यशवंतजी नमस्कार, देश में बार-बार यूपीए सरकार ने पट्रोल में जो आग लगाई है उसकी मार मार देश के प्रत्येक व्यक्ति पर पड़ी है। इससे मीडिया भी अछूता भी नहीं है। मीडिया में भी एक दलित वर्ग है, जिसे हम मीडिया की भाषा में स्ट्रिंगर कहते हैं। इस पर भी यूपीए सरकार की मार सीधे-सीधे पड़ी है। मतलब यह है पिछले कई सालों में स्ट्रिंगर को स्टोरी के बदले मिलने वाले भुगतान में जरा भी बढ़ोतरी नहीं हुई है, बल्कि चैनलों ने स्ट्रिंगरों को अपनी सुविधानुसार भुगतान देना शुरू कर दिया है। कुछ चैनल १००० रुपये या ५०० रुपये स्टोरी देते हैं तो कुछ इससे भी कम। इसमें पेट्रोल से लेकर सभी तरह के भत्ते शामिल होते हैं।
सवाल यह उठता है कि क्या छोटे शहर का कोई भी स्ट्रिंगर क्या ईमानदारी के साथ अपने परिवार का पालन पोषण कर सकता है? शायद आपका जवाब होगा – नहीं, तब देश में इस बात को लेकर क्योँ चर्चा नहीं होती, क्यों नहीं चैनल के स्ट्रिंगर को महंगाई के आधार पर भुगतान नहीं दिया जाता है? क्योँ नहीं सरकार स्ट्रिंगर का न्यूतम वेतन निर्धारित करती है? जरा सोचिये इस महंगाई के बहाने क्या स्ट्रिंगर का भविष्य सुरक्षित है? क्या स्ट्रिंगर शब्द छोटे पर्दे पर दाग नहीं है? आखिर कब मीडिया से यह अछूत शब्द “स्ट्रिंगर” गायब होगा।
लेखक भीम मनोहर बरेली में न्यूज एक्सप्रेस से जुड़े हुए हैं.


