जब किसी चिकित्सक को डिग्री दी जाती है उस वक्त्त एक शपथ दिलाया जाता है। उस शपथ को हिप्पोक्रेट ओथ कहते हैं, जिसमें मानव सेवा को सबसे अहम कहा जाता है। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि आम तौर पर शपथ एक बार ली जाती है लेकिन चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसा नहीं है। चिकित्सक अपने हर नुस्खा लिखने से पहले Rx लिख कर उस शपथ को याद करता है और फिर मरीज़ के लिए उचित दवा और अन्य जरुरी चीज का नुस्खा लिख कर देता है, वह भी फ्री में नहीं नुस्खा बनाने का फीस लेकर। अब जरा गौर कीजिए एक दिन में कितनी बार एक भ्रष्ट चिकित्सक अपने ज़मीर को मारता होगा। ऐसे चिकित्सक से आप क्या उम्मीद करते हैं जो हर रोज अपने ज़मीर को मारता हो। जो चन्द पैसों कि खातिर जिंदगी को दांव पर लगाने से नहीं हिचकते ऐसे भ्रष्ट चिकित्सक से समाजसेवा करने की उम्मीद तो व्यर्थ ही है, क्योंकि मोटी फीस लेने वाले चिकित्सक कम से कम दो सौ रुपए तो लेते ही हैं। ऐसे में वे यदि दिन भर में पच्चीस मरीजों को भी देखता है तो रोज की आमदनी 5 हजार रुपए होगा यानी महीने का 1.5 लाख रुपए और साल का 18 लाख। जब इतनी बड़ी रकम ईमानदारी से कमाई जा सकती हो तो चंद रुपयों के लिए ईमान बेचना और अपने ज़मीर को हर रोज मारकर पैसा कमाना एक स्वस्थ मानसिकता की पहचान यकीनन नहीं।
सत्यमेव जयते कार्यक्रम में आमिर खान ने इस मुद्दे को उठा कर बहुत बड़ा काम किया है, लेकिन महज मुद्दा उठाने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता। स्वास्थ के नाम पर हो रहे लूट खसोट का बहुत बड़ा नेटवर्क बन चुका है। इस अभेदक तिलिस्म को तोड़ने के लिए बेहद जरुरी है कि हम सब मिलकर भगवान का भेष धारण किए भ्रष्ट डाक्टरों के चेहरे बेनकाब करें, ताकि कोई और आम गरीब जनता को लूट न सके। क्योंकि एमसीआई, जो डाक्टरों के गलत कामों पर अंकुश लगाने के लिए जिम्मेदार है, खुद ही भ्रष्टाचार से घिरा है। ऐसे में एमसीआई से उम्मीद क्या कर सकते हैं कि वह किसी भ्रष्ट चिकित्सक को सजा देंगे। देना होता तो अबतक दे चुके होते और यह सफेदपोश का काला कारोबार यूं फल फूल न रहा होता।
समस्या की जड़ : दरअसल समस्या कि सबसे बड़ी जड़ है ब्राण्ड नेम। जब नुस्खा लिखा जाता है तो ऐसा नहीं लिखा जाता है कि आपको बुखार है तो आप पैरासिटामोल ले लो। नुस्खा में लिखा जाता है ब्राण्ड का नाम और वह ब्राण्ड किसी खास मेडिकल स्टोर पर ही मिलेगा, जहां जनाब का सेटिंग होगा। इससे कमाई दोनों तरह से हो जाती है। तत्काल मेडिकल स्टोर पैसा देगा और फिर कंपनी। दवा की कीमत भी कमीशन के अनुसार तय होता है। ऐसा इस लिए होता है कि जो जितना लेगा उतना ही दवा की कीमत पर असर पड़ेगा। सबसे दुर्भाग्य की बात तो यह है कि अब स्थानीय स्तर पर भी यह कारोबार खूब फलफूल रहा है। इन स्थानीय दवा ठेकेदारों द्वारा सपलाई की जाने वाली दवा की कीमत नामी गिरामी कंपनियाँ, जो पहले से स्थापित कंपनियाँ हैं, उन कंपनियों की दवाओं से भी ज्यादा कीमत होती है। और नाम भी दवाओं का मनचाहा होता है जो एक दुकान के अलावा दूसरी जगह मिल भी नहीं सकता। सोनभद्र जिले में एक ठेकेदार ऐसा है जिनका कमीशन बेस दवाओं का कारोबार का जाल पूरे जिले में फैला हुआ है। और यह सब स्थानीय जिम्मेदार प्रशासन के नाक के नीचे हो रहा है। हां कुछ दिन पहले हमारे बहादुर एक कलम के सिपाही की खबर एक बड़ी अखबार में छपा था कि फलां मेडिकल स्टोर के सभी कागजात ठीक हैं। अब ऐसी खबर क्यों छपी थी यह आम जनता भली भांति जान सकती है।
समस्या का समाधान : सबसे चिंताजनक बात तो यह है कि इस तरह कि दवाओं के सेवन से सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और हम सेहतमंद होने के बजाय और बीमार होते जाते हैं और दूसरी ओर आर्थिक नुक़सान भी झेलना पड़ रहा है। और कुछ आपने पूछ लिया तो डाक्टर साहब नाराज होकर पर्चा फेंक यह जताने का कोशिश करते हैं कि आपने यदि मुझसे इलाज नहीं करवाया तो आप की जान जा सकती है। और मरीज़ डर के मारे गिड़गिड़ाने लगता है तब जा कर साहब ऐंठन भरे तेवर के साथ आपको देखकर यह एहसास कराते हैं कि मैं तुम्हारे जैसे गुस्ताख का भी इलाज इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मेरा धर्म मानव सेवा है। और नुस्खा में कमीशन के स्टार लगाकर आपको थमा देते हैं। और आप उस नुस्खे में लिखे दवा को अमृत समझ कर पीने लगते हैं, जबकि वह दवा तो कमीशन खोरी के शहद में डूबा होता है, जिससे स्वाद तो मीठा लगता है लेकिन असर कड़वा होता है। जब तक हम यह सोच नहीं बदलते और जब तक हम अपने अधिकार को नहीं समझते तब तक ये धरती के भगवान आम जनता को यूं ही लूटते रहेंगे।
लेखक अब्दुल रशीद मध्य प्रदेश के सिंगरौली में पत्रकार हैं.


