अब मैं राशन कतारों में नज़र आता हूं, अपने खेतों से बिछड़ने की सजा पाता हूं.’ देश के कोने-कोने से अपने खेतों-खलिहानों से बिछड कर महानगर में रोटी तलाशने आये करोड़ों किसान पुत्रों के लिए ‘ठोंगों’ में चावल, आटा और पोहा खरीदते हुए जगजीत के गाये उक्त पंक्तियां बरबस याद आ जाती होंगी. उन्हें यह पता ही नहीं चलता कि कब 8 रुपये किलो बिकने वाला उनका धान बोरे से घट कर पोहे के रूप में पॉली पैक में 80 रुपये किलो होकर बंद हो गया है. खेत से खलिहान और फिर वहां से बोरे में भर कर आने के बाद उपभोक्ता तक ठोंगों में बंद होते हुए खाद्यान्न किस तरह की दूरी तय करता है यह जानना महत्वपूर्ण है. बहरहाल.
बाज़ार का सिद्धांत है मुनाफाखोरी. यहां हर कुछ मांग और आपूर्ति पर तय होता है. बाज़ार की सबसे बड़ी विकृति यही है कि वह अपने कब्ज़े में आये उत्पाद का दाम बढाने के लिए जमाखोरी कर कृत्तिम तौर पर मांग पैदा करता है और माटी के मोल खरीदे गए उत्पादों को कई गुनी कीमत पर बेच मुनाफाखोरी कमाता है. जबकि इसके उलट एक कल्याणकारी राज्य का दायित्व यह होता है कि वह उत्पादकों-किसानों के लिए एक न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी दे ताकि अन्नदाता सुरक्षित रहें, बाज़ार के दानवों द्वारा उन्हें निगलने से बचाया जाय.
दुखद यह है कि किसानों के हित की रक्षा में बुरी तरह असफल सरकारों के लिए कोढ़ में खाज की तरह ही साबित हो रहा है हाल का प्रकरण जब केवल बोरों की किल्लत के चलते मध्य प्रदेश में किसानों को अपनी उपज का मूल्य मिलना मुश्किल सा नजर आ रहा है. जी तोड़ मेहनत कर गेहूं का बंपर उत्पादन करने वाले प्रदेश के किसानों के लिए केन्द्र द्वारा बोरों की आपूर्ति न करना कुछ-कुछ ऐसा ही है जैसे आप भूख से तड़प रहे हों, खाना तैयार भी हो लेकिन थाली उपलब्ध नहीं रहने के कारण उसे परोसा नहीं जा पा रहा हो. सरकारी सूत्रों के अनुसार मध्य प्रदेश के किसानों की यह समस्या केवल अधिक उत्पादन के कारण हुई है. अगर यह सही भी है तो भी शर्मनाक है क्यूंकि मौसम से लेकर हर बात के लिए पूर्वानुमान लगाने तक के लिए भी अरबों खर्च कर विभिन्न एजेंसियों का गठन किया गया है जो सफ़ेद हाथी ही साबित हो रही हैं.
बात केवल मध्य प्रदेश का ही नहीं है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी हाल ही में केन्द्र को पत्र लिख कर बोरों की आपूर्ति करने का आग्रह किया है. वहां भी इसी कारण अनेक केन्द्रों पर गेहूं खरीद केन्द्रों को बंद करना पड़ा है. पंजाब में अनाज सड़ने की शिकायतें आ रही है. वहां सरकारों पर यह आरोप लग रहा है कि वो जान-बूझ कर शराब उत्पादकों को देने के लिए अनाज
सड़ने दे रही है. बिहार में धान के जबरदस्त उत्पादन और राज्य की खरीदी व्यवस्था लचर होने के कारण 8 रुपये किलो धान नहीं बिक पा रहा है. देश के एफसीआई के विभिन्न गोदामों में रखा एक करोड टन से अधिक अनाज अनाज नष्ट होने के कगार पर है. यह सब उस भारत में हो रहा है जहां आंकड़े यह कह रहे हैं कि 23 करोड लोगों को दोनों समय का खाना मयस्सर नहीं है.
तो जहां अन्नदाताओं की ऐसी दुर्दशा हो वहां केवल बोरों की आपूर्ति के कारण किसानों को फसल की कीमत न मिल पाना राष्ट्रीय शर्म का ही विषय होना चाहिए. उल्लेखनीय है कि राज्य की एजेंसियों द्वारा अनाजों के उत्पादन का अनुमान लगा कर केन्द्र से बोरों की ज़रूरत बतायी जाती है. राज्य के इस अनुमानित ज़रूरत पर केद्र की एक मंत्रिमंडलीय उपसमिति इसके अनुसार निर्णय लेकर बोरे उत्पादक संगठनों को आदेश देती है. बोरों का मूल्य राज्य ही वहन करता है. अभी जूट संघ के अनुसार उनकी क्षमता अधिकतम 2.50 लाख बोरे प्रति दिन से अधिक की नहीं है. अब आग लगने पर पर कुआं खोदने की तर्ज पर केन्द्र सरकार उन उत्पादकों पर दबाव बना किसी तरह अपनी किरकिरी रोकने की कोशिश में लगा है जबकि किसान टकटकी लगाए अपने उत्पादों को देख रही है. उन उपजों को जिसके लहलहाने से ही उनके सपने भी लहलहाना शुरू हुए होते हैं. बेटी के हाथ पीले करने से लेकर बच्चों की फीस तक का सामान खुले आसमान के नीचे देख, सड़ने की आशंका से कांपते हुए उनके दिन-रात कैसे गुजर रहे होंगे उसे खेती किसानी से सरोकार रखने वाले लोग ही समझ सकते हैं. कम से कम विश्व बैंक को खुश करने के चिंता में दुबले होते रहने वाले राजनीतिक-नौकरशाह या फिर केवल आंकड़ों को ही ओढ़ते-बिछाते रहने वाले लोग, जीडीपी को ही गांव-गरीब- किसानों की मुस्कराहट समझ लेने वाले अर्थशास्त्री आदि तो यह दर्द बिलकुल नहीं समझ सकते है.
हालांकि बात केवल बोरों के कमी की इस तात्कालिक समस्या का ही नहीं है. सवाल देश के 65 प्रतिशत नागरिकों का है, अन्नदाताओं की सुरक्षा का है. महाराष्ट्र के कपास उत्पादक किसानों की आत्महत्या का है, वहां के प्याज-टमाटर उत्पादक किसानों की मुफलिसी का है. उसी प्याज के महंगे होने के कारण कभी दिल्ली की चली गयी सरकार का है. उत्तर प्रदेश के आलुओं का भी है तो बिहार में सात-आठ रुपये किलो में भी धान नहीं बेच पाने वाली उन माताओं का है जिनके बच्चे (जैसा कि ऊपर कहा गया है ) दिल्ली में उसी धान का पोहा 80 रुपये किलो खरीदने को विवश हैं. सवाल कोर्ट द्वारा बार-बार अनाज को सड़ाने के बदले गरीबों में मुफ्त बांट देने के आदेश का भी है और सवाल कोर्ट के इस आदेश को अपनी सीमा का अतिक्रमण समझ लेने वाले प्रधाममंत्री का है. मोटे तौर पर सवाल सरकारों की नीयत का है.
तो क्या अब मान लिया जाय कि सारी सरकारें देश के इन वास्तविक सरोकारों के प्रति बिलकुल संवेदनहीन हो गयी है और उम्मीद की कोई किरण नहीं बची है? सड़ते हुए अनाज की तरह सरकारी सिस्टम भी सड चुके हैं? वस्तुतः देश के एक गरीब कहे जाने वाले प्रदेश छत्तीसगढ़ सिस्टम इन मामलों में सभी सवालों का जबाब देता नज़र आता है. अनाज सड़ने के एक मामले में तो खुद सुप्रीम कोर्ट तक ने केन्द्र से छत्तीसगढ़ के सिस्टम को अपनाने की सलाह दी है. अन्य राज्यों की तरह इस बार छत्तीसगढ़ में भी धान के बंपर उत्पादन (लगभग नब्बे लाख मीट्रिक टन) का अनुमान लगाया गया था. अनुमान के अनुसार ही उत्पादन हुआ भी. उसमें से प्रदेश सरकार ने करीब 60 लाख टन धान खरीदने का लक्ष्य रखा और उसके लिए 40 रुपये प्रति बोरे की दर से 600 करोड़ की रकम केन्द्र को अग्रिम जमा कर 15 करोड बारदानों (बोरों) की खेप हासिल किया. और 60 लाख टन धान खरीद चौबीस घंटे के अंदर उसका भुगतान कर 50 रुपये बोनस भी बाद में किसानों को प्राप्त हुआ.
छग ने अपने चुस्त-दुरुस्त इंतजामों के कारण न केवल अपने यहां के किसानों को राहत दिया है बल्कि अभी-अभी उसने मध्य प्रदेश को भी 2 लाख बारदानों की आपूर्ति की है. जहां तीन गुने ज्यादा आबादी वाले बिहार में धान खरीदी के लिए केवल 90 संग्रहण केन्द्र हैं वहां छत्तीसगढ़ में 1335 सहकारी समितियों के माध्यम से 1900 खरीदी केन्द्र खोल कर सरकार ने बिना किसी खास परेशानी के इस वर्ष भी खरीदी का उपरोक्त लक्ष्य हासिल
किया है. उलेखनीय यह भी है कि इसी धान को मिलिंग करा कर उसका चावल अपने जनवितरण प्रणाली के माध्यम से उतनी ही चुस्ती के साथ 1 रूपये और 2 रूपये किलो की दर से करीब 35 लाख परिवारों को भी उपलब्ध कराया जा रहा है. तो ‘आम आदमी’ के साथ होने का दावा कर उसे सस्ते अनाज उपलब्ध कराने के वादे कर जनादेश प्राप्त करने वाली केन्द्र की यूपीए सरकार के लिए यह तय करना शेष है कि उसे अर्थशास्त्र का कौन सा मॉडल अपनाना है. 2 रुपये किलो आलू खरीद उसका चिप्स 200 रुपये बेचने वाला बाज़ार का दानवी मॉडल या 11 रुपये में धान खरीद कर उन्हीं उत्पादकों तक 1 और 2 रुपये में चावल उपलब्ध कराने वाला कल्याणकारी सरकारी प्रणाली.
लेखक पंकज झा छत्तीसगढ़ से प्रकाशित भाजपा के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं.


