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शाबाश, राष्ट्रपति महोदया इस ‘महान त्‍याग’ के लिए!

हमारे राजनीतिक नेताओं को अपनी निजी गरिमा की तो खास चिंता होती ही नहीं है, लेकिन अगर वे अपने पद की गरिमा बचा लें तो उन्हें शाबाशी देने का मन करता है। जी करता है कि कहूँ, शाबाश राष्ट्रपतिजी! हमारी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने पुणे में अपने जो दो बड़े प्लाट हथियाए थे, उन्हें छोड़ देने की घोषणा की है। यह वास्तव में उनका ‘महान त्याग’ है। सेवा-निवृत्त होने के बाद उन्हें 5 हजार वर्गफुट का प्लाट मिल सकता था लेकिन उन्होंने 2 लाख वर्ग फुट जमीन हथिया ली। यह जमीन रक्षा मंत्रलय की थी और वे हमारे देश की सर्वोच्च सेनापति हैं। इस दो लाख 20 हजार 8 सौ उनचास वर्गफुट के प्लाट पर उनके लिए आलीशान बंगला बनना था, जिसमें वे अपना शेष जीवन बिता सकें। इसका खर्च भी सरकार को ही उठाना था। मालिक का मालिक कौन? राष्ट्रपति को कौन बरज सकता था? वे चाहतीं तो लूट के इस माल पर बेखटके मजे कर सकती थीं। इसलिए मैंने उनकी घोषणा को ‘महान त्याग’ कहा है।

हमारे राजनीतिक नेताओं को अपनी निजी गरिमा की तो खास चिंता होती ही नहीं है, लेकिन अगर वे अपने पद की गरिमा बचा लें तो उन्हें शाबाशी देने का मन करता है। जी करता है कि कहूँ, शाबाश राष्ट्रपतिजी! हमारी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने पुणे में अपने जो दो बड़े प्लाट हथियाए थे, उन्हें छोड़ देने की घोषणा की है। यह वास्तव में उनका ‘महान त्याग’ है। सेवा-निवृत्त होने के बाद उन्हें 5 हजार वर्गफुट का प्लाट मिल सकता था लेकिन उन्होंने 2 लाख वर्ग फुट जमीन हथिया ली। यह जमीन रक्षा मंत्रलय की थी और वे हमारे देश की सर्वोच्च सेनापति हैं। इस दो लाख 20 हजार 8 सौ उनचास वर्गफुट के प्लाट पर उनके लिए आलीशान बंगला बनना था, जिसमें वे अपना शेष जीवन बिता सकें। इसका खर्च भी सरकार को ही उठाना था। मालिक का मालिक कौन? राष्ट्रपति को कौन बरज सकता था? वे चाहतीं तो लूट के इस माल पर बेखटके मजे कर सकती थीं। इसलिए मैंने उनकी घोषणा को ‘महान त्याग’ कहा है।

यह महान त्याग उन्होंने न तो सरकार की वजह से किया है, न संसद की वजह से और न ही अदालत की वजह से! इसकी वजह है, खबरपालिका! जिन संस्थाओं को इस तरह की लूटपाट पर कड़ी नजर रखनी चाहिए, वे या तो लापरवाही या लिहाजदारी की शिकार हो जाती हैं। ऐसे में अखबारों और टीवी चैनल के उन बहादुर पत्रकारों को हमें प्रणाम करना चाहिए जो इस तरह की खबरों को दबने नहीं देते। यह खबर निकली है, सूचना के अधिकार से। फौज के दो सेवा-निवृत्त अफसरों और उनके एक मित्र ने इस लूट का भांडाफोड़ किया था। प्रतिभाजी की प्रतिभा को हम दाद दिए बिना कैसे रह सकते हैं? अपने ‘महान त्याग’ के लिए उन्होंने बहाना भी कितना सुंदर ढूंढा है? उन्होंने कहा है कि इन दोनों प्लाटों को शहीद विधवाओं को दिए जा रहे प्लाटों से जोड़ा जा रहा है। इसीलिए उनका अंत:करण अनुमति नहीं देता कि वे इस बदनामी को सहें। मुंबई की आदर्श सोसायटी वाला आरोप वे अपने पर नहीं लगने देना चाहतीं। दुबारा, शाबाशी, आपको राष्ट्रपति महोदया!! क्या अदभुत अदा है, आपकी! आप लड़ती हैं और हाथ में तलवार भी नहीं। शहीद विधवाओं वाला मामला कहां से पैदा हुआ है? अपनी इस निर्ल्लज लूटपाट का कवच बनाने के लिए आपके पास अब बस शहीदों की विधवाएं ही रह गई थीं? आपने राष्ट्रपति पद पर आने के पहले और अब जाने के पहले जो नाम कमाया है, उसके लिए बधाई! आपके ‘महान त्याग’ पर आपको शाबाशी तो पहले दे ही चुका हूं।

लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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