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कलाकार अपनी कला के माध्यम से भगवान से जुड़ता है – प्रो सुंदरलाल

: चौताल सम्राट वंशराज सिंह को कुलपति ने किया सम्मानित : जौनपुर : वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के रजत जयंती वर्ष के अंतर्गत गुमनामी के दौर में जी रहे लोक कलाकारों को सम्मानित करने की शुरुआत सोमवार को चौताल सम्राट वंशराज सिंह को कुलपति प्रो सुंदर लाल ने सम्मानित करके की. कुलपति प्रो सुन्दरलाल ने स्वयं श्री सिंह के पैत्रिक आवास जनपद के ग्राम पंचायत अर्धपुर बक्शा जाकर लोक संगीत के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान के लिए विश्वविद्यालय की तरफ से सम्मान पत्र एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया. ज्ञातव्य हैं कि 1942 में जन्मे श्री सिंह ने 1966 में बीएचयू से अंग्रेजी से एमए करने के बाद भी नौकरी को प्राथमिकता न देते हुए लोक संगीत व समाज सेवा को ही सर्वोपरि माना. आज वह गम्भीर बीमारी के चलते अस्वस्थ हैं। चौताल जैसे दुरूह गायन में जिसके एक पद के गायन में ही बीस मिनट लगते है, लगातार कई घंटे तक ढोल बजाने का रिकार्ड है.

: चौताल सम्राट वंशराज सिंह को कुलपति ने किया सम्मानित : जौनपुर : वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के रजत जयंती वर्ष के अंतर्गत गुमनामी के दौर में जी रहे लोक कलाकारों को सम्मानित करने की शुरुआत सोमवार को चौताल सम्राट वंशराज सिंह को कुलपति प्रो सुंदर लाल ने सम्मानित करके की. कुलपति प्रो सुन्दरलाल ने स्वयं श्री सिंह के पैत्रिक आवास जनपद के ग्राम पंचायत अर्धपुर बक्शा जाकर लोक संगीत के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान के लिए विश्वविद्यालय की तरफ से सम्मान पत्र एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया. ज्ञातव्य हैं कि 1942 में जन्मे श्री सिंह ने 1966 में बीएचयू से अंग्रेजी से एमए करने के बाद भी नौकरी को प्राथमिकता न देते हुए लोक संगीत व समाज सेवा को ही सर्वोपरि माना. आज वह गम्भीर बीमारी के चलते अस्वस्थ हैं। चौताल जैसे दुरूह गायन में जिसके एक पद के गायन में ही बीस मिनट लगते है, लगातार कई घंटे तक ढोल बजाने का रिकार्ड है.

सम्मानित होते समय वंशराज सिंह की आँखें भर आई गई थी. वह पिछले कई सालों से लम्बी बीमारी से ग्रस्त हैं और कभी ढोल पर थिरकने वाले हाथ आज काम नहीं कर रहे हैं. श्री सिंह को सम्मानित करते हुए कुलपति प्रो सुंदरलाल ने कहा कि लोक संगीत में महारत हासिल करने के बाद भी जो लोक कलाकार आज गुमनामी के दौर में जी रहे हैं, उनको सम्मानित करना विश्वविद्यालय की तरफ से नई पहल हैं. वंशराज सिंह ने हमारी लोककला को वाद यंत्रों के माध्यम से जिस तरीके से लम्बे समय तक लोकप्रिय बनाये रखा उसको भुलाया नहीं जा सकता हैं. ऐसे अद्वितीय कलाकारों को आगे भी सम्मानित कर विश्वविद्यालय उनके साथ अपनी भी पहचान देगा. उन्होंने कहा कि हमारे समाज में लोककला का एक लम्बा इतिहास रहा हैं. मनोरंजन के साथ ही साथ हमें इनसे उर्जा भी मिलती रही हैं.

उन्होंने कहा कि कलाकार अपनी कला के माध्यम से भगवान से जुड़ता है. संगीत और कला की विधाओं में रमने के बाद हम अपने आप को भूल जाते हैं. उन्होंने कहा कि संकलन के अभाव में लुप्तप्राय हो चले आंचलिक लोकगीतों को विश्वविद्यालय इसी रजत जयंती वर्ष में स्थापित होने वाले अपने सामुदायिक रेडियो के जरिये लोकप्रिय बनाएगा. वंशराज सिंह ने कहा कि आज बीमार ग्रस्त एक कलाकार को याद किया गया जिसकी कल्पना भी मैं नहीं कर सकता था. उन्होंने अपने अनुभवों को भी साझा किया. श्रीपति उपाध्याय ने कहा कि अगर लोक गीतों का संरक्षण नहीं हुआ तो हमारी संस्कृति का लोप हो जायेगा. लोक गीत की परंपरा आज भी जीवित रहे और फले फूले इसके लिए समाज के लोगों को आगे आना होगा. अधिवक्ता सूबेदार सिंह ने विश्वविद्यलय के इस पहल की प्रसंशा की. कार्यक्रम का संयोजन डॉ. मनोज मिश्र ने किया. इस अवसर पर डॉ. अजय प्रताप सिंह, डॉ. अजय द्विवेदी, डॉ. अवध बिहारी सिंह, डॉ. सुनील कुमार, डॉ. केएस तोमर सहित तमाम लोग मौजूद रहे.

दिग्विजय सिंह राठौर की रिपोर्ट.

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