नमस्कार यशवंत जी, मैं एक मीडिया स्टूडेंट रह चुका हूं. एक अच्छे सपने के साथ मैंने भी मीडिया संस्थान में प्रवेश लिया था, सोचा कि बहुत कुछ करूँगा. स्नातक करने के बाद एमिटी विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया. बड़ी भारी फीस चुकाई. सोचा कि अच्च्छी पढ़ाई होगी, लेकिन एक सेमेस्टर में तो कुछ हुआ भी, पर उसके बाद सब सन्नाटा था. प्लेसमेंट का झांसा दिया गया था. वो भी कोरा कागज़ निकला. दो साल का कोर्स ख़तम होते होते मैनेजमेंट, फैकल्टी और हेड संजय मोहन जौहरी के सुर बदलने लगे. कुछ नहीं मिला न ज्ञान, न नौकरी. यहां कोई भी लेक्चरर पढ़ाना नहीं चाहता है. रोमेश चतुर्वेदी, दुर्गेश पाठक आदि केवल शो पीस हैं. इनको हमेशा डर रहा है कि कोई लड़का कुछ सीखकर इनकी जगह ना आ जाए.
कॉलेज में पढ़ाई का कोई माहौल नहीं रहता. बस केवल पैसे का प्रदर्शन और कुछ नहीं, जब फैक्लटी से कुछ शिकायत करो तो रोमेश जैसे लोगों से जवाब मिलता है कि मुझसे पूछकर प्रवेश लिया था क्या? मैं इस माध्यम के द्वारा सभी मीडियाकर्मियों और विद्यार्थियों को एक सूचना देना चाहता हूँ कि कभी भी एमिटी में प्रवेश न लें, नहीं तो वो भी मेरे जैसे दर’दर की ठोकरें खायेंगे. यहाँ से अच्छा है कि आप इन्हीं फीस के पैसे से कोई धंधा शुरू कर दें, फायदे में रहेंगे. बहुत दिनों से ये भड़ास मेरे मन में थी. आज लग रहा है कि कुछ सही कर रहा हूं. लोगों को सही-सही बताकर, ताकि वो इस लूट की दुकान से बच सकें. मैं भड़ास से निवेदन करता हूं कि इस पत्र को स्थान दे, ताकि कई लोगों का भला हो सके, क्यूंकि अब इसी पर भरोसा रह गया है कि कोई तो है लोगों को इस लूट से बचा सकता है. पोस्ट ग्रेजुएट की फीस तीन लाख रुपये है कृपया इसे बरबाद ना करें.
प्रशांत सिंह
एमिटी का पूर्व छात्र
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