झारखण्ड राज्य सभा चुनाव के परिणाम आने के बाद समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनल पर जो खबर आया वो बिलकुल ही प्रेस रिलीज़ जैसा आया. झारखण्ड राज्य सभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार की हार की खबर को प्रेस रिलीज़ के रूप में लेना आम लोगों को समझ में नहीं आया. झारखण्ड राज्य सभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के साथ जो विश्वासघात हुआ, उस सन्दर्भ में खबरनवीसों को ध्यान देना चाहिय था. भाजपा गठबंधन के पास 45 विधायकों का आंकड़ा सुरक्षित था, उन्हें सिर्फ 1 विधायक का जुगाड़ करना था. पार्टी सरकार चला रही है और अभी झारखण्ड विधान सभा के दो सदस्य जेल की हवा खा रहे हैं और जेल में बंद मधु कोड़ा की वाइफ गीता कौड़ा भी विधायक है. इस स्थिति में इन तीन विधायकों का सपोर्ट सरकारी पार्टी को जरुर मिल जाता. राजनीतिक गलियारे में जो चर्चा चल रही है उसके अनुसार उक्त तीनों विधायक सरकारी पार्टी का साथ देने को तैयार थे.
वोट देने से पहले इन लोगों ने मुख्यमंत्री अर्जुन मुण्डा से संपर्क भी किया था, परन्तु इनके वोट पार्टी उम्मीदवार को दिलाने की बजाय मुख्यमंत्री अर्जुन मुण्डा ने कांग्रेस उम्मीदवार को वोट दिला कर अपनी ही पार्टी के उम्मीदवार को चुनाव में धूल चटा दिया. इसके पीछे जो कहानी बताई जा रही है वो पार्टी के लिए बहुत ही बुरी है. राज्य सभा चुनाव में अर्जुन मुण्डा के पसंद का व्यक्ति उम्मीदवार नहीं था. एसएस अहलूवालिया भाजपा नेता यशवंत सिन्हा के पसन्द के उम्मीदवार थे, इसिलिय उन्हें हराने के लिए सरकार अपनी पूरी ताकत लगा दिया था. 2 मई की रात एसएस अहलूवालिया स्वयं अर्जुन मुण्डा से बातचीत किये थे. उस समय अर्जुन मुण्डा ने उन्हें जीत का पूरा भरोसा दिलाये थे. एक तरह से यह भरोसा उन्हें धोखा देने के लिए दिया गया था. इस भरोसे में रहकर वो अपने अन्य राजनीतिक संपर्कों का सहारा भी नहीं लिए, जिसका नतीजा उन्हें राज्य सभा चुनाव में करारी हार के रूप में मिला. कांग्रेस इस चुनाव में कहीं भी जीत के नजदीक नहीं थी, परन्तु सत्ताधारी पार्टी के मुख्यमंत्री ने कांग्रेस को तोहफे में राज्यसभा की एक सीट दे दिया. कांग्रेस के पास अपना 13 वोट था और राजद के 5 सदस्यों का वोट उन्हें मिलना निश्चित था, परन्तु कांग्रेस ने चुनाव में और 7 वोट का जुगाड़ सरकार के सहयोग से करने में सफल रही.


