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ईमानदारी की बड़ी-बड़ी बातें कर पत्रकारिता दिवस पर मठाधीशों ने कमाए लाखों

पत्रकारिता दिवस पर शाहजहांपुर के मठाधीश टाइप के पत्रकार प्रत्येक वर्ष गोष्ठी का आयोजन करते हैं। इस बार भी शहर के एक होटल में इन मठाधीश पत्रकारों ने एक गोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें वक्ताओं ने पत्रकारिता पर प्रकाश डाला। पत्रकारिता में ईमानदारी और सच्चाई पर चलने के लिए पत्रकारों को प्रेरित किया गया। पर इस गोष्ठी में बोलने वाले पत्रकार वक्ता यह भूल गए कि वह जिस ईमानदारी और सच्चाई की बात कर रहे हैं, उस पर वह स्वयं कितने खरे हैं। गोष्ठी के आयोजक ने पत्रकार साथियों को संबोधित करते हुए कहा कि युवा पत्रकार अपने वरिष्ठ साथियों का सम्मान करें और ईमानदारी के साथ पत्रकारिता कर समाज में फैले भ्रष्टाचार को मिटाने का आज संकल्प लें।

पत्रकारिता दिवस पर शाहजहांपुर के मठाधीश टाइप के पत्रकार प्रत्येक वर्ष गोष्ठी का आयोजन करते हैं। इस बार भी शहर के एक होटल में इन मठाधीश पत्रकारों ने एक गोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें वक्ताओं ने पत्रकारिता पर प्रकाश डाला। पत्रकारिता में ईमानदारी और सच्चाई पर चलने के लिए पत्रकारों को प्रेरित किया गया। पर इस गोष्ठी में बोलने वाले पत्रकार वक्ता यह भूल गए कि वह जिस ईमानदारी और सच्चाई की बात कर रहे हैं, उस पर वह स्वयं कितने खरे हैं। गोष्ठी के आयोजक ने पत्रकार साथियों को संबोधित करते हुए कहा कि युवा पत्रकार अपने वरिष्ठ साथियों का सम्मान करें और ईमानदारी के साथ पत्रकारिता कर समाज में फैले भ्रष्टाचार को मिटाने का आज संकल्प लें।

पर वह यह सब बोलने से पहले यह भूल गए कि जिस गोष्ठी के बाद होने वाले भोज की जो व्यवस्था उन्होंने की है वह भी भ्रष्ट, दलालों व अवैध धंधे करने वालों के धन से की गई है। एक कहावत है कि जैसा खाओ धन वैसा हो मन। तो जब पत्रकार दलाली की कमाई खाएंगे तो खुद ईमानदारी की राह पर कैसे चल पाएंगे। शाहजहांपुर पत्रकारिता दिवस का मतलब अब सिर्फ चंदाखोरी और झूठी शान बघारने तक ही सीमित रह गया है। पत्रकारिता दिवस के नाम पर एक महीने पहले ही मठाधीश चंदाखोरी शुरू कर देते हैं। हर साल की तरह इस बार भी करीब पांच लाख रुपया चंदा वसूला गया। शहर के एक होटल में पत्रकारिता दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किया गया।

शहर ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों तक से पत्रकारों को बुलाया गया। इनमें से तमाम तो ऐसे थे जिन्हें पत्रकारिता के नाम पर एबीसीडी भी नहीं पता थी। ऐसे पत्रकारों में शहरी पत्रकारों की संख्या ज्यादा थी। जिनका काम दिन भर डग्गामारी करना है। 10-20 अखबारों की एजेंसी लेकर खुद को ब्यूरो चीफ बताकर और सूचना कार्यालय में बतौर पत्रकार अपना नाम दर्ज कराकर यह पत्रकार सारा दिन ‘जुगाड़’ में लगे रहते हैं। शाम को किसी से मांग कर दो-चार खबरें ई-मेल कर दीं। बस हो गई पत्रकारिता। इनमें से कई तो इस हद तक गिरे हुए हैं कि गौकशी तक का पैसा खाते हैं। खैर यह सब ‘सम्मानित’ भाई आज कुर्सियों पर शान से जमे बैठे थे। बड़े अधिकारी और राजनेता भी थे। पत्रकारों के ‘महाठगों’ ने अफसरों और राजनेताओं के गले में फूल मालाएं पहनाईं और खुद गौरान्वित महसूस कर कुप्पा हो गए।

खैर, बात हो रही थी पत्रकारिता दिवस पर चंदे की। सूत्र बताते हैं कि इस बार मठाधीशों के एक संगठन ने पूरे पांच लाख वसूले। एक होटल में कार्यक्रम हुआ। जिस पर बमुश्किल 25 हजार खर्च हुआ। हालांकि यह संगठन हर साल कभी पत्रकारिता दिवस, कभी न्यू ईयर तो कभी शहीदों के नाम पर लाखों वसूल कर डकार जाता है। बुरा तो यह लगता है कि लाखों डकारने वाले यह मठाधीश बगुला भगत बनकर कार्यक्रम में आए पत्रकारों के सामने ईमानदारी की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। कहते हैं कि पत्रकारिता जोखिम भरा काम है, इसे पूरी ईमानदारी से करना चाहिए। इनसे पूछिए कि यह सट्टा, बालू खनन, गौकशी और ऐसे ही न जाने कितने घिनौने व समाजविरोधी धंधों से पैसा लेकर कितनी ईमानदारी बरतते हैं। इन्हें मंचों से ऐसे भाषण देने का अधिकार तक नहीं होना चाहिए।

सौरभ दीक्षित

शाहजहांपुर

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