देश का राष्ट्रपति कैसा हो? अधिकाँश भारतीयों के मन-मस्तिष्क में यह सवाल कौंधता होगा? क्या राष्ट्रपति को मात्र रबर स्टाम्प जैसा होना चाहिए जैसा उदाहरण वर्तमान राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने पेश किया है। जिस प्रकार मीडिया में सोनिया गाँधी को मूक गुड़िया की संज्ञा दी जाती है, लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को खिसियानी बिल्ली कहा जाता है; ठीक उसी तरह देश में प्रतिभा देवी सिंह पाटिल को सबसे कमज़ोर एवं मालिक के प्रति सर्वाधिक वफादार राष्ट्रपति की संज्ञा दी जाती रहेगी। कमज़ोर इसलिए कि अपने पांच वर्षीय कार्यकाल में उन्होंने कभी सरकार के काले-कारनामों के विरुद्ध मुंह नहीं खोला और वफादार भी इसलिए कि उन्होंने वही किया जो कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गाँधी की मंशा के अनुरूप हो। उन्हें भारतीय इतिहास का सबसे खर्चीला एवं विवादास्पद राष्ट्रपति के रूप में भी याद किया जाएगा। मात्र गाँधी परिवार से अपनी वफादारी के चलते राष्ट्रपति पद तक पहुंची प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने राष्ट्रपतियों की उसी वफादार परंपरा का निर्वहन किया है, जिसमें कहा जाता है कि राष्ट्रपति उपकार का बदला ज़रूर चुकाते हैं। और उस उपकार की कीमत देश को भोगनी पड़ती है।
अब जबकि मौजूदा राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का कार्यकाल २४ जुलाई को समाप्त हो रहा है और २५ जुलाई से भारत के १३ वें राष्ट्रपति का कार्यकाल शुरू होना है, लिहाज़ा जून माह में ही राष्ट्रपति के चुनाव होने हैं। पिछली बार तो कांग्रेस ने प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के रूप में अपने वफादार मोहरे को राष्ट्रपति पद पर आसीन करवा दिया था, किन्तु इस बार उसकी राह आसान नहीं दिखती। वहीं एनडीए भी संख्या बल के लिहाज़ से अपनी पसंद के उम्मीदवार को राष्ट्रपति पद तक नहीं पहुंचा सकता। इन परिस्थितियों में क्षेत्रीय दलों का महत्व एकाएक बढ़ गया है। सभी कि चिंता इस बात को लेकर है कि कैसे भी अपनी पसंद के व्यक्ति को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठाया जाए ताकि स्वहितों की निर्बाध पूर्ति होती रहे। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में राष्ट्रपति पद के चुनाव हेतु जोड़-तोड़ की राजनीति देश में लोकतंत्र की दशा-दिशा को रेखांकित करती है।
सरकार के घटक दल एनसीपी के मुखिया शरद पवार ने गैर-राजनीतिक व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाए जाने का शगूफा छेड़ा है। यानी शरद पवार को उम्मीद है कि यदि कोई गैर-राजनीतिक व्यक्ति राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनता है तो उसको कमोबेश सभी राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिलेगा। इस फेरहिस्त में गैर-राजनीतिक सैम पित्रौदा तथा इनफ़ोसिस के नारायणमूर्ति का नाम उछला है। लालू प्रसाद यादव ने अंसारी ने नाम को राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी हेतु आगे बढ़ाया है। वहीं सपा पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम आज़ाद को राष्ट्रपति पद पर देखना चाहती है। सपा नेता शाहिद सिद्दीकी ने कलाम के नाम को राष्ट्रपति पद हेतु उपयुक्त बताया था, किन्तु मुलायम सिंह यादव ने इसे उनकी निजी राय बताकर पलड़ा झाड लिया। वैसे इसकी उम्मीद अधिक है कि देर-सबेर मुलायम भी कलाम के नाम का समर्थन कर ही देंगे। किन्तु यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कलाम दूषित राजनीति के दौर में पुनः राष्ट्रपति बनना चाहेंगे? जून-जुलाई २००७ में जब राष्ट्रपति के चुनाव होने थे तब कलाम के नाम को जिस तरह दरकिनार किया गया उससे कलाम द्रवित हुए थे और उन्होंने दोबारा राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी से स्वयं को अलग कर लिया था। अब जबकि कलाम शिक्षक के रूप में देश की वर्तमान पीढ़ी के भविष्य निर्माण को राह दे रहें हैं, उनकी राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी पर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। हाँ, इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि चूँकि कलाम निर्विवाद व्यक्तित्व हैं और दुनिया में उनके प्रति सम्मान का भाव है, राष्ट्रपति पद के लिए उनका नाम सर्वथा उपयुक्त है। किन्तु दुःख तब होता है जब समानता का संदेश देने वाली विभूति के साथ भी जात-पात की राजनीति की जाती हो। सपा नेताओं ने अपनी मुस्लिम सरपरस्ती को भुनाने के लिए ही कलाम का नाम राष्ट्रपति पद हेतु आगे किया है।
हालांकि मुलायम के देश के तत्कालीन रक्षामंत्री रहते हुए कलाम उनके रक्षा सलाहकार हुआ करते थे। इतना ही नहीं २००२ में मुलायम सिंह ने ही सबसे पहले कलाम का नाम राष्ट्रपति पद हेतु सुझाया था। लेकिन उस वक़्त कलाम को आगे लाने के पीछे मुलायम का एक ही मकसद था- सपा में मुस्लिमों की वोट-बैंक ताकत। इस बार भी सपा के नेता कलाम को आगे कर मुस्लिमों के बीच संदेश देना चाहते हैं कि सपा ही मुस्लिमों को आगे लाने का काम करती है। कलाम के नाम पर एन.डी.ए को तो कोई परेशानी होनी भी नहीं चाहिए। ममता बनर्जी ने भी संकेत दिया है कि वे सपा के उम्मीदवार का विरोध नहीं करेंगी और कलाम के नाम पर तो वे भी मुस्लिमों के बीच संदेशवाहक का काम करेंगी। जहां तक बात बसपा सुप्रीमो मायावती की है तो उनका इस मुद्दे पर स्टैंड उम्मीदवार और खुद से जुड़े नफा-नुकसान देखकर ही सामने आएगा। हाँ, कलाम के नाम से कांग्रेस को अजीर्ण ज़रूर हो सकती है। २००७ में भी कांग्रेस ने ही कलाम के नाम का दोबारा राष्ट्रपति पद हेतु पुरजोर विरोध किया था। किन्तु कांग्रेस अभी इस स्थिति में नहीं है कि प्रणव मुखर्जी, वर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, पी.ए. संगमा, कर्ण सिंह, शिवराज पाटिल या अपने किसी विश्वासपात्र को कलाम के मुकाबले खड़ा कर उसे राष्ट्रपति पद की शपथ दिलवा दे। मुयालम, ममता और माया में दो का साथ जिसे भी मिलेगा, राष्ट्रपति उसी की पसंद का बनेगा।
कलाम का नाम राष्ट्रपतियों की उस सूची को आगे बढ़ता है जिसमें स्व. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, स्व. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, स्व. डॉ. जाकिर हुसैन जैसे व्यक्तित्व थे, जिन्होंने राष्ट्रपति पद की संवैधानिक मर्यादाओं से कभी समझौता नहीं किया। उलटे वैश्विक परिदृश्य में भारत की छवि ही उजली हुई। समय के साथ राष्ट्रपति पद की गरिमा भी खोखली होती गई और ऐसे-ऐसे प्रत्याशी राष्ट्रपति पद की शोभा बढ़ाने लगे जो मात्र सरकार के हितों को संरक्षण देने का कार्य करते थे। इससे आज़ाद भारत में राष्ट्रपति पद की गरिमा को ठेस पहुंची और इस पद को ही वफादारी का सर्वोच्च इनाम समझा जाने लगा। इस परिपाटी को कांग्रेस ने ही जन्म दिया था और अब वही इसके प्रतिफल में बुराइयां भोग रही है। याद कीजिये इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में जब राष्ट्रपति मात्र चाटुकारिता धर्म का निर्वहन करते थे। भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा के विरुद्ध ऐसा अनैतिक आचरण उस दौर में राष्ट्रपति पद को कलंकित कर गया। भारत से उलट राष्ट्रपति पद के समानांतर ब्रिटेन में राजशाही है और वह सरकार के काम-काज में सलाह देती रहती है किन्तु वर्तमान में भारत के राष्ट्रपति ने सलाह देना भी बंद कर लिया है। माना कि राष्ट्रपति की सारी शक्तियां केंद्रीय मंत्रिमंडल में निहित होती हैं और प्रधानमंत्री एवं उसके मंत्रिमंडल की इच्छा के विपरीत वह कोई आचरण नहीं कर सकता किन्तु सरकार की नकेल तो कस ही सकता है न। उसके भ्रष्ट आचरण पर पर्दा डालने की बजाए उसे आईना तो दिखा ही सकता है न। किन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि राष्ट्रपतियों में इस आचरण को भी बिसरा दिया है।
फिलहाल राजनीतिक दलों से इतर आम आदमी ने भी राष्ट्रपति पद हेतु स्वयं की पसंद को सोशल नेटवर्किंग साईट्स एवं ट्विटर के माध्यम से लाना शुरू कर दिया है। यहाँ सबसे अधिक संतोषजनक बात यह है कि देश की अधिकाँश जनता भी डॉ. कलाम को ही राष्ट्रपति के गौरवपूर्ण पद पर दोबारा देखना चाहती है। कलाम का सम्पूर्ण जीवन ही देशभक्ति एवं त्याग की प्रतिमूर्ति बन चुका है। उनका नाम आँखों के सामने आते ही युवाओं के मन में देश के प्रति कुछ कर गुजरने का भाव उत्पन्न होता है। फिर कलाम को राजनीति की कुटिल चालों से भी कोई लेना-देना नहीं है। यदि आम जनता के पास राष्ट्रपति चुनने का अधिकार होता तो कलाम जैसा गैर-राजनीतिक व्यक्ति निर्विवाद रूप से इस पद की गरिमा सुशोभित कर रहा होता। राजनीतिक लिहाज़ से देखें तो चूँकि राष्ट्रपति पद हेतु वर्तमान में कलाम का नाम ही सबसे उपयुक्त एवं निर्विवाद प्रतीत होता है, लिहाज़ा सभी राजनीतिक दलों को स्वहित से ऊपर उठते हुए उनके नाम पर सर्वसम्मति से मुहर लगानी चाहिए ताकि उनका भी सम्मान बरकरार रहे। यदि राजनीति की कुटिल चालों में उलझकर कलाम का कद छोटा पड़ा तो यह उस संवैधानिक पद से साथ भी गरिमामय नहीं होगा। कलाम जैसे निष्पक्ष और देशप्रेमी व्यक्ति का राष्ट्रपति पद पर होना देश की ख्याति में चार चाँद ही लगाएगा।
लेखक सिद्धार्थ शंकर गौतम ग्वालियर से प्रकाशित स्वदेश में भोपाल ब्यूरो में विशेष संवाददाता हैं.


