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“गौरव सोलंकी की पीठ ठोकिये, क्योंकि डकैत सिर्फ पार्लयामेंट में नहीं होते”

मजबूरी और महत्वाकांक्षा ज़्यादातर लेखको की जुबां पर अपने शब्द रख देती है। क़लम घिसने वालो के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि वो अपने अन्दर का लेखक कभी मरने न दें। विशेषरूप से, जब बाज़ारवाद में डूबी संस्थाए लेखकों को पुरस्कार उनके सम्मान को बढ़ाने के लिए नही, उनके सम्मान को खरीदने के लिए या अहसान तले दबाने के लिए देती हैं। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि कैसे कोई संगठन या संस्था इतनी ताक़तवर हो सकती है कि किसी रचना का समाज तक पहुंचना या न पहुंचना, संस्था के विवेक पर निर्भर करे। क्या ये उस समाज की अपनी सोच को कमतरी से आंकना नहीं हुआ? या क्या ये खुद के बारे में ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ जैसी कोई राय बनाने वाली बात नहीं है?

मजबूरी और महत्वाकांक्षा ज़्यादातर लेखको की जुबां पर अपने शब्द रख देती है। क़लम घिसने वालो के लिए ये बेहद ज़रूरी है कि वो अपने अन्दर का लेखक कभी मरने न दें। विशेषरूप से, जब बाज़ारवाद में डूबी संस्थाए लेखकों को पुरस्कार उनके सम्मान को बढ़ाने के लिए नही, उनके सम्मान को खरीदने के लिए या अहसान तले दबाने के लिए देती हैं। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि कैसे कोई संगठन या संस्था इतनी ताक़तवर हो सकती है कि किसी रचना का समाज तक पहुंचना या न पहुंचना, संस्था के विवेक पर निर्भर करे। क्या ये उस समाज की अपनी सोच को कमतरी से आंकना नहीं हुआ? या क्या ये खुद के बारे में ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ जैसी कोई राय बनाने वाली बात नहीं है?

हर रचना को श्लील या अश्लील के चश्मे से आंकने वाले ये क्यों भूल जाते हैं कि हम एक ऐसे युग के सफ़र में हैं जिसके वक़्त का एक पहिया वक़्त से बहुत आगे चल रहा है, ये वो समाज है जिसके लिए धर्म, सेक्स या कुछ भी टैबू नहीं है। कम से कम सेक्स तो बिलकुल नहीं, बल्कि वो तो मुद्दा ही नहीं है। सेक्स कंटेंट के लिए किताबें झांकना इस युग कि बात नहीं है। इस दौर में की-बोर्ड का एक इंटर उस कंटेंट का अम्बार लगाने में सक्षम है। यहाँ, कोई व्यक्ति किताबों की तरफ तब आता है जब उसका लगाव साहित्य या लेखन से हो और इसलिए वो अपनी सोच, समझ और व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी पर ही पन्ने उलटना चाहता है। लेकिन अगर मान भी लिया जाए की सरकार या किसी संस्था की फिक्र असली है तो उस इन्टरनेट कंटेंट के लिए उनके माथे पर कोई शिकन क्यों नहीं आती? उस आईने में खुद को इतना निरीह क्यों देखा जाता है, क्या यह दिखावा नहीं है, ढकोसला नहीं है?

गौरव सोलंकी के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ है, ज़बर्दुस्त पटकथा, बेहतरीन पात्रों और उम्दा संवाद वाले शानदार लेखन की प्रतिभा से लबालब उसकी एक रचना पर अचानक अश्लील का ठप्पा जड़ दिया जाता है, जबकि उसी संस्था की पत्रिका में पहले उस रचना को सादर स्वीकार कर सम्मानित किया जाता है, पलकों पर बिठाया जाता है। इसमें कोई 2 राय नहीं की घटना में व्यक्तिगत स्वार्थ या हित के कारण ऐसा निर्णय लिया गया है। जिसकी निंदा आवश्यक है क्योंकि ये वही ताकतें हैं जो नए लेखकों को भी उठने नही देना चाहती और नई प्रतिभाओं की किसी बेहतरीन रचना से उनका हाज़मा बिगड़ जाता है।

नए लेखकों की कूड़ा रचनाओं में कुछ हो न हो नयापन ज़रूर होता है, और यकीन करना पड़ेगा कि उन्हीं कूड़ा रचनाओं में कुछ ऐसी रचनाएँ होती हैं, जो वक़्त के साथ अपने आप सोना हो जाती हैं, बिना एक भी शब्द बदले। लेकिन यहाँ तो संपन्न लेखकों ने नए लेखकों के लिए ‘प्रवेश वर्जित’ टाइप बोर्ड लगा रखा है, और उनकी नज़र में यह साहित्यिक घुसपैठ है। मगर, जिस तरह बढ़ी दाढ़ी, ढीला कुर्ता, लम्बे बाल और कंधे पर झोला लटका लेने से कोई लेखक नहीं बन जाता, उसी तरह ऐसा नियम भी नहीं हो सकता कि कोई नया लेखक उन तमाम खुदगर्ज़ लेखकों से बेहतर ना कह सके। वो कह सकता है, और कहता है मगर अनसुना कर दिया जाता है। और उसकी रचनाओं को कभी कमज़ोर, कभी असाहित्यिक और कभी अश्लील करार देकर पीछे धकेल दिया जाता है, व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए। मगर ज्ञानपीठ ने कभी सोचा भी नहीं होगा की 25-26 साल का कोई नवोदित लेखक उनका दिया हुआ पुरस्कार उन्हीं की मुंह पर मार देगा। ऐसे परिवेश में पान सिंह तोमर का वो संवाद “डकैत होते हैं पार्लयामेंट में” अपनी प्रासंगिकता खो देता है क्योंकि घटनाक्रम बताता है कि डकैत सिर्फ पार्लयामेंट में नहीं होते।

यहाँ इस बात का ज़िक्र बहुत ज़रूरी है की गौरव सोलंकी ने जो किया है, उसके लिए बहुत बड़ा जिगर चाहिए, इसलिए प्रतिभावान लेखक और आत्म सम्मान को बचाने के लिए उसकी लड़ाई दोनों की दिल खोल कर सराहना की जानी चाहिए। ज्ञानपीठ जैसे संस्थानों में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ बज चुके इस बिगुल से हमें पूरी आशा होनी चाहिए। यह एक मौका है जब साहित्यिक भ्रष्टाचार के वजूद को बेहद ताक़तवर तरीके से उजागर किया जा सकता है। सभी लेखकों को इस वक़्त एक साथ होना चाहिए। इस लड़ाई में एक दूसरे का हाथ थाम कर साहित्य के उन बाज़ारू तख़्त ओ ताज को गिराने के लिए आगे बढ़ना चाहिए, मगर व्यथा ये कि बहुत से लेखक अब भी ख़ामोश हैं। वजह यह कि उनकी कोई पुस्तक या तो छपने वाली है या उसे छापने का वादा किया गया है या फिर उन्होंने स्कूल में पढ़ी वो ‘पानी में रहकर मगर से बैर’ वाली कहावत ज़्यादा गंभीरती से याद कर ली थी। लानत है ऐसी किताबों और लेखों पर जो साहित्यिक और व्यक्तिगत मूल्यों की कीमत पर लिखे गए हो। सब को समझना होगा कि ये वक़्त बेहद नाज़ुक है, क़लम पर लटकती तलवार की तेज़ धार शब्दों को अपने मायनों में तराश न दे, इसलिए सबको साथ आना होगा। साथ आएँ और इस प्रयत्न में भागीदार बनें, जो समाज में लेखकों को इज्ज़त से जीने की हक़ दे सके। आगे आइये, एक ऐसे परिवेश के निर्माण के लिए जहाँ अच्छे-बुरे, हलके-वज़नी, श्लील-अश्लील की कसौटी असली हो, सच्ची हो – किसी राजनीतिक या भाई भतीजावाद से प्रेरित नहीं। सोलंकी जैसे लेखको को हज़ार सलाम। साथ आइये।

लेखक जमशेद कमर सिद्दीकी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं. यह लेख उनके ब्‍लॉग से साभार लिया गया है.

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