किया है।

लेखक सुनील अमर पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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