अमूमन ये मान लिया जाता है कि- जो दिखता है वो बिकता है। इसी बिना पर मीडिया हाउस में एंकर्स लेने का खेल चालू आहे। ये अलग बात है कि चैनल्स की टी.आर.पी. बढ़ाने में इन एंकर्स का रोल ना के बराबर है। चैनल्स की टी.आर.पी. न्यूज़ नाम की बखिया उधेड़ देने वाले चैनल्स की ज़्यादा है (सभी अंगरेजी चैनल्स, एन.डी.टी.वी. इंडिया और जी न्यूज़ जैसे खालिस उम्दा समाचार चैनल्स टी.आर.पी. पायदान पर नीचे खड़े होकर बार-बार इसकी गवाही देते हैं)। इसके बावजूद “दिखने वाले चेहरे ज़्यादा कीमत वाले हैं” ऐसा भ्रम चैनल्स में बना हुआ है और न्यूज़ चैनल्स खात्मे की ओर बढ़ रहे हैं। यकीनन ऐसा भ्रम की वज़ह से हो रहा है। स्क्रिप्ट लिखने की कला (जो किसी भी समाचार संस्थान की जान होती है) और इसे पेश करने का हुनर गर्त में है।
देखा जाए तो हर विषय (मसलन -राजनीति, सोशल स्टोरी, बिसनेस, स्पोर्ट्स, मनोरंजन, कोर्ट इत्यादि) का एंकर अलग-अलग होना चाहिए। क्योंकि हर पत्रकार के पास अपना एक अलग हुनर होता है- किसी क्षेत्र विशेष में। और यही वज़ह है कि हर बीट के लिए अलग-अलग विशेषज्ञ पत्रकार रखे जाते हैं और अपनी-अपनी क्षमता के मुताबिक खबर लाते हैं या ब्रेक करते हैं। यही बात एंकर्स पर भी लागू होनी चाहिए (एन.डी.टी.वी. इस बात पर कोशिश करता दिखाई देता है)। हालांकि ये बेहद मुश्किल काम है। पर ज़्यादातर चैनल्स के एंकर्स “राज्यसभाई” फ़ॉर्मूला पर नियुक्त होते हैं। जिस तरह राज्य सभा में “जुगाड़” के बल पर बिना चुनाव लड़े व्यक्ति सांसद और फिर पार्टी प्रवक्ता बन जाता है, उसी तर्ज़ पर चैनल्स में भी बिना ज़मीनी पत्रकारिता किये एंकर्स बनने और बनाने का खेल धड़ल्ले से चल रहा है। पर कुछ ऐसे एंकर्स हैं, जो ज़मीनी पत्रकारिता की विरासत के साथ ही सामने आये और बतौर एंकर्स अपनी अहमियत को सिद्ध किये। ये वो एंकर्स हैं, जो दिल्ली-मुंबई के बाहर का भी हिन्दुस्तान (निजी तौर पर) बखूबी जानते हैं। ये एंकर्स पत्रकारिता का मर्म समझते हैं और बिना अनुभव के सीधा एंकर्स बनने में इनकी दिलचस्पी नहीं दिखी।
ये एंकर्स बड़े स्मार्ट और हैंडसम नहीं हैं और ना “सिर्फ दिखने भर” की ललक रखते हैं। ये एंकर्स सत्ता की बदज़ुबानी पर तल्खियत दिखाते हैं और काबिलियत की पीठ भी ठोंकते हैं। ये टी.पी. (टेली-प्रोम्प्टर) पर निर्भर रहने वाली बेचारे नहीं हैं और ना ही बॉस के रहमो-करम पर एंकर्स बने होते हैं। टेली-प्रोम्प्टर की गैर-मौजूदगी इनकी पोल-पट्टी खोलने की ताक़त नहीं रखती। इनकी उम्र भी “राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल्स” के एंकर होने का दावा पुख्ता करती है। १२० करोड़ की आबादी वाले हिन्दुस्तान की नब्ज़ ये टटोले रहते हैं। फैशन परेड के मॉडल्स सरीखा दिखने का इनका अंदाज़ नहीं होता। वक़्त की नज़ाक़त और शब्दों की ज़रुरत को ये बखूबी समझते हैं। टेली-प्रोम्प्टर बिगड़ जाने की स्थिति में ये चुप्पी नहीं साधते और ना ही लड़खड़ा कर न्यूज़ की दशा-दिशा बिगाड़ देते हैं। ये पत्रकारिता की डिग्री के कागज़ को दिखा कर पत्रकार नहीं बने और ना ही डिग्री की बाध्यता इनके आड़े आयी। ये कागजों की डिग्री की बजाय ज़मीन सूंघने के हिमायती दिखते हैं । ये वो हैं जिन्होंने अपना नाम, अपने काम से बनाया है, एंकर बनकर नहीं।
खालिस पत्रकारिता ही इनका एक-मात्र हुनर है। एंकरिंग उसका एक छोटा सा हिस्सा भर। इनके पास लंबा अनुभव, उम्र का अपना तज़ुर्बा, शब्दों का भण्डार और हर समाचार को उसके मर्म और गहराई के मुताबिक समझने की काबिलियत। इसके अलावा ये कहना भी मुनासिब होगा कि किसी भी पद पर बैठे इंसान से गलती होती है, पर बिना योग्यता और अनुभव के योग्य पद पर बैठे इंसान को योग्य बताने का प्रोपेगंडा बंद होना चाहिए। “जुगाड़ के बल पर” और “बिना ज़मीन सूंघे” एंकर बनकर आसमान में उड़ने देने का लाइसेंस बांटने पर सख्ती से विचार होना चाहिए। खैर! टी.वी. पत्रकारिता के लम्बे अनुभवों के बाद मैं १० बेहतरीन एंकर्स (रिपोर्टिंग या आउटपुट या दूसरी तरह के पत्रकारों का नाम अलग से रखा हूँ, लिस्ट आनी बाकी है) को चुन पाया। ये एंकर्स उम्रदराज़ तो हैं ही, साथ में ज़मीनी पत्रकारिता की विरासत भी रखते हैं। अलावा इसके शब्दों की बाजीगरी और समाचारों की गहराई और मर्म पकड़ने की इनकी कूबत इन्हें इसके काबिल बनाती है।
टेली-प्रोम्प्टर की “बेहद ज़रुरत” से ये इत्तेफाक नहीं रखते। इनका बायोडाटा बताता है कि- ये दिल्ली-मुंबई के बाहर का हिन्दुस्तान भी निजी तौर पर जानते हैं (जिसके लिए उम्र खपाना ज़रूरी है)। ये वो लोग हैं, जो निजी जीवन में एक बेहतरीन, मिलनसार या सहयोगी इंसान भले ही ना हो (मैं भी इस बात से इत्तेफाक रखता हूँ) पर अपने पेशे में लाजवाब हैं। कई कुतर्क, इस लिस्ट को देखने के बाद आ सकते हैं, पर “निंदक नियरे राखिये” वाला हौसला अपुन का भी है– आप भी पढ़िए बेहतरीन १० नामों को — किस्मत इनकी ज़रूर आला कही जा सकती है। क्योंकि देश में कई ऐसे लोग हैं जो मौके के अभाव में दरकिनार या उपेक्षित हैं और गर उन्हें मौका मिला तो नीचे दी गयी सूची में शामिल होने का माद्दा रखते हैं।
1) विनोद दुआ (एन.डी.टी.वी. इंडिया )
2) देबांग (सीनियर टी वी एंकर )
3) प्रणब रॉय (एन.डी.टी.वी.)
4) राजदीप सरदेसाई (सी.एन.एन.-आई-बी.एन.)
5) संदीप चौधरी (आई.बी.एन.७ )
6) पुण्य प्रसून वाजपेयी (जी न्यूज़)
7) निधी कुलपती (एन.डी.टी.वी. इंडिया)
8) अर्नब गोस्वामी (टाइम्स नाउ)
9) अजय कुमार (आज तक)
10) आशुतोष (आई.बी.एन.७)
लेखक नीरज टीवी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


