हाल ही में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने मीडिया को फिर निशाने पर लेते हुए कहा कि वह अंधविश्वास और रूढि़वादिता को बढ़ावा देकर सामाजिक और आर्थिक मुद्दों से लोगों का ध्यान हटा रहा है। गौरतलब है कि जस्टिस काटजू ने मीडिया पर आरोप लगाया है कि मीडिया सनसनी फैलाने की कोशिश में तथ्यों को तोड़–मरोड़ कर पेश करती है। ताकि मीडिया घराने दर्शकों की संख्या में इजाफे करने के साथ-साथ ज्यादा कमाई कर सकें। इस बारे में कोई शक नहीं कि भारत में ज्यादातर मीडिया उद्योगपतियों के नियंत्रण में है, जिसे उन्होंने धन कमाने के लिए स्थापित किया है। कमाई करना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन सामाजिक जिम्मेदारियों को दरकिनार करके ऐसा करना सही नहीं है। काटजू का मानना है कि भारत में हालिया प्रवृत्ति दर्शाती है कि मीडिया प्रतिक्रियात्मक भूमिका निभा रहा है, जबकि इसके बदले उसे वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना चाहिए। खैर, इससे पहले भी काटजू ने भारतीय मीडिया को गलत करार दिया था। और तो और उन्होंने भारतीय मीडिया को आईना देखने को भी सलाह दे डाली है। इससे पूरे मीडिया में आक्रोश की स्थिति पैदा हो गई थी।
काटजू का मानना है कि टेलीविजन न्यूज चैनल में महत्वहीन खबरों को टीआरपी के लिए ज्यादा प्रमुखता दी जाती है, जिससे असली मुद्दे उपेक्षित रह जाता है। हालांकि काटजू ने माना कि मीडिया में अच्छी खबरें भी आती हैं। लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि जनता से जुड़ी खबरें 5 या 10 फीसदी से अधिक जगहें नहीं घेरती। जबकि ठीक इसके विपरीत अधिकांश स्थानों पर तो फिल्मी सितारों की जिदंगी, पॉप–संगीत, फैशन परेड, क्रिकेट और ज्योतिष को प्रमुखता होती है। उनका कहना है कि टीवी मीडिया इन विषयों पर ज्यादा फोकस रखकर बुनियादी सवाल से जनता का ध्यान हटा रहा है। देश की समस्या गरीबी, महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार है, जिन पर मीडिया कम ध्यान देता है। काटजू के इन आरोपों को नकारा नहीं जा सकता है। क्योंकि आम आदमी भी महसूस करने लगा है कि टीवी मीडिया गंभीर पत्रकारिता नहीं कर रहा। जो थोड़ी–बहुत चर्चाएं गंभीर मुद्दों पर की जाती हैं, उनकी प्रस्तुति का तरीका भी सूचनाप्रद कम और मनोरंजन ज्यादा होता है। इसलिए गंभीर लोग टीवी देखना पसंद नही करते। यह अकारण नहीं है कि निजी टीवी चैनलों से गंभीर आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक व सामाजिक बहस लगभग लुप्त हो चुके हैं। समाज से जुड़े सभी जरूरी मसले अब मीडिया की प्राथमिकता सूची में नहीं हैं। मीडिया आज वही दिखा रहा है जो विज्ञापनदाता कंपनियां चाहती हैं। जाहिर है ऐसा इसलिए कि कंपनियों को उसके उत्पाद के खरीदार मिलें।
सचमुच आज समाचारों का प्रस्तुतीकरण एकदम बदल दिया गया है। खबरों को रोचक बनाना, शीर्षक दिलचस्प होना आदि समाचार प्रस्तुति की शर्त बना दी गई है। यूं कहें समाचारों में एक तरह की सनसनी रहती है। यहीं वजह है कि आज टीआरपी के हिसाब से खबरें तय की जाती है। यह कहने में कतई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि जो मीडिया पहले देशी सरोकारों और राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत था, वह अब विदेशी पूंजी के लोभ में सारी मर्यादाएं तोड़ देने को उद्धत है। हांलाकि काटजू इसे ही प्रमुखता बनाकर प्रेस पर पाबंदी की पैरोकार हैं। वे प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर यह सुझाव दे चुके है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को प्रेस परिषद के दायरे में लाया जाना चाहिए और परिषद को और अधिक शक्तियां दी जानी चाहिए। जबकि एडिटर गिल्ड का कहना है कि वे इस तरह के किसी भी प्रतिबंध के खिलाफ है।
सचमुच मीडिया की भूमिका को लेकर अक्कर सवाल उठते रहे हैं। जाने–माने पत्रकार पी. साईनाथ ने एक बार राजेंद्र माथुर व्याख्यान देते हुए दिल्ली में बताया था कि जब मुबंई में (वर्ष 2007) लैक्मे फैशन वीक में कपास से बनी सूती कपड़ों का प्रदर्शन किया जा रहा था, लगभग उसी दौरान विदर्भ में किसान कपास की वजह से आत्महत्या कर रहे थे। इन दोनों घटनाओं की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि फैशन वीक को कवर करने के लिए जहॉ कुल 512 मान्यता प्राप्त पत्रकार पूरे हफ्ते मुंबई में डटे रहे। वहीं विदर्भ में किसानों की आत्महत्या को कवर करने के लिए, बमुश्किल 6 पत्रकार ही पूरे देश से पहुंच पाए। समझा जा सकता है कि देश में सबसे ज्यादा संकट के दौर से गुजर रही कृषि और लाखों की संख्या में आत्महत्या कर चुके किसानों को लेकर मीडिया में कितनी गैर-जिम्मेदारी एवं संवेदनहीनता है। ऐसे में काटजू के बयान बहुत से लोगों को काफी तथ्यपरक लगती है। साथ ही जस्टिस काटजू ने कहा था कि क्या यह फ्रांस की महारानी अन्तोत्वा जैसा नहीं है, जिसने कहा था कि जनता के पास रोटी नहीं है तो वह केक खाये।
मीडिया काटजू के बयान पर चाहे कितना भी आपत्ति जताये। पर काटजू के बातें इतनी हलकी नहीं है। क्योंकि आज हमारे कई समाचार चैनल टीआरपी के लिए समाचार के नाम पर ऊटपटांग चीजें परोस रहे, भूतप्रेत, अपराध-सेक्स, अंधविश्वास, एलियंस और न जाने कितने तरह की ऊटपटांग चीजों को दिखाने वाले उदाहरण गिने जाएं तो एक पूरा पोथा ही लिखना पड़ेगा। संभवत: दुनिया के किसी भी देश के टीवी चैनल ऐसा नहीं करते होंगे। असल में इन चीजों का अपना एक तर्क है – जब दुनिया में गांधी, विवेकानंद ही नहीं थैचर और रीगन जैसे बड़े व्यक्तित्व न हों तो हर चैनल को इन ऊटपटांग चीजों से ही काम चलाना पड़ता है। जबकि इस सिलसिले में केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री बस इतना ही कहा है कि सरकार प्रेस की आजादी पर किसी तरह की रोक लगाने की कोई योजना नहीं है। सरकार मीडिया के लिए स्व–नियंत्रण व्यवस्था चाहती है, ताकि वह अधिक संवेदनशीलता से काम करे और मीडिया ट्रायल तथा व्यक्ति विशेष की निंदा से परहेज करें। पर प्रेस परिषद की भूमिका और भविष्य के बारे में सरकार का मत साफ न होना चिंता का विषय है।
समाचार माध्यमों की भूमिका और विश्वसनीयता का सीधा संबंध उनके सरोकारों और विषयवस्तु से है। इसी कारण समाचार माध्यमों को समाज में प्रतिष्ठा और सम्मान का पात्र समझा जाता है। उम्मीद की जाती रही कि इनके संचालन और सरोकार बाजार की विवशताओं और होड़ तथा उपभोक्ता वर्गों तक पहुंच को लेकर नहीं चलेंगे बल्कि समाज की बेहतर उदेश्यों के प्रति भी जागरूक रहेंगे। लेकिन आज वे समाज के नहीं बल्कि उद्योगों की आवाज बन गए हैं। आज समाचार माध्यमों का प्रचालन नयी परिभाषाओं, नये मूल्यों नयी प्राथमिकताओं से प्रेरित हो रहा है। इसी का परिणाम है कि अब मीडिया की विश्वसनीयता और इसकी भूमिका पर प्रश्न उठने लगे है। दूसरी बात यह है कि मीडिया का भूत, वर्तमान, भविष्य एक ही नींव पर खड़ा है जिसका नाम – विश्वसनीयता। इस विश्वास को जो तोड़ेगा वह केवल अपना ही नहीं पूरे मीडिया का कितना बड़ा नुकसान करेगा, इसका आकलन समय रहते कर लेना
चाहिए।
आज मीडिया आम आदमी की अभिव्यक्ति की आजादी का सहारा लेकर हर तरह के बंधनों को तोड़ने को तैयार है। वह उन मूल्यों और आदशो को भी मानने को तैयार नहीं जिसकी बाह पकड़कर उसने समाज में अपनी विश्वसनीयता बनाई है। ऐसे में काटजू ने जो सवाल उठाए हैं, उनका जवाब केवल बयान से नहीं, बल्कि अपनी कार्य–प्रणाली को पारदर्शी बनाकर देने की कोशिश होनी चाहिए।
लेखक रवि शंकर स्वतंत्र पत्रकार हैं.


