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भाजपा : पार्टी विद डिफरेंस या पार्टी विद बंगारू?

पार्टी विद ए डिफरेंस का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी का दावा अब पार्टी को चुभन दे रहा है। चुभन इस बात का कि उनके पार्टी के पूर्व अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण को रिश्वत लेने के मामले में दोषी करार देते हुए अदालत ने चार साल की सश्रम कारावास की सजा और एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। सजा सुनाते हुए अदालत ने कहा कि समाज में सब चलता है के रवैया को बदलना होगा। भारतीय राजनीति के इतिहास में यह पहला मामला है, जिसमें किसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहते रिश्वत लेने का आरोप लगा और आरोप साबित होने के बाद अदालत ने सजा सुनाई है। यह और बात है कि सीबीआई अदालत के आदेश को चुनौती देने की बात कही जा रही है। लेकिन जो हकीक़त सामने आया है और साबित हुआ है उसे भारतीय जनता पार्टी इनकार भी नहीं कर सकती।

पार्टी विद ए डिफरेंस का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी का दावा अब पार्टी को चुभन दे रहा है। चुभन इस बात का कि उनके पार्टी के पूर्व अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण को रिश्वत लेने के मामले में दोषी करार देते हुए अदालत ने चार साल की सश्रम कारावास की सजा और एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। सजा सुनाते हुए अदालत ने कहा कि समाज में सब चलता है के रवैया को बदलना होगा। भारतीय राजनीति के इतिहास में यह पहला मामला है, जिसमें किसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर रहते रिश्वत लेने का आरोप लगा और आरोप साबित होने के बाद अदालत ने सजा सुनाई है। यह और बात है कि सीबीआई अदालत के आदेश को चुनौती देने की बात कही जा रही है। लेकिन जो हकीक़त सामने आया है और साबित हुआ है उसे भारतीय जनता पार्टी इनकार भी नहीं कर सकती।

कौन हैं बंगारु लक्ष्मण : आंध्रप्रदेश के बंगारु लक्ष्मण कभी भी आम-जनता के वोट से चुनकर नहीं आए। तकदीर के धनी बंगारु लक्ष्मण को जो भी पद मिला वह परिस्थितियों की देन रही। पहली बार 1996 में राज्यसभा के लिए चुने गए। 1999 में लोकसभा चुनाव के बाद जब चन्द्र बाबू नायडू ने वाजपेयी की सरकार को समर्थन देने से इनकार किया तब पार्टी नें राज्य में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए बंगारु लक्ष्मण को रेल राज्य मंत्री बना कर राजनैतिक मंशा साधने का प्रयास किया। वहीं उत्तर प्रदेश के चुनाव में दलित वोट बैंक को ध्यान में रख कर पार्टी ने बंगारु लक्ष्मण को राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से नवाज़ा, लेकिन बंगारु लक्ष्मण का तकदीर साथ छोड़ दिया तो रिश्वत लेते हुए सारी दुनिया ने देखा जिससे पार्टी का दांव उल्टा पड़ गया और बंगारु लक्ष्मण पार्टी के लिए किरकिरी बन कर रह गए। आपातकाल के दौरान जेल में रहे बंगारु लक्ष्मण ने कभी सोचा भी न होगा कि कभी उन्हें भ्रष्टाचार के मामले में भी जेल में रहना होगा।

अदालत का फैसला आते ही पार्टी बचाव की मुद्रा में आ गई : जहां बोफ़ोर्स मामले में बीजेपी संसद में हल्ला मचा रही थी शांत हो कर बचाव में जुट गई है। हां, कुछ बीजेपी नेता टीवी पर यह बयान जरुर देते नजर आए कि बड़े-बड़े घोटाला करने वाले बच गए और बंगारु को यूपीए कि सरकार ने बचा लिया। शहनवाज़ हुसैन ने तो यहां तक कह दिया कि कांग्रेस एक लाख के घोटाले पर हल्ला मचा रही है जबकि करोड़ों का घोटाला करने वाले मंत्री पर मौन है। लेकिन क्या पर्दा डालने से सच झूठ हो जाएगा या लाख रुपए का घोटाला करने वाले कि तुलना करोड़ वाले से करने पर अपराध कम हो जाएगा? बंगारु लक्ष्मण नें रिश्वत तब ली थी जब वह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर थे। तो क्या पार्टी विद ए डिफरेंस कहलाने वाले पार्टी के नेता यह कहना चाहते हैं कि हम लाखों का घोटाला करते हैं इसलिए डिफरेंस हैं।

ज्ञात हो की इस मामले का खुलासा तहलका नें एक स्टिंग आपरेशन कर किया था, जिसमें बंगारू लक्ष्मण ने तहलका टीम से हथियारों का सौदा करवाने के लिए एक लाख रुपए की रिश्वत लेते हुए कहा था कि वह रक्षा मंत्रालय को कंपनी से सौदा करने की सिफारिश करेंगे। भारतीय जनता पार्टी की मौजूदा हालत यह है कि तमाम मुद्दे होने के बावजूद भी सरकार को घेर पाने में असफल है। और यह कमजोर विपक्ष होने का सबूत भी है। बीजेपी अपने दावों, कथनी और करनी में कभी सामंजस्य नहीं बना पाई, कारण जब अपना सिक्का ही खोटा है तो दूसरे को दोष क्या दें? जब जब पार्टी कोई मुद्दा उठाती है तब तब उनके ही पार्टी के नेताओं की करतूत सामने आ जाती है। कभी यदुरप्पा बन कर तो कभी बाबू कुशवाहा बन कर तो कभी बंगारु बन के। ऐसे हालत में पार्टी विपक्ष की भूमिका निभाने के बजाए अपने साफ सुथरी छवि पर लगे दाग़ को साफ करने में लग जाती है। अदालत का यह फैसला यकीनन भारतीय राजनीति में अहम है और इस फैसले से आम जनता में उम्मीद भी जागी है, कि अब भ्रष्टाचार का घड़ा भर गया है, अब अंकुश लगने का समय आ गया है। लेकिन देश के राजनेता कहीं इस अदालती फरमान का भी राजनीतिकरण न कर ले बस डर इसी बात का है। बेहतर तो होता आरोप प्रत्यारोप को छोड़कर राजनेता इस बात पर ध्यान दें कि राजनीति में बढ़ते भ्रष्टाचार पर कैसे अंकुश लगे, क्योंकि भ्रष्टाचार न तो राजनीति, न जनता के और न देश हित में है। जब भ्रष्टाचार खत्म होगा तभी बेहतर राजनीति की शुरुआत हो सकती है और तब विपक्ष सशक्त होगा सरकार विकास कार्य करेगी और जनता भी खुशहाल होकर मलहार गा सकेगी।

लेखक अब्‍दुल रशीद सिंगरौली में पत्रकार हैं.

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