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पेट्रोल बम फटने से जूनियर जर्नलिस्टों पर यह पड़ेगा असर..

पेट्रोल लगभग अस्सी रुपये लीटर हो गया. सब चैनलों ने खबरें चलाई. खूब चलाई. देर रात तक पत्रकार पी2सी मारता हुआ कमोवेश हर चैनल पर नज़र आ रहा था. लेकिन क्या किसी मालिकान ने सोचा कि इस पेट्रोल का सबसे ज्यादा असर मीडिया पर ही पड़ेगा. क्योंकि आज की तिथि में जो पत्रकार लगभग 5000 रुपये के वेतन पर कार्यरत हैं सबसे ज्यादा दिक्कत उसको ही आती है. क्योंकि वो जैसे-तैसे 70 रुपये के भाव में गाड़ी चला रहा था, लेकिन एकदम अस्सी के पास तेल पहुँच जाने से सबसे ज्यादा चोट पत्रकार को ही लगी है. मार्केट में खबर है कि कांग्रेस जाने को है इसलिए अपनी औकात दिखा रही है. अब चर्चा यह है कि सरकार एलपीजी पर भी देने वाली सब्सिडी ख़त्‍म करने जा रही है, जिसके चलते सिलेंडर भी अब लगभग 800 में ही मिलेगा.

पेट्रोल लगभग अस्सी रुपये लीटर हो गया. सब चैनलों ने खबरें चलाई. खूब चलाई. देर रात तक पत्रकार पी2सी मारता हुआ कमोवेश हर चैनल पर नज़र आ रहा था. लेकिन क्या किसी मालिकान ने सोचा कि इस पेट्रोल का सबसे ज्यादा असर मीडिया पर ही पड़ेगा. क्योंकि आज की तिथि में जो पत्रकार लगभग 5000 रुपये के वेतन पर कार्यरत हैं सबसे ज्यादा दिक्कत उसको ही आती है. क्योंकि वो जैसे-तैसे 70 रुपये के भाव में गाड़ी चला रहा था, लेकिन एकदम अस्सी के पास तेल पहुँच जाने से सबसे ज्यादा चोट पत्रकार को ही लगी है. मार्केट में खबर है कि कांग्रेस जाने को है इसलिए अपनी औकात दिखा रही है. अब चर्चा यह है कि सरकार एलपीजी पर भी देने वाली सब्सिडी ख़त्‍म करने जा रही है, जिसके चलते सिलेंडर भी अब लगभग 800 में ही मिलेगा.

खैर, पब्लिक से यूं कहिये कि कांग्रेस ने कह दिया है कि हम तो डूबेंगे सनम तुम्हे भी ले डूबेंगे, जिसके चलते अगले 2 सालों में पेट्रोल 100 का आंकड़ा छू सकता है व और भी कई तरह की परेशानियां बढ़ सकती है. कांग्रेस का अंग्रेजी युवराज 5000 से ज्‍यादा का रीबाक का जूता पहनता है, लेकिन कई पत्रकारों को पांच हजार की तनख्वाह नहीं मिलती. काफी समय से यह देखा गया है कि एक आम आदमी भी झट से कह देता है कि मीडिया वाला दलाली कर लेता होगा लेकिन आज की तिथि में दलाली भी संभव नहीं है, क्योंकि हर वर्ग का अधिकारी भी समझ चुका है कि अब मीडिया की तव्वजो नहीं है. अगर एक अखबार नकरात्मक खबर दिखायेगा तो दूसरा सकरात्मक दिखाने के लिए तैयार है. बड़े दौर में आज भले ही राजीव शुक्ल, आलोक मेहता, प्रभु चावला जैसे पत्रकारों को दलालों की उपमा दे दी जाती है, लेकिन आज वह अपने बच्चों का लालन पालन करने में तो समर्थ हैं, पर शायद वह भी यह भूल गए हैं कि सरकार की गलत नीतियों के चलते 5000 की तनख्वाह वाला पत्रकार ख़त्‍म हो चला है. लेकिन उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता वो तो अपनी मस्ती रमे हैं. परन्तु महंगाई की यह मार पत्रकार पर बहुत नज़र आ रही है.

आज के दौर में सम्बन्ध बनाकर काम निकालना भी आसान नहीं हैं क्योंकि इस लाइन में वह भी ब्यूरोचीफ़ बने हुए घूम रहे हैं जो कि महज पांचवीं पास हैं व पत्रकारिता से उनका कोई सरोकार नहीं है. शायद यही कारण है कि पिछले 5 साल से इस लाइन में से कई ईमानदार पत्रकार पलायन कर गए व अब भी पलायन का दौर जारी हैं, जिसके चलते आज हर पुराना पत्रकार यही कहता हुआ नज़र आता है कि भाई इस लाइन में कुछ नहीं है. कारण है कि भडुए व दलाल इस लाइन में प्रवेश कर गए हैं जो कि मीडिया का नाम बदनाम करने पर आमादा हैं, जल्दी इमानदार पत्रकारों को इन दलाल व भडुए पत्रकारों के खिलाफ एक मुहिम चलानी होगी, तभी मीडिया लाइन में से इस गन्दगी का सफाया होगा.

लेखक अभिषेक सिंह पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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