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सामुदायिक रेडियो को बरबाद कर देना चा‍हती है सरकार!

सरकार का एक हाथ क्या कर रहा है, बहुत बार दूसरे को खबर नहीं होती। ऐसे में सबकुछ ठीक-ठाक चलता रह सकता है मगर हमेशा नहीं। अनेक बार दोनों हाथ इक दूजे के खिलाफ भी उठ खडे़ होते हैं। सामुदायिक रेडियो स्टेशनों से वसूली जाने वाली सालाना स्पेक्टम फीस बढ़ाने के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ प्रतीत होता है। भारत में चार हजार सामुदायिक रेडियो स्थापित कर सूचना-संचार क्रांति का लाभ वंचित तबकों को पंहुचाने के लिए पिछले कुछ साल से पुरजोर कोशिश कर रहे सूचना प्रसारण मंत्रालय को भनक तक नहीं लगी कि संचार मंत्रालय फीस बढ़ाने जा रहा है। और बढ़ौतरी भी थोड़ी-बहुत नहीं सीधी करीब पांच गुणा। पहले यह 19000 रुपये होती थी और अब बढ़ कर हो गई है नब्बे हजार प्रति वर्ष। लिहाजा, आलम यह है कि देश के कार्यरत करीब 132 ऐसे स्टेशनों पर बंदी की तलवार लटक गई है।

सरकार का एक हाथ क्या कर रहा है, बहुत बार दूसरे को खबर नहीं होती। ऐसे में सबकुछ ठीक-ठाक चलता रह सकता है मगर हमेशा नहीं। अनेक बार दोनों हाथ इक दूजे के खिलाफ भी उठ खडे़ होते हैं। सामुदायिक रेडियो स्टेशनों से वसूली जाने वाली सालाना स्पेक्टम फीस बढ़ाने के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ प्रतीत होता है। भारत में चार हजार सामुदायिक रेडियो स्थापित कर सूचना-संचार क्रांति का लाभ वंचित तबकों को पंहुचाने के लिए पिछले कुछ साल से पुरजोर कोशिश कर रहे सूचना प्रसारण मंत्रालय को भनक तक नहीं लगी कि संचार मंत्रालय फीस बढ़ाने जा रहा है। और बढ़ौतरी भी थोड़ी-बहुत नहीं सीधी करीब पांच गुणा। पहले यह 19000 रुपये होती थी और अब बढ़ कर हो गई है नब्बे हजार प्रति वर्ष। लिहाजा, आलम यह है कि देश के कार्यरत करीब 132 ऐसे स्टेशनों पर बंदी की तलवार लटक गई है।

सामुदायिक रेडियो संचालकों के अखिल भारतीय संगठन कम्युनिटी रेडियो एसोसिएशन के राष्टीय महासचिव वीरेंद्र सिंह चौहान कहते हैं कि 9-10 मई को यहां इंडिया हैबिटेट सेंटर में सामुदायिक रेडियो पॉलिसी की समीक्षा के लिए हुई बैठक में जब एसोसिएशन ने मामला उठाया तो यह रहस्योद्घाटन हुआ कि फीस बढ़ाने की प्रक्रिया में सूचना व प्रसारण मंत्रालय से संचार मंत्रालय से कोई मशविरा नहीं किया। बैठक में दोनों मंत्रालयांे के अधिकारी आमने-सामने बैठे तो पता चला कि संचार मंत्रालय के वायरलेस प्लॉलिंग व कॉरडिनेशन विंग ने जब फीस बढ़ाई तो सूचना व प्रसारण मंत्रालय को विश्वास में नहीं लिया गया था। सूचना प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव सुप्रिया साहू ने बेबाकी से स्वीकार किया कि फीस वृद्धि की सूचना उनके लिए भी किसी झटके से कम नहीं थी।

खैर, जब देश भर के सामुदायिक रेडियो स्टेशनों और उनके संगठन सीआरए ने जब एक ज्ञापन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व संबंधित मंत्रियों को भेजकर इस निर्णय की तार्किकता पर सवाल खडे़ किए तो सूचना प्रसारण मंत्रालय भी सामुदायिक रेडियो स्टेशनों के पक्ष में आ खड़ा हुआ है। सूचना व प्रसारण मंत्रालय में सचिव उदय कुमार ने संचार मंत्रालय में सचिव आर. चंद्रशेखर को खत लिख कर कहा है कि सामुदायिक रेडियो तो विकास के संदेश को जन जन तक पंहुचाने का काम कर रहे हैं और यह ग्रामीण और सुदूरवर्ती इलाकों के आम जन के सशक्तिकरण के प्रभावी माध्यम के रूप में उभर कर आए हैं। बकौल उदय कुमार पांच गुणा फीस वृद्धि भारत में सामुदायिक रेडियो के विकास की राह में अवरोध बन जाएगी। दस मई के इस खत में उदय कुमार लिखते है कि बढ़ी हुई फीस न केवल स्थापित केंद्रों के लिए संकट साबित होगी बल्कि नए स्टेशन खोलने के इच्छुक संगठनों व संस्थाआंे को भी हतोत्साहित करेगी। उन्होंने संचार सचिव से फीस-वृद्धि वापस लेने का अनुरोध किया है।

क्या कहती है सीआरए: एसोसिएशन के महासचिव और रेडियो सिरसा के निदेशक वीरेंद्र सिंह चौहान बताते हैं कि मामला पुरजोर ढंग से दो दिवसीय नीति समीक्षा बैठक में उठाया गया। संचार मंत्रालय ने गैर-लाभकारी सामुदायिक रेडियो व अन्य स्पेक्टम उपभोक्ताओं पर फीस का एक ही फार्मूला लगा कर अन्यायपूर्ण कार्य किया है। एसोसिएशन को यह मंजूर नहीं है। एसोसिएशन का एक प्रतिनिधिमंडल इस सिलसिले में दस मई को संचार मंत्री कपिल सिब्बल से भी मिला था। सिब्बल ने स्वयं इस वृद्धि के बारे में अपनी अनभिज्ञता जताई। शुरू में तो वे इस बढौतरी में अपने मंत्रालय की भूमिका से ही इनकार करते रहे। मगर दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने पर उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि वे मामले में तथ्यों की पड़ताल कर सकारात्मक हस्तक्षेप करेंगे। इस बीच सूचना प्रसारण सचिव ने भी संचार सचिव को पत्र लिख दिया है। एसोसिएशन संचार मंत्रालय की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करेगी और यदि फीस नहीं घटाई गई तो एसोसिएशन के पास आंदोलन करने और अदालत का दरवाजा खटखटाने के विकल्प भी खुले हैं। साभार : हिंदुस्‍तान

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