हमारे सेना प्रमुख जनरल विजय कुमार सिंह 31 मई के बाद क्या करेंगे। वे वह सब करने के लिए स्वतंत्र हैं, जो प्राय: सभी सेनापति सेवा-निवृत्त होने के बाद करते हैं। यह डरी हुई सरकार उन्हें राज्यपाल, उप-राष्ट्रपति और राजदूत-जैसे निरापद पद भी प्रदान कर सकती है ताकि उनके मुख से ट्रेट्रा ट्रक की तरह कई नई तोपें, हेलिकॉप्टर और पनडुब्बियॉं न निकल पड़ें। सेवानिवृत्ति के बाद ऐसा खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यह तो जनरल सिंह को तय करना है कि वे अपना भावी जीवन कैसे बिताना चाहते हैं। जनरल सिंह यह न भूलें कि उन्होंने इतिहास बना दिया है। आज तक भारत में कोई भी सेनापति ऐसा नहीं हुआ है, जिसने फौज में चल रहे भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ किया हो।
ऐसा नहीं है कि अन्य सभी जनरलों को इस भ्रष्टाचार का पता न रहा हो लेकिन उसे खुले-आम बता देने की हिम्मत सिर्फ जनरल सिंह ने ही दिखाई। यह हिम्मत बेजोड़ है। दुश्मन के मुकाबले की बहादुरी तो हमारे कई महान जनरलों और जवानों ने दिखाई है लेकिन राष्ट्र के स्थायी और सबसे खतरनाक दुश्मन भ्रष्टाचार के विरूद्घ क्या किसी ने आज तक मुंह खोला है? यही वजह हैं कि रिटायर होने के बाद जनरल सिंह को अपने मुंह पर पट्टी बांधकर नहीं बैठ जाना चाहिए। यदि वे ऐसा करेंगे तो बहुत बुरा होगा। यह माना जाएगा कि उन्होंने जो पर्दाफाश किया है, वह चिढ़कर किया है। अपनी जन्म-तिथि के विवाद से चिढ़कर! उन्हें लगातार बोलते रहना चाहिए। देश के कोने-कोन में घूमना चाहिए।
अभी तक भ्रष्टाचार का विरोध बहुत सीमित हुआ है। सिर्फ अनशन और जनसभाएं! सिर्फ काला धन और जन-लोकपाल को मुद्दा बनाया गया है। यह नेतृत्वविहीन सरकार इन बाल-प्रहारों से ही घबरा गई है। यदि जनरल सिंह बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के साथ मिल जाएं तो भ्रष्टाचार-विरोधी इस आंदोलन को देश के घर-घर में पहुंचाया जा सकता है। उसके अनेक नए और गंभीर आयाम खोले जा सकते हैं। वह सार्वजनीन और सर्वदलीय बनाया जा सकता है। वह सरकार नहीं, व्यवस्था-परिवर्तन का कारण बन सकता है। यक्ष प्रश्न यही है कि जनरल विजय कुमार सिंह मैदान में उतरेंगे कि नहीं?
लेखक डा. वेद प्रताप वैदिक पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


