दस जनपथ से उत्तराखंड के मुंह पर मीठे शहद का लालच देकर टपकाए गए विजय बहुगुणा कब अपनी जुबान बंद रखना सीखेंगे पता नहीं। वैसे भी भ्रष्टाचार के साथ-साथ अन्ना और रामदेव के वारों से खिसियाई कांग्रेस के छोटे तो क्या बड़े नेता भी इस कदर खीझे हुए हैं कि उन्हें पता ही नहीं चल पा रहा कि वे बोल क्या रहे हैं और किसके सामने बोल रहे हैं। जब आका ही अपना मानसिक संतुलन खो गए लगते हों तो फिर बहुगुणा जैसे सिरचढ़े चारणभाटों से कोई उम्मीद की भी कैसे जा सकती है। विजय बहुगुणा को हेमवती नंदन बहुगुणा के पुत्र के रूप में कम, उनके अतीत के काले कारनामों के लिए अधिक जाना जाता है। वर्तमान में उनकी पहचान ये है कि वे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को पलीता लगाने वाली रीता बहुगुणा जोशी के भाई और कांग्रेस के चमचे हैं। इसके बाद यदि कहने को कुछ न बचे तो कह सकते हैं कि वे उत्तरखंड के मुख्यमंत्री हैं। मुखियाई संभालते ही उन्होंने दस जनपथ से मिल रहे आदेशों का किसी ‘अच्छे बच्चे’ की तरह तुरंत पालन करना शुरु कर दिया।
उत्तर प्रदेश के सामने उत्तराखंड को भिखारी के रूप में प्रस्तुत करने के अपने शुरुआती बयान को लेकर तो उनकी खूब जग हंसाई हुई ही, अब नागपुर में दिए गए अपने ताजा बयान को लेकर वे चर्चाओं में हैं। नागपुर में जनाब ने कहा कि वे बहुगुणा हैं ही नहीं, उनके पूर्वज बंगाल के बनर्जी हैं। इस बयान को लेकर पोपट खबरनवीसों ने ये अर्थ लगाने तो शुरु कर दिए हैं कि वे राज्य के किसी बंगाली बहुल क्षेत्र से उपचुनाव लड़ सकते हैं लेकिन किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि बहुगुणा का यह बयान देश में गढ़वालियों की कोई अच्छी तस्वीर पेश नहीं करने जा रहा है। सभी जानते हैं कि मूलतः अधिकांश पहाड़ी बाहरी राज्य से आए हुए हैं और इसे किसी अपमान की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए। लेकिन बहुगुणा जिस अंदाज में बार-बार खुद के बहुगुणा न होने की सफाई पेश कर रहे हैं उससे तो ऐसा लगता है कि जनाब को पहाड़ी पहचान से ही नफरत है। ऐसे में कोई इस नए मुखिया से प्रदेश की बेहतरी की उम्मीद करे भी तो कैसे। इससे पहले उन्हें यह भी मनन करना होगा कि जिस हेमवती नंदन को गढ़वाल का चंदन कहा जाता है, विजय उन्हीं के पुत्र हैं।
लेखक मनु मनस्वी पत्रकारिता से जुड़े हैं।


