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सारे बलिदान पत्रकार दें और आप उन्हें जीने न दें! वाह साहब

पत्रकारिता दिवस पर बधाई। बधाई भी इसलिए की अगर हम पत्रकार हैं तो हम सब गर्व से बोले कि हम पत्रकार हैं। पत्रकारिता आज हिन्दुस्तान में जिस मुकाम पर है वह अपने आप में सम्पूर्ण है। हमारा इतिहास अतीत भी गौरवशाली रहा है। वर्तमान भी सम्पूर्ण है। भविष्य वर्तमान की नींव पर टिका हुआ है। हम 70 प्रतिशत कृषि आधारित कार्यों में जीवन व्यतीत करने वाले, जंगल, जमीन से जुड़े गंवई गांव में जीवन व्यतीत करने वाले देश के पत्रकार समूचे विश्व में जाने और माने जाते हैं। यह बड़ी उपलब्धि है। प्रायः पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा किया जाता है। उसे नैतिक, सामाजिक, मानवीय मूल्यों की रक्षा का उपदेश पिलाया जाता है। उससे अव्यवस्था के खिलाफ लड़कर शहीद होने की उम्मीदें की जाती है। पत्रकारिता में गिरावट आ गई है। आ रही है। कह कर सिर नीचा करके चलने की साजिशें रची जाती है। यह निरन्तर जारी है।

पत्रकारिता दिवस पर बधाई। बधाई भी इसलिए की अगर हम पत्रकार हैं तो हम सब गर्व से बोले कि हम पत्रकार हैं। पत्रकारिता आज हिन्दुस्तान में जिस मुकाम पर है वह अपने आप में सम्पूर्ण है। हमारा इतिहास अतीत भी गौरवशाली रहा है। वर्तमान भी सम्पूर्ण है। भविष्य वर्तमान की नींव पर टिका हुआ है। हम 70 प्रतिशत कृषि आधारित कार्यों में जीवन व्यतीत करने वाले, जंगल, जमीन से जुड़े गंवई गांव में जीवन व्यतीत करने वाले देश के पत्रकार समूचे विश्व में जाने और माने जाते हैं। यह बड़ी उपलब्धि है। प्रायः पत्रकारिता को कटघरे में खड़ा किया जाता है। उसे नैतिक, सामाजिक, मानवीय मूल्यों की रक्षा का उपदेश पिलाया जाता है। उससे अव्यवस्था के खिलाफ लड़कर शहीद होने की उम्मीदें की जाती है। पत्रकारिता में गिरावट आ गई है। आ रही है। कह कर सिर नीचा करके चलने की साजिशें रची जाती है। यह निरन्तर जारी है।

मेरा सवाल है कि हम पत्रकारगण अपनी तुलना किससे करें। किससे अपनी अच्छाई बुराई आंके? हमारे पूर्वज पत्रकार निश्चित तौर पर आदरणीय थे। तपस्वी कहूं तो सही रहेगा। थे। उनका निजी जीवन एक जोड़ी कुर्ता पायजामा, चप्पलों, खादी के झोले, रूखी सूखी रोटी में गुजर गये। आखिरी में जब वह गंभीर बीमारियों से बीमार हुए तो उस माफिया से आर्थिक मदद नहीं ली जिसके खिलाफ वह जीवन भर लड़े। सरकारी इमदाद ठुकरा दी। ऐडियां रगड़ रगड़ कर मर गये। उनके बच्चे प्राइमरी के मास्टर तक नहीं बन पाए। जिस समाज के लिए वह लडे़ आज 2012 में उस समाज के क्या चंद लोग उनके नाम बता सकते है। शायद नहीं। ऐसे तपस्वी पत्रकारों बल्कि कहा जाए कि शहीद पत्रकारों को कहीं जनरल नालेज की लिस्ट में शामिल किया गया है। किसी भी प्रतियोगी से क्या कभी कोई सवाल पूछा जाता हैं। कि जरा बताइयें। आप के शहर में ऐसे कौन से पत्रकार थे या हैं जो कर्मठ, कर्तव्यनिष्ठ और सच्चे अर्थों में पत्रकार कहे जाने चाहिए। नहीं पूछा जाता है। हमें अपने इन पूर्वजों के प्रति इस रवैये पर कुंठा नहीं होनी चाहिए। बल्कि यह मान लेना चाहिए कि उन्हें तो अन्य शहीदों की तरह यही मिलना ही था।

खैर आज पत्रकारिता में विसंगतियां है। उलझनें परेशानियां है। अन्य के मुकाबले परिश्रम का आर्थिक पलड़ा कमजोर है। तमाम चीजें जिनकी आलोचना की जा सकती है। की जानी चाहिए। मगर मेरा यह मानना है कि मौजूदा हिन्दुस्तान की पत्रकारिता विश्व की सर्वश्रेष्ठ पत्रकारिता है। हम जितने नैतिक, जितनें आत्मसंयमित, स्वनियंत्रित, जिम्मेदार, जवाबदेह और घोर परिश्रमी हैं। उतने विश्व में कहीं भी नहीं पाए जाते है। क्या अंदाजा है समाज को। कि आज भी उप्र में दै. जागरण जैसे अखबार के ब्लाक संवाददाता को जो पिछले 25 साल से जुड़ा हुआ है। मात्र 300 रूपये मिलते हैं? इन विडम्बनाओं के बीच हमारे पास बुजुर्ग, अधेड़ और युवा पत्रकारों की एक लम्बी श्रृखला मौजूद है। जो पूरी निष्ठा के साथ गर्व करने लायक परिश्रम कर रहे हैं। छोड़िए इन बातों को कि पत्रकारिता पूंजीपतियों के हाथ गिरवी रखी है। पत्रकारिता बाजारू हो गयी है। पत्रकारिता एक प्रोडक्ट है। पत्रकार सिर्फ अखबारों के नौकर होकर रह गये है। इस स्यापा से कोई फायदा नहीं। वक्त हर क्षण बदल रहा है। हम पीछे मुड़ कर देखे। इतिहास के अच्छे सबक ले ले। अगर उससे अपनी तुलना करेंगे तो फिर कुछ संभव ही नहीं है। हम वैदिक काल में नहीं जा सकते। हम अरण्ययुग में नहीं रह सकते। तो फिर क्या फायदा अफसोस करने से। लक्ष्य सिर्फ यह हो कि अगर हम चौबीस घंटे में एक व्यक्ति को भी अपने पेशागत कार्यों से संतुष्ट कर से सके, मुस्कान ला सकें। तो फिर हम सफल हैं।

लोग कहा करते है कि पत्रकार को निष्पक्ष और निर्भीक होना चाहिए। नहीं साहब हमें कतई निष्पक्ष नहीं होना चाहिए। हमें पक्षधर होना चाहिए। मजलूम का, गरीब का, वंचित का, उत्पीड़ित का, अधिकारविहीन का, देशप्रेमी का, राष्ट्रभक्त का, ईमानदार समाजसेवी का, खिलते हुए गुलाब का। हमें विपक्षी होना चाहिए दुष्टों का, आतताइयों का, राष्ट्रद्रोहियों का, कानून तोड़ने वालों का आदि आदि। हमें निर्भीक नहीं होना चाहिए। हमें डरना चाहिए कि हमसे किसी का नुकसान न हो जाए। हमसें कोई मर्यादा न भंग हो जाए। हम कर्तव्यपथ से भटक न जाए। लोग कहते हैं बल्कि अखबारों के मुखपृष्ठ पर छाप रहे हैं न काहू से दोस्ती, न काहू से बैर। ऐसा कैसे हो सकता है? हमें तो अच्छों से दोस्तीं और बुरों से बैर रखना ही पडे़गा। पहले कहा जाता था कि न तीर निकालों, न तलवार निकालों, जब तोप हो मुकाबिल तो अखबार निकालो। अब तो यह है कि तलवार की धार पर दौड़ने जैसा है, शेर की सवारी जैसा है। हम जहां काम करते है हमें वहीं न्याय उपलब्ध नहीं है। हम जिन्हें सर कहकर नमस्कार करते है वह जवाब देना भी अपनी तौहीन समझते हैं। हमें अपने कार्यालय में ही सम्मान के लिए तरसना पड़ता है। तो हम पहले अपने लिए लड़े या समाज के लिए। नहीं साहब हमें अपना भूलना होगा। समाज को आगे रखना होगा। फौज का एक सिपाही मोर्चे पर सिर्फ वेतन के लिए नहीं लड़ता है। मात्र अपने बच्चे पालने के लिए बंदूक नहीं उठाता हैं। वह जिस गौरव, जिस आन के लिए मोर्चे पर तैनात होता है उसकी कोई कीमत दे ही नहीं सकता है। तो फिर जब हमारी कीमत कहीं मिल ही नहीं सकती तो हम उसे पकड़ कर क्यों माथा पीटे।

इसीलिए कह रहा हूं कि मौजूदा पत्रकारिता एकदम सही है। सही दिशा में है। इस पर नियंत्रण की नहीं इसे शिकंजे में कसने की नहीं, इसे पैरों के नीचे रौंदने की नहीं, इसे अपनी जेब में डालने की जुर्रत नहीं की जानी चाहिए। अगर ऐसा हो रहा है तो फिर पत्रकारों से शहीदी की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिए। हम नहीं तय करेंगे समाज तय करें। भ्रष्टतंत्र तय करें कि उसे पत्रकारों से क्या चाहिए। पत्रकार आज भी कई मोर्चों पर लड़ रहे हैं। उनमें से सबसे बड़ा मोर्चा तो अंदरूनी है। उन्हें आज भी कम से कम सेलरी दी जा रही है। उन्हें बंधुआ की तरह हांका जा रहा है। बड़ी मछली छोटे को खाए जा रही है। क्या पत्रकार के बेटे को हक नहीं है बढ़िया स्कूल में पढ़ने का? महंगी बाइक से चलने का। अच्छा खाना खाने का। पत्रकार को हक नहीं है बैंक बैलेंस बढ़ाने का। मेरे ख्याल से तो है। आखिर सारे बलिदान की उम्मीद पत्रकारों से ही क्यों? पत्रकारों के उत्पीड़न और बेइज्जतियों से जुड़े़ ऐसे किस्से है जिन्हें हम खुद शर्म की वजह से अपने ही अखबारों में नहीं लिख सकते। अगर लिख दिये जाएं तो न जाने कितनों का कलेजा निकल पडे़। हमारी अपनी कमियां है। समस्याएं है। यह बनी रहेगी। बढ़ती रहेगी। यहीं सिस्टम है लेकिन इसके बावजूद पत्रकारिता पर उंगली उठाने वाले लोग यह समझ ले कि आज पत्रकार समाज के उन तमाम वर्गों से करोड़ गुना बेहतर है जो पत्रकारों की आलोचना करते हैं।
पत्रकारिता में कोई गिरावट नहीं आई है। पत्रकारिता कतई खराब नहीं हुई है। हम कई मोर्चों पर लड़ रहे है। किसी से कह नहीं रहे है कि हमें शहीद का दर्जा दो। हम तो बस जैसे है वैसे ही है। बुरा मत मानें। पहले हमारे त्याग के प्रतिमूर्ति पत्रकारों को कुछ भी न दें। मगर हृरदय से सम्मान दें। तब फिर हमारी कमियों पर उंगली उठाए और समाज के लोगों से एक सवाल? अगर पत्रकारिता शानदार, जानदार, आन-बानदार नहीं है तो ये लड़के क्यों भागे चले आ रहे है पत्रकार बनने के लिए। किसी भी तरह। जवाब हो तो यशवंत भाई के भड़ास के मेल पर भेज दें। हमारे लिए तो पत्रकारिता दिवस राष्ट्रीय पर्व दिवस से कम नहीं है। क्योंकि हमें गर्व है कि हम पत्रकार है और सभी जो भी पत्रकारिता से किसी भी तरह जुड़े हुए है वह सब गर्व का विषय है।

पीयूष त्रिपाठी

ब्‍यूरो प्रमुख इतवार

लखनऊ

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs

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