शासन प्रशासन के क्रिया कलापों में पारदर्शिता लाने और उसे नागरिकों के प्रति जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से सोनिया गांधी की अध्यक्षता में गठित राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की पहल पर आम आदमी को सूचना पाने का प्रभावी अस्त्र 2005 के अधिनियम द्वारा दिया गया था, जनहित की दिशा में एक सराहनीय और अप्रत्याशित कदम रहा। लेकिन नीचे से उपर तक भ्रष्टाचार में आकण्ठ में डूबी सरकार की वह मशीनरी जिसका काम ही है जनता को सताना, किसी काम के लिए उसे दौड़ा-दौड़ा कर पस्त कर देना और दलालों के माध्यम से मनमाना पैसा वसूलने के बाद उसे राहत देना या नहीं भी देना। उसे यह कहां हजम होने वाला और वह धीरे-धीरे अपने चिर परिचित हरकतों से अधिनियम की भावना को दफन करने पर आमादा दिख रही है। इस अधिनियम के सक्रिय होने में उसे घाटा ही घाटा है। और तो और सरकारी मशीनरी के विरुद्ध अपील करने के लिए बनी संस्था प्रदेश के सूचना आयोग की भी वही दशा होती जा रही है, जैसे दूसरे सरकारी आयोगों की। वहां अपीलों का अम्बार लगा हुआ है। जो सुनवाई अपील के एक माह में अपेक्षित रही उसका नम्बर अब छह-छह माह में नहीं आ रहा है।
उत्तर प्रदेश सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त के अलावा 10 सूचना आयुक्तों के पद सृजित हैं। प्रदेश की आबादी, विकराल जनसमस्याएं और उसके उलट सरकारी मशीनरी का मनमानापन और कारनामों को देखते उस दस की संख्या को भी कम कहा जा सकता है। लेकिन वे पद भी भरे नहीं जात रहे हैं। वर्तमान में चार सूचना आयुक्त के पद लम्बे अरसे से रिक्त चल रहे हैं। एक आयुक्त के नीचे पेशकार चपरासी सहित सात कर्मचारियों के पद सृजित हैं। आश्चर्य है इनकी नियुक्ति पूर्णकालिक और आयोग द्वारा होने के बजाय ये दूसरे सरकारी दफ्तरों से उधार का लाकर लगाए जाते हैं और उस पर भी उनकी संख्या किसी आयुक्त के पास मात्र दो हैं तो किसी के पास चार। इस दुर्व्यवस्था के बीच 6-6 महीनों से अपीलें निस्तारण का बाट जोह रही हैं। सूचना आयोग की वेबसाइट अपडेट नहीं है। लम्बित अपीलों का तो ब्योरा दर्ज नहीं है यहां तक कि जो सूचना आयुक्त अवकाश ग्रहण कर चुके हैं, उनका नाम अभी उस पर मौजूद है। चूंकि सम्बंधित विभागों द्वारा समय अन्दर सूचना न देने के आरोप में उनके विरुद्ध 25 हजार तक का जुर्माना ठोंकने और विभागीय कार्रवाई का आदेश देने का अधिकार उन्हें है, लेकिन जब अपना घर ही दुरूस्त नहीं है तो आयोग दूसरे को क्या सबक सिखाएगा।
सरकार के कुछ विभाग जैसे स्वास्थ्य, पंचायत राज, वन विभाग, समाज कल्याण विभाग सहित अनेक ऐसे विभाग हैं, जहां आम जनता को कुछ राहत मिल सकती है, वे भरसक सूचना देने में दिलचस्पी नहीं रखते जिसके कारण स्पष्ट हैं। यदि सूचना दे भी दिया तो कुछ का कुछ उनके उच्च अधिकारियों के यहां अपील का नतीजा भी वही है। चूकि उनके विरुद्ध विभागीय कार्रवाई नहीं होती तो डर किस बात का। सरकारी कर्मचारी इस तरह की हवा बयार चिर काल से देखते आ रहे हैं। कुछ एक ही विभाग ऐसे हैं जो समय से सूचना दे देते हैं, उनकी प्रशंसा भी की जानी चाहिए। सरकारी मशीनरी के रवैये के चलते इस अधिनियम के प्रति भी लोगों मे निराशा घर करती जा रही है। केन्द्र सरकार और प्रदेश सरकार को भी इस महात्वाकांक्षी योजना के क्रियान्वयन पर बीच बीच में जो मानीटरिंग करना चाहिए नहीं कर रही है। समय रहते अपेक्षित ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में आम नागरिकों को मिला यह हथियार अंतिम सांस लेते दिखेगा। सूचना के अनुसार वर्तमान में लगभग 32 हजार से अधिक अपीलें प्रदेश आयोग में निस्तारण के लिए लम्बित हैं। एक महीना तो दर किनार रहा, दो माह में उनका निस्तारण हो सका तो बड़ी बात है और उस ओर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया तो अपीलों का अम्बार बढ़ता़ जाएगा और उसकी परिणिति क्या होगी बताने की जरूरत नहीं है। लोग याद करते मिलेंगे कि एक सूचना अधिकार अधिनियम 2005 में बना था।
सूचना आयोग में निवेदक या उसका कोई अधिकृत प्रतिनिधि को भी निश्चित तारीख के दिन तलब किया जाता है। जो जरूरी भी है। सूचना निवेदक के व्यक्तिगत हित की रही तो उसे खलता नहीं है लेकिन जो जनहित में यह काम करते हैं उन्हें वहां हाजिर होने के लिए आने-जाने रहने खाने में हजार दो हजार की चपत आम बात है। प्रावधान होना चाहिए कि सूचना न देने के दोषी लोक सेवक या विभाग पर जुर्माना लगाकर निवेदक को वह व्यय उसी दिन मुहैया कराने का प्रावधान होना चाहिए। इससे समय से सूचना न देने के दोषी विभाग और उसके द्वारा नामित जन सूचना अधिकारी में भय पैदा हो सकेगा। आखिर आम नागरिक भी तो समय से सरकारी विभागों के देय जमा न करने और समय से अन्यान्य सूचनाएं न देने के आरोप में दण्ड का भागी होता है तो क्यों नहीं लोकसेवक दण्डित हो सकते हैं।
एक गंभीर मामले में प्रदेश शासन से 24 जून सन 2008 में सूचना मांगी गयी, क्या 1857 के प्रथम स्वतंत्रता सग्राम के दौरान काला पानी की सजा प्राप्त गोगा साव व उनके अनुज भीखी साव के वंशज जो अभाव में जी रहे हैं, क्या उनके लिए आर्थिक मदद का प्रावधान है। ज्ञातव्य है कि इस सम्बन्ध में सन 1973 में उनके वंशज विन्ध्याचल साव ने केन्द्र सरकार से आर्थिक सहायता की मांग की तो उन्हें जो उत्तर मिला वह निन्दनीय ही कहा जा सकता है। बताया गया कि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए आर्थिक मदद का प्रावधान नहीं है। केन्द्र सरकार के पास 1857 के स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों के लिए यद्यपि कोई प्रावधान नहीं है फिर उनके परिजनों को प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री कोष से यदि उनके परिजन वास्तव में आर्थिक संकट से गुजर रहे तो उसी कोष से उनकी सहायता कर देनी चाहिए थी, पर सरकारी मशीनरी के पास संवेदना कहां? बहरहाल यह एक अलग मुद्दा है।
24 जून 2008 के प्रार्थना पत्र के आलोक में प्रदेश सरकार ने 21 दिसम्बर 2009 कों जिलाधिकारी आजमगढ़ को लिखा कि 12 दिसम्बर 2003 के शासना देश के आलोक में प्रार्थना पत्र पर संस्तुति/आख्या भेजी जाय। 2 साल से अधिक का समय गुजर गया सहायता मिलना तो दूर सवाल का जवाब भी नहीं मिला। पता चला कि वह शासनादेश दफ्तर में उपलब्ध नहीं है और मामला दफन हो गया। ज्ञातव्य है कि अजमतगढ़ जिला आजमगढ़ के रहने वाले महान देश भक्त गोगा साव और अनुज भीखी साव पर लक्ष्मी की असीम कृपा रही। वीर कुंवर सिंह की सेना को संरक्षण देने के कारण अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें काला पानी की सजा देकर अण्डमान निकोबार भेज दिया फिर उनका पता नहीं चला। अजमतगढ़ जिला आजमगढ़ में उनके खाण्डसारी के कई कारखाने चलते रहे और काफी बड़ी चल अचल सम्पति के मालिक थे, जिसे अंग्रेजों ने मुखबिरों को इनाम में दे दिया। सरकार चाहती तो प्रतीक तौर पर सहायता स्वरूप मुंख्यमंत्री कोष से मदद कर सकती थी, जैसा वह करती रहती है। तो लगता कि सरकार देश भक्तों की कुर्बानी के प्रति कितनी संवेदनशील है। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक के कोष हैं, जिससे तमाम लोगों की मदद की जाती रहती है। लेकिन आम तौर पर उससे मदद दिलाने के लिए एक प्रभावशाली व्यक्तित्व होना जरूरी है। लेकिन किसी तरह गुजारा बसर कर रहे शहीदों के परिजनों के पास सोर्स हो भी तो कहां से।
लेखक बनवारी जालान वरिष्ठ पत्रकार हैं.


