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कृपया सांसद ही रहें, देवी-देवता न बनें

हमारे सांसदों के लिए एक ऐसा प्रशिक्षण सत्र चलाये जाने की आवश्यकता इधर शिद्दत से महसूस होने लगी है, जिसमें उन्हे तथ्यगत ढ़ॅंग से यह पाठ पढ़ाया जाय कि इस देश की गरीब जनता के वोट से जीते हुए वे भी हांड-मांस से बने आदमी ही हैं, देवी-देवता नहीं! इस देश का संविधान अगर उन्हें हर माह एक मोटी तनख्वाह और राजाओं जैसी तमाम सुविधाऐं देता है (सच कहें तो उन लोगों ने खुद ही ले लिया है) तो वह महज इसलिए कि वे गरीब जनता के बीच रहकर उसका दुःख-दारिद्रय दूर करने का प्रयास करें न कि खुद को भगवान घोषित करें। उनकी समझ में यह भी बैठाये जाने की आवश्यकता है कि हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है, तानाशाह नहीं और एक लोकतांत्रिक देश में किसी भी नागरिक को अपने विचार प्रकट करने का अधिकार ठीक उसी प्रकार है जैसे संसद व विधान सभाओं में देश के जनप्रतिनिधियों को। ये हमारे जन प्रतिनिधि अगर अगर सदन में गाली-गलौज, धक्का-मुक्की, मारपीट और तोड़-फोड़ कर सकते हैं तो क्या देश की जनता को इसकी आलोचना करने का भी हक़ नहीं है?

हमारे सांसदों के लिए एक ऐसा प्रशिक्षण सत्र चलाये जाने की आवश्यकता इधर शिद्दत से महसूस होने लगी है, जिसमें उन्हे तथ्यगत ढ़ॅंग से यह पाठ पढ़ाया जाय कि इस देश की गरीब जनता के वोट से जीते हुए वे भी हांड-मांस से बने आदमी ही हैं, देवी-देवता नहीं! इस देश का संविधान अगर उन्हें हर माह एक मोटी तनख्वाह और राजाओं जैसी तमाम सुविधाऐं देता है (सच कहें तो उन लोगों ने खुद ही ले लिया है) तो वह महज इसलिए कि वे गरीब जनता के बीच रहकर उसका दुःख-दारिद्रय दूर करने का प्रयास करें न कि खुद को भगवान घोषित करें। उनकी समझ में यह भी बैठाये जाने की आवश्यकता है कि हमारा देश एक लोकतांत्रिक देश है, तानाशाह नहीं और एक लोकतांत्रिक देश में किसी भी नागरिक को अपने विचार प्रकट करने का अधिकार ठीक उसी प्रकार है जैसे संसद व विधान सभाओं में देश के जनप्रतिनिधियों को। ये हमारे जन प्रतिनिधि अगर अगर सदन में गाली-गलौज, धक्का-मुक्की, मारपीट और तोड़-फोड़ कर सकते हैं तो क्या देश की जनता को इसकी आलोचना करने का भी हक़ नहीं है?

हमारे तमाम जनप्रतिनिधि अगर संगीन और जघन्यतम अपराधों में वर्षों से अदालतों का सामना कर रहे हैं, बार-बार जेल आ जा रहे हैं तो क्या इसी बात को कह भर देने से कोई व्यक्ति संसद की अवमानना का दोषी करार दिया जा सकता है? क्या संसद सिर्फ सांसदों की है, इस देश की जनता का उस पर कोई हक़ नहीं? यह सही है कि देश में संसद सर्वोच्च है लेकिन उसकी सर्वोच्चता किस पर है? क्या सिर्फ जनता पर? क्या संसद और संविधान हमारे सांसदों/विधायकों पर सर्वोच्च नहीं है? क्या ये उससे भी उपर की कोई ‘सुपर ह्यूमन’ जैसी चीज हैं? क्या ऐसा नहीं लगता कि जैसे-जैसे हमारे सांसद एक से एक गंभीर अपराधों/आरोपों में फॅसने का कीर्तिमान बनाते जा रहे हैं, वैसे-वैसे उनमें ‘पवित्र गाय’ के खोल में छिपने की आकांक्षा कुछ ज्यादा ही जोर मारने लगी है? याद कीजिए, दो साल पहले इन ‘माननीय’ सांसदों ने अपनी सर्वोच्चता और ‘गरिमा’ की कीमत लगाते हुए एक स्वर से तय कर लिया कि उन्हें इस देश के सबसे बड़े नौकर से भी ज्यादा वेतन चाहिए, भले ही वह एक रुपया ही ज्यादा हो! क्या इसका यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए ये खुद को मानसिक रुप से सबसे बड़े नौकर से भी ‘बड़ा नौकर’ मान रहे हैं? वेतन लेने में नौकर से भी आगे और रौब गांठने में देवता! यह कौन सा तर्क है भाई और भारत के अलावा दुनिया के किस और देश में चल रहा है ऐसा स्वांग?

देवता बनने के ही फेर में बीते साल इन ‘महामहिमों’ ने सदन से मांग की कि इन सबको ‘लाल बत्ती’ वाली गाड़ी चाहिए। जाहिर है कि लाल बत्ती मिल जाने पर उसके तदनुरुप हनक अपने आप मिल जाती! ऐसा नहीं है कि इन्हें लाल बत्ती मिलने का ‘क्रायटेरिया’ नहीं पता है। उसके बावजूद ये लाल बत्ती चाहते हैं और इसके बारे में भी इनका तर्क है कि चूंकि ‘वे’ विशिष्ट हैं, इसलिए सड़क पर चलने में भी उन्हें विशिष्टता का अधिकार मिलना ही चाहिए। क्या इन्हें यह समझाए जाने की जरुरत नहीं है कि जनता द्वारा चुना हुआ प्रतिनिधि जनता से उपर कैसे हो सकता है? बमुश्किल 20 से 25 प्रतिशत मतदाता का वोट वो भी (चुनाव के समय इन्हीं माननीय के आरोपों वाले शब्दों में–) रुपया बाँट कर, शराब पिलाकर, झूठे व अनर्गल वादे-प्रलोभन देकर तथा बहुत बार फर्जी वोट डालकर। क्या इसी से ये विशिष्ट हो जाने के हक़दार हैं? क्या इन्हें ये स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है कि ये जनता के सेवक हैं या विशिष्ट बनकर जनता से सेवा लेने और उसे रौंदने का प्रयास करने वाले? लाल बत्ती लेकर ये सड़कों पर पहले से ही आक्रांत आम जनता को क्या और ज्यादा आक्रांत करना चाहते हैं? अगर यही हाल रहा तो कोई आश्चर्य नहीं कल ये सब मिलकर सरकार से अपने लिए हेलीकाप्टर भी मांगेंगे! उसके बिना कैसी विशिष्टता!

पचास साल पहले देश के एक नेता के बारे कोई व्यंग्य छपा था। वह नेता देश की जनता के खजाने से वेतन/खर्च लेने वाला एक कार्याधिकारी भी था। पचास साल बाद (अपने स्वार्थ के लिए) अब उसे भगवान बनाने पर कुछ लोग आमादा हैं और कह रहे हैं कि वह व्यंग्य चित्र क्यों छपा! उसके लिए केन्द्र सरकार द्वारा कई लोग दंडित भी किये गये हैं और रीढ़ की हड्डी रखने वाले कुछ लोगों ने इस्तीफा देकर खुद को उस षडयंत्र से हटा लिया है। सरकार का यह अलोकतांत्रिक कृत्य अब नजीर बन गया है और खुद को देवता मान चुके कुछ सांसदों ने इसे अपने उपर भी आयद कर लिया है। अब वे कह रहे हैं कि हम देवताओं के विरुद्ध कोई व्यंग्य चित्र कैसे छाप सकता है और यह ‘‘…केवल राजनीतिकों का अपमान नहीं बल्कि संसदीय लोकतंत्र के प्रति निराशावाद को फैलाकर देश को अराजकता और तानाशाही की ओर ले जाने की साजिश है।’’ ध्यान दीजिए कि अपने स्वार्थ के लिए ये देवता बात को ऐंठकर कहाँ तक ले जा रहे हैं! ये जानते हैं कि तमाम तरह से कमजोर और हताश मौजूदा सरकार से अपने को देवता घोषित कराने का यही सही वक्त है। अन्नाद्रमुक के एक सांसद ने तो कहा कि ‘‘ऐसे चित्रों के छपने से बच्चों में राजनीति के प्रति घृणा पैदा होगी’’ मानों अभी बहुत प्रेम व आदर है राजनीतिज्ञों के प्रति! तृणमूल कांग्रेस की एक सांसद ने तो फिल्मों, टी.वी. चैनलों व मीडिया सबके प्रति घृणा प्रकट की और कहा कि ये सब राजनीतिज्ञों की भ्रामक तस्वीर पेश करने में लगे हैं। उनके कहने का वास्तविक आशय आसानी से समझा जा सकता है। उनकी सुप्रीमो ने अभी गत माह खुद से सम्बन्धित एक व्यंग्य चित्र छपने पर कोलकाता के एक प्रोफेसर को जेल ही भिजवा दिया था।

ऐसी परिस्थितियों में तो लगता है कि हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधि ही देश को अराजकता की तरफ ले जाने की साजिश कर रहे हैं। अपने को सुरक्षित कर लें, अपनी तिजोरी भरने की व्यवस्था कर लें तथा अपने को संसदीय गरिमा की आड़ में बुलेट प्रूफ शीशे से आवृत्त कर ले, बाकी देश और जनता जाय भाड़ में! यह कितनी आपराधिक सोच है कि जिन डेढ़ सौ-पौने दो सौ सांसदों ने हलफिया बयान देकर स्वयं अपना चरित्र उजागर किया है, उसे ही अगर देश का कोई नागरिक कह दे तो वह इनका अपमान है और अपने अपमान को ये फौरन संसद का अपमान बताने लगते हैं! ये सदन में सामूहिक बलात्कार की फिल्में देखें, धन लेकर सवाल पूछें, विश्वास मत के दौरान अपनी खरीद-फरोख्त करायें लेकिन इन पर कोई उंगली न उठाये! इसी बात का ये लिखित में अधिकार भी चाहते हैं। ये खुद बोलने का अधिकार और जो चाहें वो करने का भी अधिकार चाहते हैं लेकिन दूसरों से उसके बोलने का संविधान प्रदत्त अधिकार भी छीनना चाहते हैं! इधर के दिनों में यह एक नयी प्रकार की सोच हमारे जनप्रतिनिधियों में विकसित हो रही है कि राजनीतिक दल से जुड़ा कोई भी व्यक्ति जो चाहे कह सकता है लेकिन अगर वह किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं है तो उसको किसी नेता या दल की आलोचना करने का अधिकार नहीं है। क्या मतलब है इसका? देश के किसी नागरिक को अगर किसी जनप्रतिनिधि, राजनीतिक दल या सरकार के किसी कृत्य से विरोध है तो उसे क्या वह तभी व्यक्त कर सकता है जब सपा, बसपा, भाजपा या कांग्रेस सरीखे दलों में से किसी की सदस्यता ग्रहण कर ले? ये दल कहाँ से आ गये हैं? कहाँ लिखा है संविधान में इनकी उत्पत्ति या इनकी भूमिका और इनके अधिकार के बारे में? संसदीय गरिमा की आड़ में निहित स्वार्थ वाले तत्‍वों की कुत्सित चाल पर रोक लगनी ही चाहिए। इसी में संसदीय लोकतंत्र की रक्षा और भविष्य है।

लेखक सुनील अमर पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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