: सामूहिक विवाह समारोह में शादी किया विजय खराड़ी ने : हमेशा देश को झकझोर देने वाली राजनीति से इतर इस बार खबर सामाजिक है, जिसने तमाम पूर्वाग्रहों को तोड़ते हुए समाज को आईना दिखाया है. खबर है कि शादी-विवाह में तड़क-भड़क और दिखावे की संस्कृति को ठेंगा दिखाते हुए गुजरात कैडर के एक आईएएस अफसर ने सामूहिक विवाह सम्मेलन में शादी कर युवाओं के लिए नया आदर्श पेश किया है। साबरकांठा जिले की खेड़ब्रम्हा तहसील के निवासी विजय खराड़ी आदिवासी समुदाय डूंगरी गरासिया से आते हैं। गत वर्ष जब वह आईएएस में चयनित हुए तो उनके समाज की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। विजय इस समुदाय के पहले आईएएस हैं। विजय वर्तमान में मध्य गुजरात के नर्मदा जिले में सहायक कलेक्टर के पद पर तैनात हैं। गत दिनों जब डूंगरी गरासिया समुदाय के उपाध्यक्ष बीएम खाणमा व अन्य ने उन्हें समाज के सामूहिक विवाह सम्मेलन में शामिल होने का न्योता दिया तो उन्होंने खुद भी समारोह में ही शादी की इच्छा जताई। पिता और परिजन सहमत नहीं थे, लेकिन विजय ने उन्हें मना लिया।
विजय का कहना है कि सामूहिक विवाह सम्मलेन में शादी करके धन की बर्बादी को रोका जा सकता है। इससे बचे हुए धन का इस्तेमाल समाज में शिक्षा-जागरूकता के लिए किया जाए तो समाज में क्रान्ति का सूत्रपात हो सकता है। विजय आखातीज को सामूहिक विवाह सम्मेलन में पड़ोसी गांव भिलोड़ा की सीमा के साथ विवाह-बंधन में बंध गए। इस समारोह में विजय और सीमा समेत 34 जोड़े विवाद बंधन में बंधे। इस खबर को मीडिया की सुर्खियाँ चाहे न मिली हों किन्तु विजय खराड़ी ने जिस सूझ-बूझ व दूरदर्शिता का परिचय दिया है, हमारे दिखावटी समाज को उससे सीख लेनी चाहिए। शादी-ब्याह में धन की बर्बादी से कौन परिचित नहीं होगा? दिखावे की इस अमीरी प्रदर्शित करने के चौंचले से समाज में निश्चित रूप से दूरियां बढ़ी हैं।
आधुनिकतम जीवन शैली में जीने की आदत और खोखले दिखावे ने हमारे समाज की बुद्धि की धार को भी कुंद कर दिया है। वर्तमान में एक मध्यम वर्गीय परिवार भी शादी पर खुले हाथों धन बहाता है। उसका मानना है कि इससे उसकी समाज में इज्ज़त और रुतबे में इजाफा होता है। विलासिता के दौर को देखें तो काफी हद तक यह बात सही भी जान पड़ती है कि वर्तमान परिवेश में समाज में तभी पूछ-परख होती है जब आपका हाथ धन के मामले में तंग न हो। किन्तु यह कहाँ की बुद्धिमता है कि अपना और बच्चों का पेट काट-काट कर उसी की शादी में दूसरों को भरपेट भोजन कराया जाए? आज भी हमारे देश के ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिल जाएगा कि खेती-बाड़ी करके अपना और अपने परिवार के जीवनयापन हेतु सीमित धनोपार्जन करने वाला किसान परिवार भी शादी जैसे सामाजिक कार्य में साहूकार से ब्याज पर धन लेकर जीवन भर उसका मूल भी नहीं लौटा पाता। तब शादी-ब्याह के आयोजन में धन का अपव्यय क्यूँ?
यहाँ एक तथ्य गौर करने लायक है कि शादी जैसे आयोजन में धन के अनावश्यक उपयोग ने ही दहेज़ जैसी सामाजिक बुराई को भी जन्म दिया है। लड़की के माता-पिता अपनी इच्छानुसार बेटी को विदाई के वक़्त कुछ दें तो इसमें उनका प्यार और स्नेह झलकता है किन्तु वर पक्ष की ओर से दहेज़ की मांग तभी की जाती है जब आप और हम खोखले दिखावे को ही सर्वोपरि मान उसका प्रदर्शन करने लगते हैं। तब समाज में एक ऐसी बुराई जन्म लेती है जिसे किसी भी नजरिये से उचित नहीं ठहराया जा सकता। दहेज़ के कारण कितने ही घर उजड़े हैं यह किसी से छुपा नहीं है? आज एक सामान्य सी शादी में ८-१० लाख रुपये खर्च होना आम बात है और कमोबेश सभी परिवार इतना खर्च करने की सामर्थ्य भी जुटा लेते हैं। हालांकि इतना खर्च करने के बाद काफी हद तक आर्थिक स्थिति डावांडोल हो जाती है किन्तु समाज में इज्ज़त और नाम की खातिर धन का ऐसा अपव्यय उन्हें बुरा भी नहीं लगता, किन्तु जो गरीब हैं या जिनमें खर्च करने की सामर्थ नहीं है वे तो लड़की पैदा होते ही उसे बोझ समझने लगते हैं।
शादी-ब्याह में धन का बेजा अपव्यय समाज में घर कर चुकी एक ऐसी बुराई है जिसका समूल नाश होना अत्यावश्यक है और इस बुराई को समाप्त करने में युवाओं की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। अधिकाँश माता-पिता यही चाहते हैं कि उनके बच्चों की शादी ऐसी हो कि सब देखते रह जाए। यदि युवा यह ठान लें कि वे अपने परिवार और समाज को मनाकर शादी जैसे पवित्र बंधन को पवित्र ही रहने देंगे और धन की चकाचौंध के आगे उसकी पवित्रता तो मलिन नहीं करेंगे तो समाज में निश्चित रूप से बदलाव ज़रूर आएगा। पढ़े-लिखे आईएएस अफसर विजय खराड़ी ने निःसंदेह युवाओं के लिए आदर्श प्रस्तुत किया है। उनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है।
लेखक सिद्धार्थ शंकर गौतम ग्वालियर से प्रकाशित स्वदेश में भोपाल ब्यूरो में विशेष संवाददाता हैं.


