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हम जबरिया चौथा स्‍तम्‍भ बने हुए हैं

भारत के संविधान में तीन स्तंभों को बताया गया है। पहली विधायिका, दूसरी न्याय पालिका, तीसरी कार्य पालिका, हम जबरदस्ती चौथे स्तम्भ बने हुए हैं, जिसे किसी ने बनाया नहीं, लेकिन हम हैं तो हैं। मतलब मान न मान हम तेरे मेहमान। बात आती है पहला कौन, पहला वही जो जनता की सेवा में पहले हो और संविधान में जगह पाए तीनों स्तम्भ बगैर आंख, बगैर कान के हैं, जो आप भी जानते हैं और हम भी। लेकिन हम स्वयंभू चौथे स्तम्भ बगैर लालच, स्वार्थ के सबसे पहले जनता के पास पहुंचते हैं और जनता की बात को उन तीनों तक पहुंचाने का काम करते हैं। बदले में क्या मिलता है आप सब को मालूम है। कभी झूठा मुकदमा तो कभी पुलिस की लाठी, तो कभी अपमान की घूट।

भारत के संविधान में तीन स्तंभों को बताया गया है। पहली विधायिका, दूसरी न्याय पालिका, तीसरी कार्य पालिका, हम जबरदस्ती चौथे स्तम्भ बने हुए हैं, जिसे किसी ने बनाया नहीं, लेकिन हम हैं तो हैं। मतलब मान न मान हम तेरे मेहमान। बात आती है पहला कौन, पहला वही जो जनता की सेवा में पहले हो और संविधान में जगह पाए तीनों स्तम्भ बगैर आंख, बगैर कान के हैं, जो आप भी जानते हैं और हम भी। लेकिन हम स्वयंभू चौथे स्तम्भ बगैर लालच, स्वार्थ के सबसे पहले जनता के पास पहुंचते हैं और जनता की बात को उन तीनों तक पहुंचाने का काम करते हैं। बदले में क्या मिलता है आप सब को मालूम है। कभी झूठा मुकदमा तो कभी पुलिस की लाठी, तो कभी अपमान की घूट।

उन तीनों को सरकारी वेतन, भत्ता, सुख सुविधा और बाकी, अलग से बहुत कुछ जो नहीं मिलना चाहिए। बचे पत्रकार (चौथा स्तम्भ) जिसे जब भी जानकारी मिली की कहीं कुछ हो रहा है तो हम खुद वहां तक जाने की कोशिश करते हैं, जब कि वो हमें बुलाते नहीं है, फिर भी उनकी आवाज को भोंपू बन कर दूर दूर तक पहुंचाने का काम करते हैं। मेरी राय में मीडिया को पहले स्तम्भ का दर्जा मिलना चाहिए क्यों कि जिस दिन देश में मीडिया सो जायेगी, उस दिन क्या होगा शायद आप ने कल्पना भी नहीं की होगी। इस बात पर एक शायर ने लिखा था कि ”रहम बेच देंगे, करम बेच देंगे, ये धरती धरा और गगन बेच देंगे, कलम के सिपाही अगर सो गए तो वतन के सिपाही वतन बेच देंगे”। इन बातों को ध्यान में रखते हुए हमें फिर से सोचना होगा कि जिस बात को शायर ने कहा है उन बातों में दम है, लेकिन हमारा दायित्य और भी ज्यादा बढ़ जाता है कि हम पत्रकार से पहले इस देश के नागरिक भी हैं।

योगेन्द्र विश्वकर्मा

संपादक

तरुणमित्र, लखनऊ

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