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जरा सोचिए! डंके की चोट पर अपना मर्म तलाशता टीवी पत्रकारिता

पिछले कुछ सालों से पत्रकारिता के मायने बदलने लगे हैं। पत्रकारों की खाल पहने बनिया हर तरफ फैलते जा रहे हैं। पुराने खालिस पत्रकार लाचार हैं और “पापी-पेट” की खातिर बहुतेरे उनमें से बनियागिरी के ग्रेजुएट कोर्स कर रहे हैं। नए-नवेलों को धड़ल्ले से मीडिया इंस्टीट्यूट १-१ साल का पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा बाँट रहे हैं और उसकी खनखनाहट से वे नौकरी मांग रहे हैं। बायो-डाटा में “बड़े” कहे जाने वाले चैनल्स का टैग लगा हो तो शर्तिया सैलरी भी अच्छी मिल जा रही है। काम की जगह नाम का बोल-बाला है। किसी को भी दूर-दराज़ के इलाके में भेजकर, इस मुल्क़ की तासीर समझने का मौक़ा नहीं दिया जा रहा। जिसके पास “जुगाड़” है, वो आते ही एंकर बन जा रहा है। उस से ये भी नहीं पूछा जा रहा है कि- “भाई, कितनी ज़मीनी पत्रकारिता किये हो और नेशनल न्यूज़ का एंकर किस हक और अनुभव से बनना चाहते हो?”

पिछले कुछ सालों से पत्रकारिता के मायने बदलने लगे हैं। पत्रकारों की खाल पहने बनिया हर तरफ फैलते जा रहे हैं। पुराने खालिस पत्रकार लाचार हैं और “पापी-पेट” की खातिर बहुतेरे उनमें से बनियागिरी के ग्रेजुएट कोर्स कर रहे हैं। नए-नवेलों को धड़ल्ले से मीडिया इंस्टीट्यूट १-१ साल का पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा बाँट रहे हैं और उसकी खनखनाहट से वे नौकरी मांग रहे हैं। बायो-डाटा में “बड़े” कहे जाने वाले चैनल्स का टैग लगा हो तो शर्तिया सैलरी भी अच्छी मिल जा रही है। काम की जगह नाम का बोल-बाला है। किसी को भी दूर-दराज़ के इलाके में भेजकर, इस मुल्क़ की तासीर समझने का मौक़ा नहीं दिया जा रहा। जिसके पास “जुगाड़” है, वो आते ही एंकर बन जा रहा है। उस से ये भी नहीं पूछा जा रहा है कि- “भाई, कितनी ज़मीनी पत्रकारिता किये हो और नेशनल न्यूज़ का एंकर किस हक और अनुभव से बनना चाहते हो?”

उस से ये पूछने का वक़्त भी किसी के पास नहीं है कि – “दिल्ली-मुंबई से इतर, गाँव-कस्बों या छोटे शहरों में बसने वाले हिन्दुस्तान के किसी भी हिस्से में रिपोर्टिंग किये हो क्या?” बायो-डाटा में न्यूज़ चैनल्स का टैग देखा जा रहा है। स्क्रिप्ट (जो कि किसी भी समाचार संस्थान की जान होती है) लिखवा कर उसकी गहराई आंकने का जोखिम कोई नहीं ले रहा। जहां तक तकनीकी ज्ञान का सवाल है, वो तो बड़े से बड़े पत्रकार को भी सीखनी पड़ती है। इस युग में-तो-ये बात और भी पुख्ता है, जब तकनीकी पहलू हर रोज़ बदल रहे हैं। इतना-भर ही नहीं बल्कि जिसके पास 10 साल से भी कम का अनुभव है (जो राष्ट्रीय समाचार चैनल्स के लिए ज़रूरी होना चाहिए), वो एंकर बन कर लाखों कमा चुका है। तज़ुर्बे के नाम पर दिल्ली के गलियारों तक वो सीमित रह रहा है और एक पड़ोसी चैनल से दूसरे का रास्ता तय कर रहा है और अपनी तनख्वाह बढ़वा रहा है। सम्पादक इस बात से पूरी तरह जानबूझकर बे-खबर हैं- कि- १२० करोड़ के मुल्क में शानदार लेखन और प्रस्तुतीकरण करना वाले बे-हिसाब हैं, वो कहाँ हैं?

ज़ाहिर है, खोजने का “सरदर्द” कोई लेना नहीं चाहता। आते ही पूछा जाता है कि – “पिछली नौकरी में कितनी तनख्वाह पाते थे?” यानी गर कोई “जुगाड़” से कहीं घुस गया और ज़्यादा तनख्वाह पाने लगा तो वो काबिल और ज़्यादा तनख्वाह का हक़दार। राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल्स के मापदंडों के लिहाज़ से (प्रवेश के लिए) जो तज़ुर्बा और उम्र होनी चाहिए, उसका कहीं ज़िक्र तक नहीं किया जाता। डिग्री की बजाय ज़मीन को सूंघने का माद्दा रखने वालों को प्रोत्साहित नहीं किया जाता। बड़े चैनल्स का टैग लगाए नौसिखियों से ये भी पूछने की ज़हमत नहीं उठायी जाती कि – “काम की बजाय, नाम का लाभ आप को क्यों मिले?” छोटे शहर, ग्रुप या चैनल्स में काम किये अनुभवी और खालिस पत्रकारिता को अंजाम तक पहुंचाने की कूबत रखने वालों को दरकिनार करने का अफ़सोस, “माननीय संपादकों” को कभी नहीं होता। एंकर के अनुभवी और कम खूबसूरत होने का गुण, संपादकों को रास नहीं आता। खूबसूरती और कागज़ की डिग्री उन्हें रिझा देती है। दिल्ली-मुंबई के अलावा, मुल्क के बाकी हिस्सों की दिशा और दशा से जुड़े सवाल (इंटरव्यू के वक़्त), शायद ही कभी संपादकों के पैमाने में फिट बैठे हों। “छोटे शहर या चैनल्स का अनुभवी पत्रकार कम सैलरी- बड़े चैनल का “बेखबर नौसिखिया” ज़्यादा सैलरी”- ये चैनल्स की पत्रकारिता और पत्रकार को समझने वाले संपादकों का मूल मंत्र है।

न्यूज़ चैनल्स की दुनिया में विनोद दुआ, पुण्य प्रसून, आशुतोष, प्रबल प्रताप, राजदीप, कमाल खान, रवीश कुमार, निखिल वागले जैसे तकरीबन ३०-४० नामों को गर छोड़ दिया जाए तो–ज़्यादातर पत्रकारों के बायो-डाटा में दिल्ली-मुंबई के बाहर का ज़िक्र तक नहीं दिखेगा। ना ही मुल्क के दूसरे हिस्सों को (बतौर पत्रकार) जानने का दावा, पर उन में से कई तो पुरस्कार भी पा चुके हैं। पत्रकारिता का एक मर्म होता है, जो डिग्री और “बड़े चैनल्स का टैग” से कहीं ज़्यादा गहरा होता है। अचानक कहीं आग लगी हो या बेहद विकट परिस्थिति हो, ऐसे वक़्त में न किताबी ज्ञान याद आता है और ना ही कागजों की डिग्री (जिसकी धौंस दी जाती है)। ऐसे वक़्त में सिर्फ और सिर्फ तज़ुर्बा और अपना निजी ज्ञान काम आता है। इस वक़्त रिपोर्टर गर अपने “बड़े चैनल्स का टैग” या किताब का पन्ना पलट कर ये देखेगा कि – ऐसे वक़्त क्या और किस तरह रिपोर्टिंग करनी चाहिए तो यकीन मानिए इस से बड़ा मज़ाक कोई और नहीं हो सकता।

कहते हैं कि पत्रकार स्कूलों और कॉलेजों में पैदा नहीं होते, पैदाइशी होते हैं। तकनीकी ज्ञान के लिए स्कूलों और कॉलेजों का सहारा उचित माना जा सकता है। पत्रकारिता का मर्म, जुनून और खोज और प्रस्तुति पर आधारित होता है न कि “जुगाड़” और “बड़े चैनल्स का टैग” लगाकर खोजा जाता है। अवसर बहुत बड़ी चीज़ होती है। आज ये अवसर का ही कमाल है कि कई लोग (बिना ज़मीन पर रहे) आसमान की सैर कर रहे हैं और कई ज़मीन पर खड़े होकर आसमाँ की तरफ देख रहे हैं। काश! आज टी.वी. संपादकों का ही ये कमाल है कि सम्पादक अपने चैनल्स को खड़ा या इसका विस्तार इसी बिना पर कर रहे हैं और पत्रकारिता अपना मर्म तलाश रही है। लोगों के बीच नहीं – अकेले में। “सबसे तेज़” भागने और अपने-“आपको आगे रखने” का तुक्का छोड़कर, “डंके की चोट” पर बने संपादकों के “जज्बा सोच का” बना कर ज़रा सोचिये। पत्रकारिता के मर्म को तालाशिये।

लेखक नीरज टीवी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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